प्रेमानंद महाराज

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प्रेमानंद महाराज
जन्म30/03/1971
राष्ट्रीयताभारतीय
पेशाआध्यात्मिक गुरु, संन्यासी, दार्शनिक
पदवीश्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज, प्रेमानंद जी महाराज
प्रसिद्धि का कारणआध्यात्मिक प्रवचन (सत्संग), 'एकांतिक वार्तालाप', राधा-कृष्ण की भक्ति
धर्महिन्दू धर्म
माता-पिताशंभू पांडे (पिता) रमा देवी (माता)

प्रेमानंद गोविंद शरण (जन्म: अनिरुद्ध कुमार पांडेय; 30 मार्च 1971), जिन्हें सामान्यतः प्रेमानंद महाराज के नाम से जाना जाता है, उत्तर प्रदेश के वृन्दावन में निवासरत एक भारतीय हिन्दू तपस्वी एवं आध्यात्मिक गुरु हैं।[1][2] वह राधा वल्लभ सम्प्रदाय के दीक्षित भिक्षु (संन्यासी) हैं। यह सम्प्रदाय एक वैष्णव पंथ है जो हिन्दू देवी-देवता राधा-कृष्ण की भक्ति पर बल देता है, तथा जिसमें विशेषकर देवी राधा की सर्वोच्चता पर धर्मशास्त्रीय ध्यान केंद्रित किया गया है।[3]

वे वृन्दावन स्थित अपने आश्रम, श्री हित राधा केलि कुंज में सार्वजनिक आध्यात्मिक प्रवचन (सत्संग) और 'ऐकान्तिक वार्तालाप' के नाम से ज्ञात निजी प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित करते हैं।[4] 2010 के दशक के उत्तरार्ध और 2020 के दशक के प्रारम्भ में, उनके प्रवचनों के वीडियो (दृश्य-श्रव्य रिकॉर्डिंग) यूट्यूब जैसे डिजिटल मंचों पर लोकप्रिय हुए, जिससे युवा वयस्कों और शहरी व्यवसायियों का एक बड़ा वर्ग उनकी ओर आकर्षित हुआ।[5] वृक्क (किडनी) के पूर्णतया निष्क्रिय हो जाने के कारण, जिसके लिए पंद्रह वर्षों से अधिक समय से उन्हें दैनिक डायलिसिस (रक्त अपोहन) की आवश्यकता होती है, इसके पश्चात् भी उन्होंने सार्वजनिक संवाद की अपनी दैनिक दिनचर्या को अक्षुण्ण रखा है।[6]

प्रारम्भिक जीवन एवं पृष्ठभूमि[संपादित करें]

प्रेमानंद गोविंद शरण का जन्म अनिरुद्ध कुमार पांडेय के रूप में[7] 30 मार्च 1971 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल प्रशासनिक खण्ड में स्थित एक ग्रामीण ग्राम, अखरी में हुआ था। उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता, शम्भू पांडेय, भक्ति-साधना में संलग्न रहते थे, और उनकी माता, रमा देवी, एक गृहिणी थीं जो नियमित रूप से भ्रमणशील साधु-संतों का आतिथ्य सत्कार करती थीं।[8][9]

उनके परिवार में संन्यास और शास्त्र पठन-पाठन की परम्परा थी। उनके दादा ने पूर्व में ही गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया था, और उनके बड़े भाई नियमित रूप से श्रीमद्भागवतम् के श्लोकों का सस्वर पाठ करते थे। जीवन वृत्तांतों के अनुसार, अनिरुद्ध का प्रारम्भिक आयु में ही हिन्दू शास्त्रों से परिचय हो गया था। जब वे पाँचवीं कक्षा में थे, तब तक उन्होंने भगवद्गीता और श्री सुखसागर का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया था, जो संन्यासी जीवन के प्रति उनकी प्रारम्भिक रुचि को प्रदर्शित करता है।[10] ji.

