| • महानगर | 17,98,218 |
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| • पद | 20वाँ (भारत) |
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| • घनत्व | 3,880/किमी 2 (10,100/मील 2 ) |
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| • महानगरीय घनत्व | 2,957.3/किमी 2 (7,659.4/मील 2 ) |
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| वासीनाम | भोपाली |
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| समय मण्डल | IST ( UTC+5:30 ) |
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| PIN | 462001-50 |
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| दूरभाष संख्या | 0755 |
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| वाहन पंजीकरण | MP-04 |
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| GDP (प्रति व्यक्ति) | $2.087 या ₹1.47 लाख |
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| आधिकारिक भाषा | हिन्दी |
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| साक्षरता (2011) | 80.37% |
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| वर्षण | 1,123.1 मिलिमीटर (44.22 इंच) |
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| मध्यम उच्च तापमान | 31.7 °से. (89.1 °फ़ै) |
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| मध्यम निम्न तापमान | 18.6 °से. (65.5 °फ़ै) |
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| ऊँचाई | 518.73 मी॰ (1,701.9 फीट) |
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| देश | भारत |
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| राज्य | मध्य प्रदेश |
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| HDI (2016) | 0.77 ( उच्च ) |
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| विभाग | भोपाल |
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| वार्ड की संख्या | 85 |
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| नाम स्रोत | भोज |
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| • प्रणाली | नगर निगम |
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| • सभा | भोपाल नगर निगम |
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| • महापौर | मालती राय ( BJP ) |
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| • सांसद | आलोक शर्मा |
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| ज़िला | भोपाल |
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| वेबसाइट | bhopal .nic .in bhopal .city smartbhopal .city |
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भोपाल (अंग्रेज़ी: Bhopal) भारत के मध्य प्रदेश राज्य की राजधानी है और भोपाल जनपद का प्रशासनिक मुख्यालय भी है। भोपाल को राजा भोज की नगरी तथा 'झीलों की नगरी' भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ कई छोटे-बड़े तालाब हैं। यह नगर अचानक चर्चा में तब आ गया, जब 1984 में अमरीकी कम्पनी, यूनियन कार्बाइड से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव से लगभग 20,000 लोग मारे गये थे।[9] भोपाल को स्मार्ट सिटी मिशन के तहत स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने वाले पहले बीस भारतीय शहरों (प्रथम चरण) में से एक के रूप में चुना गया था। [10] भोपाल को लगातार तीन वर्षों, 2017, 2018 और 2019 तक भारत में सबसे स्वच्छ राज्य की राजधानी का दर्जा दिया गया। [11]