आध्यात्मिक यात्रा[संपादित करें]

वाराणसी में संन्यास[संपादित करें]

13 वर्ष की आयु में, अनिरुद्ध ने संन्यासी जीवन व्यतीत करने हेतु कानपुर स्थित अपना गृह त्याग दिया। उन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचारी (आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले तपस्वी) की दीक्षा ग्रहण की और उत्तर प्रदेश के प्रमुख धार्मिक केंद्र वाराणसी (काशी) में प्रस्थान किया।[1]

वाराणसी में अपने प्रवास के दौरान, वे मुख्य रूप से गंगा नदी के घाटों पर निवास करते थे। संन्यासी समुदाय के अंतर्गत, उन्हें प्रारम्भ में आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी नाम प्रदान किया गया था और आगे की दीक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्हें स्वामी आनंदाश्रम के नाम से सम्बोधित किया जाने लगा।[8] कई वर्षों तक, वे पारम्परिक तपस्या में संलग्न रहे, जिसमें ध्यान लगाना, शास्त्रीय हिन्दू दर्शन का अध्ययन करना और स्थानीय निवासियों से प्राप्त 'भिक्षा' पर ही जीवन निर्वाह करना सम्मिलित था। उनके जीवन पर आधारित आख्यानों के अनुसार, वाराणसी में उनकी दिनचर्या में दीर्घकालिक उपवास और एकांतवास सम्मिलित था, जो उस नगर में प्रचलित शैव और वेदान्तिक संन्यासी परम्पराओं की विशेषता है।[10]

वृन्दावन प्रस्थान[संपादित करें]

वाराणसी में अपने तपस्या काल के पश्चात, उन्होंने कृष्ण-केन्द्रित वैष्णववाद के धर्मशास्त्रीय केंद्र, वृन्दावन की ओर प्रस्थान किया। उनके आश्रम के आख्यानों के अनुसार, यह प्रस्थान एक सह-संन्यासी के साथ हुई भेंट से प्रेरित था, जिन्होंने उन्हें रासलीला परम्पराओं के दर्शन हेतु वृन्दावन जाने का परामर्श दिया था।[5]

वृन्दावन आगमन पर, उनकी प्रारम्भिक दिनचर्या में वृन्दावन परिक्रमा (नगर की प्रदक्षिणा) करना और बांके बिहारी मंदिर के दर्शन करना सम्मिलित था। तत्पश्चात उनका परिचय श्री राधा वल्लभ मंदिर से हुआ, जिसने उनके धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण को व्यापक रूप से प्रभावित किया।[4]

राधा वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षा[संपादित करें]

वे औपचारिक रूप से राधा वल्लभ सम्प्रदाय में सम्मिलित हो गए, जो 16वीं शताब्दी में रहस्यवादी संत हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित एक हिन्दू सम्प्रदाय है। यह परम्परा अन्य वैष्णव पंथों से इस अर्थ में भिन्न है कि यह राधा को सर्वोच्च धर्मशास्त्रीय महत्त्व प्रदान करती है, और कृष्ण को उनके दिव्य प्रेम (रासोपासना) के अधीन मानती है।[3]

उन्होंने अपने आध्यात्मिक गुरु, श्री हित गौरांगी शरण जी महाराज से अपनी औपचारिक दीक्षा और 'शरणागति मंत्र' प्राप्त किया।[11] इसी दीक्षा के दौरान उन्होंने अपनी पूर्ववर्ती संन्यासी उपाधियों का त्याग कर 'श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण' नाम अंगीकार किया।[5]

आश्रम एवं गतिविधियाँ[संपादित करें]

वे श्री हित राधा केलि कुंज के प्रमुख हैं, जो वृन्दावन में परिक्रमा मार्ग पर वराह घाट पर स्थित एक आश्रम है। यह आश्रम उनके आध्यात्मिक प्रवचनों और श्री हित राधा केलि कुंज ट्रस्ट की लोकोपकारी (परोपकारी) गतिविधियों के मुख्य केंद्र के रूप में कार्य करता है।[8]

आश्रम में दैनिक दिनचर्या प्रातःकाल आरम्भ होती है, जहाँ वे प्रातः 4:15 से 5:45 बजे के मध्य प्रातःकालीन सत्संग (आध्यात्मिक प्रवचन) का संचालन करते हैं। इसके पश्चात, आश्रम में 'एकान्तिक वार्तालाप' आयोजित किया जाता है, जहाँ पूर्व-पंजीकृत आगंतुक अध्यात्म, नैतिकता और व्यक्तिगत संघर्षों से सम्बंधित विशिष्ट प्रश्न पूछते हैं।