भोपाल में भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) का एक कारखाना है। हाल ही में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान केन्द्र ने अपना दूसरा 'मास्टर कण्ट्रोल फ़ैसिलटी' यहाँ स्थापित किया है। भोपाल में ही भारतीय वन प्रबंधन संस्थान भी है जो भारत में वन प्रबन्धन का एकमात्र संस्थान है। साथ ही भोपाल उन छह नगरों में से एक है जिनमे 2003 में भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान खोलने का निर्णय लिया गया था जोकि वर्ष 2015 से कार्यशील है। इसके अतिरिक्त यहाँ अनेक विश्वविद्यालय हैं जैसे कि राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भारतीय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय आदि। इसके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय संस्थान जैसे मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल, भारतीय वन प्रबंधन संस्थान, भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान इंजीनियरिंग महाविद्यालय, गाँधी चिकित्सा महाविद्यालय, नेशनल लॉ इंस्टिट्यूट यूनिवर्सिटी तथा अनेक शासकीय एवं पब्लिक स्कूल हैं। भोपाल में कोलार तथा केरवा नदियाँ हैं। बेतवा नदी का उद्गम स्थल कोलाश्र बाँध के पास झिरी में है। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के कई साक्ष्य मौजूद है।
कुछ इतिहासकारों को भ्रम है की इस शहर को राज भोज ने बसाया था। जो की पूर्णतः गलत है। राजा भोज जिस जगह इलाज कराने आए थे। उस शहर का नाम भोजपुर है। जो की भोपाल से 50 किलो मीटर दूर है।
भोपाल की स्थापना गोंड राजवंश के राजा भूपाल शाह ने 669-679 ईस्वी में की थी। उनके राज्य की राजधानी भूपाल ही था, जो अब मध्य प्रदेश का एक ज़िला है। शहर का पूर्व नाम 'भूपाल' था जो भूपाल से बना था। गोंड राजाओं के अस्त के बाद यह शहर कई बार लूट का शिकार बना। गोंड राजवंश के बाद भोपाल शहर में अफ़ग़ान सिपाही दोस्त मोहम्मद ख़ान (1708-1740) का शासन रहा है। मुग़ल साम्राज्य के विघटन का फ़ायदा उठाते हुए खान ने बेरासिया तहसील हड़प ली। कुछ समय बाद गोण्ड महारानी कमलापति की मदद करने के लिए ख़ान को भोपाल गाँव भेंट किया गया। रानी की मौत के बाद खान ने छोटे से गोण्ड राज्य पर कब्जा जमा लिया।
महारानी कमलापति गोण्ड महाराजा निज़ाम शाह की पत्नी थीं। राजा निज़ाम शाह की मृत्यु हो जाने पर महारानी कमलापति ने राज्य की बागडोर संभाली। भोपाल शहर के अन्दर बड़े तालाब के पास इनकी स्मृति के रूप में कमला पार्क का निर्माण किया गया है।साथ ही रानी कमलापति रेल्वे स्टेशन का नामकरण किया गया है।
1720-1726 के दौरान दोस्त मोहम्मद ख़ान ने भोपाल गाँव की किलाबन्दी कर इसे एक शहर में तब्दील किया। साथ ही उन्होंने नवाब की पदवी अपना ली और इस तरह से भोपाल राज्य की स्थापना हुई। मुग़ल दरबार के सिद्दीक़ी बन्धुओं से दोस्ती के नाते खान ने हैदराबाद के निज़ाम मीर क़मर-उद-दीन (निज़ाम-उल-मुल्क) से दुश्मनी मोल ले ली। सिद्दीक़ी बन्धुओं से निपटने के बाद 1723 में निज़ाम ने भोपाल पर हमला कर दिया और दोस्त मोहम्मद खान को निज़ाम का आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा।
मराठाओं ने भी भोपाल राज्य से चौथ (कुल लगान का चौथा हिस्सा) वसूली की। 1737 में मराठाओं ने मुग़लों को भोपाल की लड़ाई में मात दी। खान के उत्तराधिकारियों ने 1818 में ब्रिटिश हुकूमत के साथ सन्धि कर ली और भोपाल राज्य ब्रिटिश राज की एक रियासत बन गया। 1947 में जब भारत को स्वतन्त्रता मिली, तब भोपाल राज्य की वारिस आबिदा सुल्तान पाकिस्तान चली गईं। उनकी छोटी बहन बेग़म साजिदा सुल्तान को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया। 1 जून 1949 के दिन भोपाल राज्य का भारत में विलय[12] हो गया।
भोपाल मेट्रो, भोपाल की एक निर्माणाधीन यातायात प्रणाली है।[13]। वर्तमान समय में भोपाल मेट्रो में दो मार्गों पर काम हो रहा है।[14]
लाइन 2: करोंद चौराहा - भोपाल टॉकीज - रेलवे स्टेशन - भारत टॉकीज - पुल बोगदा - सुभाष नगर अंडरपास - डीबी मॉल - बोर्ड ऑफिस चौराहा - हबीबगंज नाका - अलकापुरी बस स्टॉप - अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान
मार्ग की लम्बाई: 14.99 किमी
लाइन 5: डिपो चौराहा - जवाहर चौक - रोशनपुरा चौराहा - मिण्टो हॉल - लिली टॉकीज़ - जिन्सी डिपो - बोगदा पुल - प्रभात चौराहा - अप्सरा टॉकीज - गोविन्दपुरा इण्डस्ट्रियल एरिया - जे के रोड - रत्नागिरी चौराहा
मार्ग की लम्बाई: 12.88 किमी
भोपाल गैस काण्ड विस्तार में देखें।
भोपाल भारत के मध्य भाग में स्थित है और इसके निर्देशांक 23.27º उ. एवं 77.4º पू. हैं। यह विन्ध्य पर्वत शृंखला के पूर्व में है। भोपाल एक पहाड़ी इलाक़े पर स्थित है किन्तु इसका तापमान अधिकतर गर्म रहता है। इसका भू-भाग ऊँचा-नीचा है एवं इसके दायरे में कई छोटे पहाड़ हैं। उदाहरण के लिए श्यामला हिल, ईदगाह हिल, अरेरा हिल, कटारा हिल इत्यादि। यहाँ गर्मियाँ गर्म और सर्दियाँ सामान्य ठण्डी रहती हैं। बारिश का मौसम जून से ले के सितम्बर-अक्टूबर तक रहता है और सामान्य वर्षा दर्ज की जाती है। 2019 मानसून में भोपाल में 40 वर्षों में सबसे अधिक वर्षा हुई है [15]
नगर निगम की सीमा 289 वर्ग कि॰ मी॰ है। शहरी सीमा के भीतर दो मानव निर्मित झीलें है जो संयुक्त रूप से भोज स्थल के नाम से जानी जाती हैं। बड़ी झील राजा भोज द्वारा निर्मित करवाई गई थी जिसका कुल जल ग्रहण क्षेत्र 361 वर्ग कि॰ मी॰ है। छोटी झील का निर्माण राजा भोज ने करवाया।
भोपाल का तालाब
भोपाल की पहचान भोपाल के बड़े तालाब से है। कहा जाता है- "तालों में ताल भोपाल ताल बाकी सब तलैया"। बड़े तालाब में स्थित बोट क्लब एक पर्यटन स्थल है जो बोटिंग के लिए सुन्दर स्थान है।
यहां का छोटा तालाब, बड़ा तालाब, भीम बैठका, अभयारण्य, शहीद भवन तथा भारत भवन देखने योग्य हैं। भोपाल के पास स्थित सांची का स्तूप भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है, जोकि यूनेस्को द्वारा संरक्षित है। भोपाल से लगभग 28 किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर मन्दिर एक एतिहासिक दर्शनिय स्थल है। भेल स्थित श्रीराम मन्दिर, बरखेड़ा एक प्रसिद्ध आस्था का केन्द्र है।
- भोपाल के अरेरा पहाड़ी पर पाँच दशक पूर्व स्थापित बिड़ला मन्दिर वर्षों से धार्मिक आस्था का केन्द्र रहा है। मन्दिर में स्थापित भगवान श्रीहरि विष्णु एवं लक्ष्मीजी की मनोहारी प्रतिमाएँ बरबस ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकृष्ट कर रही हैं। करीब 7-8 एकड़ पहाड़ी क्षेत्र में फैले इस मन्दिर की ख्याति देश व प्रदेश के विभिन्न शहरों में फैली हुई है।
- जानकारों के अनुसार इस मंदिर का शिलान्यास वर्ष 1960 में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ॰ कैलाशनाथ काटजू ने किया था और उद्घाटन वर्ष 1964 में मुख्यमन्त्री द्वारका प्रसाद मिश्र के हाथों सम्पन्न हुआ। मन्दिर के अन्दर विभिन्न पौराणिक दृश्यों की संगमरमर पर की गई नक्काशी दर्शनीय तो है ही, उन पर गीता व रामायण के उपदेश भी अंकित हैं।
- मन्दिर के अन्दर विष्णुजी व लक्ष्मीजी की प्रतिमाओं के अलावा एक ओर शिव तथा दूसरी ओर माँ जगदम्बा की प्रतिमा विराजमान हैं। मंदिर परिसर में हनुमानजी एवं शिवलिंग स्थापित हैं। वहीं मन्दिर के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने बना विशाल शंख भी दर्शनीय है। मन्दिर की स्थापना के समय पूर्व मुख्यमन्त्री कैलाश नाथ ने बिड़ला परिवार को शहर में उद्योग स्थापित करने के लिए जमीन देने के साथ ही यह शर्त भी रखी थी कि वह इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में एक भव्य तथा विशाल मन्दिर का निर्माण करवाएँ। मन्दिर के उद्घाटन के समय यहाँ विशाल विष्णु महायज्ञ भी आयोजित किया गया था, जिसमें अनेक विद्वानों व धर्म शास्त्रियों ने भाग लिया था। आज भी यह मन्दिर जन आस्था का मुख्य केन्द्र बिन्दु है। जन्माष्टमी पर यहाँ श्रीकृष्ण जन्म का मुख्य आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर विष्णु की आराधना करते है।