यह ट्रस्ट ब्रज क्षेत्र में अनेक धर्मार्थ पहलों का प्रबंधन करता है। इसमें एक दैनिक भंडारा (सामुदायिक भोजनालय) सम्मिलित है, जो तीर्थयात्रियों, साधुओं (तपस्वियों) और स्थानीय विधवाओं को निःशुल्क भोजन प्रदान करता है। आश्रम निःशुल्क चिकित्सालय भी संचालित करता है और निर्धनों को वस्त्र वितरित करता है। आश्रम राजनेताओं, ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों या धनवान दानदाताओं को कोई भी विशेषाधिकार युक्त आसन या तीव्र-प्रवेश (फास्ट-ट्रैक एंट्री) प्रदान न करने की नीति का दृढ़ता से पालन करता है; प्रवचनों के दौरान सभी उपस्थित जन एक साथ भूमि पर ही बैठते हैं।[2] विगत वर्षों में, आश्रम ने सार्वजनिक परामर्श (एडवाइजरी) जारी कर भक्तों को उनके नाम पर दान माँगने या सम्पत्ति बेचने वाले कपटपूर्ण संगठनों के विरुद्ध सचेत किया है, तथा यह दोहराया है कि राधा केलि कुंज में सभी सेवाएँ पूर्णतया निःशुल्क हैं।[8]

शिक्षाएँ एवं दर्शन[संपादित करें]

उनकी शिक्षाएँ राधा वल्लभ सम्प्रदाय के धर्मशास्त्र पर आधारित हैं। उनका प्राथमिक उपदेश 'राधा-दास्यम' के इर्द-गिर्द केंद्रित है—अर्थात् देवी राधा के प्रति निस्वार्थ सेवाभाव की अवधारणा, जिन्हें यह सम्प्रदाय पूर्ण सर्वोच्च देवत्व के रूप में स्वीकार करता है।

उनके प्रवचन का एक मुख्य तत्त्व 'नाम जप' है, जो प्रत्येक श्वास के साथ "राधा" के दिव्य नाम का निरंतर आंतरिक स्मरण है। वे इसे वर्तमान कलियुग में आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्ति का सर्वाधिक सुलभ मार्ग बताते हैं। वे ब्रह्मचर्य और इंद्रिय निग्रह पर भी बल देते हैं, और बहुधा युवा श्रोताओं को शारीरिक ऊर्जा को धार्मिक भक्ति की ओर उन्मुख करने के आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक अनुशासन के विषय में सम्बोधित करते हैं। [12][10] इसके अतिरिक्त, अपने 'एकान्तिक वार्तालाप' सत्रों के दौरान, वे व्यक्तिगत या व्यावसायिक कष्टों का अनुभव करने वाले व्यक्तियों को 'निष्काम कर्म' (फलासक्ति रहित कर्म) के सिद्धांत को लागू करने का परामर्श देते हैं; अर्थात् परिणामों के प्रति आसक्ति के बिना अपने सांसारिक कर्तव्यों का निर्वहन करना और पूर्णतया ईश्वरीय इच्छा ('शरणागति') पर निर्भर रहना।

आध्यात्मिक वृत्तांत एवं शिक्षाएँ[संपादित करें]

अपने सार्वजनिक प्रवचनों में, उन्होंने ऐसे व्यक्तिगत अनुभवों को साझा किया है, जिनके विषय में उनका कथन है कि उन्होंने उनकी आध्यात्मिक यात्रा को दिशा प्रदान की।[13] वाराणसी में एक संन्यासी के रूप में आकाश-वृत्ति (बिना भिक्षा माँगे पूर्णतया ईश्वरीय कृपा पर निर्भर रहने की संन्यासी प्रथा) के व्रत के अंतर्गत तपस्या करते समय, उन्होंने हिन्दू देवता शिव के साक्षात् दर्शन का अनुभव सुनाया। उनके अनुसार, इस साक्षात्कर ने एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य किया, जिसने उन्हें वृन्दावन प्रस्थान करने और अपना जीवन राधा व कृष्ण की उपासना हेतु समर्पित करने का निर्देश दिया।

उनकी शिक्षाएँ आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने के लिए बहुधा इन प्रसंगों का उपयोग करती हैं। उन्होंने गंगा के तट पर हुई एक घटना का वर्णन किया है, जहाँ एक मद्यपान किये हुए व्यक्ति ने उनके पास आकर उन्हें आध्यात्मिक सहनशीलता ('तितिक्षा') का महत्त्व सिखाया था। उस व्यक्ति ने समीप के एक मंदिर की ओर संकेत करते हुए कहा कि पूजनीय विग्रह (मूर्ति) और फर्श दोनों बिल्कुल एक ही संगमरमर से बने हैं; तथापि, केवल वही पत्थर देवत्व को प्राप्त हुआ जिसने मूर्तिकार की छेनी-हथौड़े की पीड़ादायक चोटों को सहन किया।[14]