इस मन्दिर में मुख्य मन्दिर में विराजे श्रीराम चतुष्ट्य की स्थापना 4 अप्रैल 1971 को हुई थी। यहाँ की सभी मूर्तिया बहुत सुन्दर और अलौकिक है. इस मन्दिर का दिव्य वातावरण सबका मन मोह लेता है. करीब 3 एकड़ में फैले इस मन्दिर में मनोहारी उपवन है जिसमें अनेक प्रकार के फूल खिलते है। मन्दिर में श्रीराम के अलावा दुर्गा जी, योगेश्वर कृष्ण, रामभक्त हनुमान, शंकर जी, शिव जी व गुरुदेव दत्तात्रेय भी विराजे है. मंदिर परिसर में बच्चों के लिए अनेक झूले भी लगे है। घास के बड़े मैदानों में बच्चे किलकारी मारते खेला करते है। सुबह व् शाम सुन्दर कर्णप्रिय भजन भक्तों का मन मोह लेते है। मन्दिर में ऑनलाइन दर्शन की भी व्यवस्था है। श्रीराम नवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयन्ती, शिवरात्रि, दत्तात्रेय जयन्ती समेत अनेक पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाये जाते है। विशेष पर्वो पर भोपाल के सभी मन्दिरों की तुलना में सबसे ज्यादा श्रद्धालु इसी मन्दिर में एकत्र होते है। श्रीराम नवमी पर तो पूरे दिन मन्दिर में पैर रखने तक की जगह नहीं होती।
- यह प्राचीन शहर दक्षिण पूर्व भोपाल से 28 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर भगवान शिव को समर्पित भोजेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस मन्दिर को पूर्व का सोमनाथ भी कहा जाता है। भोपाल से 28 किलोमीटर दूर स्थित भोजपुर की स्थापना परमार वंश के राजा भोज ने की थी। इसीलिए यह स्थान भोजपुर के नाम से चर्चित है। यह स्थान भगवान शिव के भव्य मन्दिर और साईक्लोपियन बाँध के लिए जाना जाता है। यहाँ के भोजेश्वर मन्दिर की सुन्दर सजावट की गई है। मन्दिर एक ऊँचे चबूतरे पर बना है जिसके गर्भगृह में लगभग साढ़े तीन मीटर लम्बा शिवलिंग स्थापित है। इसे भारत के सबसे विशाल शिवलिंगों में शुमार किया जाता है।
- इस मस्जिद को क़ुदसिया बेग़म की बेटी सिकंदर जहां बेग़म ने 1860 ई॰ में बनवाया था।
- यह मस्जिद भारत की सबसे विशाल मस्जिदों में एक है। इस मस्जिद का निर्माण कार्य भोपाल की आठवीं शासिका शाहजहां बे सिकंदर बेगम के शासन काल में प्रारम्भ हुआ था, लेकिन धन की कमी के कारण उनके जीवन्तपर्यंत यह बन न सकी।
शौकत महल, भोपाल और सदर मंजिल, भोपाल[संपादित करें]
- शौकत महल, भोपाल शहर के बीचोंबीच चौक एरिया के प्रवेश द्वार पर स्थित है।
- झील के किनारे बना यह महल सदर मंज़िल के पीछे स्थित है।
- बाणगंगा रोड पर स्थित इस संग्रहालय में मध्यप्रदेश के विभिन्न हिस्सों से एकत्रित की हुई मूर्तियों को रखा गया है।
- यह भवन भारत के सबसे अनूठे राष्ट्रीय संस्थानों में एक है। 1982 में स्थापित इस भवन में अनेक रचनात्मक कलाओं का प्रदर्शन किया जाता है।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय[संपादित करें]
यह अनोखा संग्रहालय श्यामला की पहाडियों पर 200 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है।
भीमबेटका शैलाश्रय|भीमबेटका गुफाएँ[संपादित करें]
- दक्षिण भोपाल से 46 किलोमीटर दूर स्थित भीमबेटका की गुफाएं प्रागैतिहासिक काल की चित्रकारियों के लिए लोकप्रिय हैं। यह गुफाएँ चारों तरफ से विन्ध्य पर्वतमालाओं से घिरी हुईं हैं, जिनका सम्बन्ध नवपाषाण काल से है। इन गुफाओं के अन्दर बने चित्र गुफाओं में रहने वाले प्रागैतिहासिक काल के जीवन का विवरण प्रस्तुत करते हैं। यहां की सबसे प्राचीन चित्रकारी को 12 हजार वर्ष पूर्व की मानी जाती है।
- शौर्य स्मारक शहर के अरेरा हिल्स इलाके में स्थित है। इसका उद्घाटन भारत के प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी के द्वारा 14 अगस्त 2016 को किया गया। स्मारक 12 एकड़ में फैला हुआ है। इसे पार्क के रूप में विकसित किया गया है और पाकिस्तान व चीन से हुए युद्धों से सम्बन्धित प्रदर्शनियाँ भी है। बोट क्लब-