उनके सार्वजनिक प्रवचनों में अन्य सूक्ष्म प्रसंग भी सम्मिलित हैं, जैसे वृन्दावन की एक स्थानीय बालिका, जिसके क्षेत्रीय बोली में पूछे गए एक संक्षिप्त प्रश्न—"जायगो बाबा?" (क्या आप जाएँगे बाबा?)—ने उन्हें नगर छोड़ने की अपनी योजना परिवर्तित करने के लिए प्रेरित किया। इसके अतिरिक्त, वे गोवर्धन पर्वत की कठोर 'दंडवत परिक्रमा' के दौरान एक प्रसंग का वर्णन करते हैं, जहाँ एक रुपये की याचना करने वाले एक छोटे बालक को उनके और उनके गुरु द्वारा साक्षात् कृष्ण का स्वरूप माना गया था।[15]

सार्वजनिक उपस्थिति एवं मीडिया[संपादित करें]

यद्यपि राधा वल्लभ सम्प्रदाय के पारम्परिक संतों ने ऐतिहासिक रूप से एकांत और गुमनामी को प्राथमिकता दी है, किन्तु यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों पर अपने वीडियो के प्रसार के कारण उन्होंने विशाल जनसमूह (अनुयायी) प्राप्त कर लिया है। उनका आधिकारिक यूट्यूब चैनल, भजन मार्ग, लाखों ग्राहकों तक उनके दैनिक प्रवचनों और प्रश्नोत्तर सत्रों का प्रसारण करता है।[6]

पारम्परिक हिन्दू शास्त्रों के दृष्टिकोण से आधुनिक मनोवैज्ञानिक और जीवनशैली संबंधी समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप से सम्बोधित करने की उनकी पद्धति ने युवा व्यवसायियों के वर्ग को आकर्षित किया है। परिणामस्वरूप, उनका आश्रम मार्गदर्शन की खोज में आने वाले उच्च-स्तरीय सार्वजनिक व्यक्तियों हेतु एक प्रमुख गंतव्य बन गया है।[1]

राधा केलि कुंज आने वाले उल्लेखनीय आगंतुकों में भारतीय राष्ट्रीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान विराट कोहली और उनकी पत्नी, बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा सम्मिलित हैं,[16] जिनकी यात्राओं को मीडिया में व्यापक कवरेज प्राप्त हुआ जब उनके चित्र अन्य उपस्थित जनों के साथ फर्श पर नंगे पैर बैठे हुए प्रकाशित हुए।[17][18] उनसे सार्वजनिक रूप से भेंट करने वाली अन्य प्रमुख हस्तियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत, गायक बी प्राक और अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी सम्मिलित हैं।[6]

सामाजिक दृष्टिकोण एवं प्रतिक्रिया[संपादित करें]

मंदिर परिधान पर टिप्पणियाँ[संपादित करें]

नवम्बर 2024 में, मंदिरों में महिलाओं द्वारा छोटे वस्त्र धारण करने के विषय में एक मंदिर के पुजारी के साथ प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान, प्रेमानंद ने कहा कि व्यक्तियों को आगंतुकों की वेशभूषा पर विवाद करने के स्थान पर सर्वप्रथम अपनी दृष्टि को अनुशासित करना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि परिधान पर धार्मिक मार्गदर्शन तभी प्रदान किया जाना चाहिए जब विशेष रूप से उसकी याचना की जाए।[19]

संबंधों पर 2025 की टिप्पणियाँ[संपादित करें]

जुलाई 2025 में, सोशल मीडिया पर एक वीडियो प्रसारित हुआ जिसमें प्रेमानंद ने समकालीन संबंधों और यौन नैतिकता पर विचार व्यक्त किए। उस दृश्य-श्रव्य (रिकॉर्डिंग) में, उन्होंने वैवाहिक निष्ठा पर टिप्पणी की, यह प्रश्न उठाया कि क्या पूर्व में एकाधिक साझेदारों (पार्टनर्स) वाले व्यक्ति निष्ठावान विवाह को बनाए रख सकते हैं, और लिव-इन रिलेशनशिप (सहजीवन) की आलोचना की।[20]

इन टिप्पणियों की जनता के कुछ वर्गों, सामाजिक टिप्पणीकारों और महिला अधिकार संगठनों द्वारा आलोचना की गई, जबकि अनेक धार्मिक हस्तियों ने उनके विचारों का समर्थन किया।[21] उनके वक्तव्यों के इर्द-गिर्द सार्वजनिक चर्चा के उपरान्त, स्थानीय मीडिया ने सूचना दी कि फेसबुक पर उनके विरुद्ध हत्या की धमकी दी गई थी।[22]

स्वास्थ्य स्थिति[संपादित करें]

उन्हें 'ऑटोसोमल डोमिनेंट पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज' (एडीपीकेडी) से ग्रसित पाया गया है, जो एक आनुवंशिक विकार है जिसके कारण वृक्क (गुर्दों) में सिस्ट (गाँठों) के गुच्छे विकसित हो जाते हैं। इस स्थिति के परिणामस्वरूप लगभग 15 से 20 वर्ष पूर्व उनके वृक्क पूर्णतया निष्क्रिय हो गए थे।[6] वे प्रतिदिन डायलिसिस उपचार से गुजरते हैं, जो पाँच घंटे तक चलता है।[1]

रोग निदान (बीमारी का पता चलने) के पश्चात से, अनेक भक्तों ने प्रत्यारोपण हेतु अपने वृक्क दान करने का प्रस्ताव दिया है। सितम्बर 2024 में, ब्रिटिश-भारतीय व्यवसायी राज कुंद्रा ने सार्वजनिक रूप से संन्यासी को वृक्क दान करने की पेशकश की थी।[23] तथापि, उन्होंने अंग दान के सभी प्रस्तावों को निरंतर अस्वीकार किया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने स्वयं के जीवन की रक्षा हेतु किसी अन्य व्यक्ति को शारीरिक क्षति या कष्ट पहुँचाने से मना कर दिया है, और इसके स्थान पर अपनी शारीरिक क्षीणता को ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करने की प्राथमिकता व्यक्त की है।[1]

ग्रन्थसूची[संपादित करें]

श्री हित राधा केलि कुंज ट्रस्ट के अंतर्गत उनकी शिक्षाओं और प्रवचनों के अनेक संकलन प्रकाशित हुए हैं:

  • ब्रह्मचर्य - कब, क्यों और कैसे? (2025) – ISBN 978-81-980039-1-1
  • सेलिबेसी - व्हेन, व्हाई एंड हाउ? (2025) – ISBN 978-81-980039-0-4
  • श्री हित हरिवंश चरितामृत (2025) – ISBN 978-81-980039-9-7
  • स्पिरिचुअल अवेकनिंग (खंड 1) (2024) – ISBN 978-81-971056-5-4
  • 365 डिवाइन सूत्रास कोटेशन (2026) – ISBN 978-81-996765-1-0

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

  • हरिवंश महाप्रभु
  • राधावल्लभ सम्प्रदाय
  • वृन्दावन
  • वैष्णववाद

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

संदर्भ / स्रोत

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  2. अ आ "Growing inclination towards more inclusive and personal understanding of spirituality: Shri Premanand Govind Sharan Ji Maharaj" . The Times of India . 2024-02-01. आईएसएसएन 0971-8257 . अभिगमन तिथि: 2026-08-31 . ↗
  3. अ आ "वृन्दावन वाले प्रेमानंद महाराज किस संप्रदाय से ताल्लुक रखते हैं? जानें सिर्फ पीले वस्त्र ही क्यों पहनते हैं" . [ मृत कड़ियाँ ] ↗
  4. अ आ "आध्यात्मिक साधकों के पथप्रदर्शक बने हुए हैं नैष्ठिक ब्रह्मचारी प्रेमानंद जी महाराज" . Lokmat News Hindi . 2024-02-06 . अभिगमन तिथि: 2026-08-31 . ↗
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  6. अ आ इ ई "Premanand Ji Maharaj Health Update: What Is Autosomal Dominant Polycystic Kidney Disease, Symptoms, Causes & Treatment Explained" . Zee News . 29 October 2024 . अभिगमन तिथि: 21 August 2026 . {{ cite news }} : CS1 maint: url-status ( link ) ↗
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  13. "भगवान शिव के आदेश पर काशी से वृंदावन आए बाबा प्रेमानंद महाराज, अस्सी घाट पर मुर्दे ने क्या कहा उनसे / Premanand Maharaj Came To Vrindavan From Kashi On The Orders Of Shiva" . Patrika News . 2023-12-23 . अभिगमन तिथि: 2026-08-31 . ↗
  14. Sharma, Hema. "शराबी से मिला था प्रेमानंद को असली ज्ञान, महाराज ने भक्तों को खुद सुनाया किस्सा" . News24 Hindi . अभिगमन तिथि: 2026-08-27 . ↗
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  23. " 'Meri hai, main kisiko bhi doon': Raj Kundra on donating kidney to Premanand Ji Maharaj, who has been on a 5-hour daily dialysis for 20 years due to renal failure" . The Indian Express (अंग्रेज़ी भाषा में). 2025-09-04 . अभिगमन तिथि: 2026-08-27 . ↗
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