बोट क्लब श्यामला हिल्स में बड़े तालाब (Upper Lake) के किनारे स्थित है। यह मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा संचालित है। यहाँ पर्यटक मोटरबोट, पेडल बोट और क्रूज बोट का आनंद ले सकते हैं। इसके अलावा जेट स्कीइंग और पैरासेलिंग की सुविधा भी उपलब्ध है। बोट क्लब प्रतिदिनप्रातः 6 बजे से सायं 7 बजे तक खुला रहता है। यहाँ प्रवेश निःशुल्क है, केवल नौकायन के लिए शुल्क देय है।
भोपाल शहर वनस्पतियों की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध शहर है। यहाँ पर्याप्त हरियाली मौजूद है।
- वायु मार्ग
भोपाल का राजा भोज हवाई अड्डा शहर से १२ कि॰मी॰ की दूरी पर है। दिल्ली, मुंबई, इंदौर, अहमदाबाद, चेन्नई, चंडीगढ़, हैदराबाद, कोलकाता, रायपुर से यहां के लिए एयर इंडिया एवम अन्य निजी एयरलाइन्स कंपनियों की नियमित उडान सेवाएँ हैं।
- रेल मार्ग
भोपाल का रेलवे स्थानक देश के विविध रेलवे स्थानकों से जुडा हुआ है। यह रेलवे स्थानक भारतीय रेल के दिल्ली-चैन्नई मुख्य मार्ग पर पड़ता है। शताब्दी एक्सप्रेस भोपाल को दिल्ली से सीधा जोडती है। साथ ही यह शहर मुम्बई, आगरा, ग्वालियर, झांसी, उज्जैन, कोलकाता, चैन्नई, बंगलूरू, हैदराबाद आदि शहरों से अनेक रेलगाडियों के माध्यम से जुडा हुआ है।
- सडक मार्ग
सांची, इंदौर, उज्जैन, खजुराहो, पंचमढी, जबलपुर आदि शहरों से आसानी से सडक मार्ग से भोपाल पहुंचा जा सकता है। मध्यप्रदेश और पड़ोसी राज्यों के अनेक शहरों से भोपाल के लिए नियमित बसें चलती हैं।
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गोलघर
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भोपाल रियासत के समय में चलने वाले बाँट
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भोपाल रियासत का प्रतीक चिन्ह, कपड़े पर कढ़ाई किया हुआ
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भोपाल रियासत के शासक को एवं उनके परिवारों के मकबरों की सूची
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उर्दू भाषा में लिखा एक दस्तावेज
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ख़िताबाद ओहदे दारान रियासत
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ख़िताबाद फरमान खायान रियासत
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उर्दू भाषा में लिखा एक दस्तावेज
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सदर मंजिल का भीतरी भाग
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सदर मंजिल का भीतरी भाग
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सदर मंजिल का भीतरी भाग
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नक्कारखाना
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कलेक्टर कार्यालय भोपाल जिसे पुराना सचिवालय से भी जाना जाता है
भोपाल शहर की कुल जनसंख्या (२०११ की जनगणना के अनुसार) कुल 95,64,817 है। भोपाल जिले की कुल जनसंख्या 23,68,145 है। जिसमे करीब 56% हिन्दू, 40% मुस्लिम हैं। पुरुषों की संख्या 12,39,378 तथा महिलाओं की संख्या 11,28,767 है। कुल साक्षरता 82.26% है (पुरुष: 87.44%, महिला: 76.57%)। 2024 में इंदौर शहर की वर्तमान अनुमानित जनसंख्या 2,788,000 है, जबकि इंदौर मेट्रो की जनसंख्या 3,081,000 अनुमानित है।[16]
भोपाल का स्थापना राजगोंड राजवंश के राजा भूपाल सिंह शाह सल्लाम ने 669-679CE में किया था। उनके राज्य की राजधानी भूपाल ही था, जो अब मध्य प्रदेश का एक जिला और राजधानी है। शहर का पूर्व नाम 'भूपाल' था जो राजा भूपाल सिंह शाह सल्लाम के नाम पर बना था। गोंड राजवंश राजाओं के अस्त के बाद यह शहर कई बार लूट का शिकार बना।
भोपाल रियासत 18वीं शताब्दी के भारत में एक सहायक राज्य था। 1818 से 1947 तक ब्रिटिश भारत के साथ सहायक गठबंधन में 19-बंदूक की सलामी के साथ एक रियासत और 1947 से 1949 तक एक स्वतंत्र राज्य। इस्लामनगर राज्य की स्थापना की गई थी। और सेवा की। पहली राजधानी इस्लामनगर थी। जिसे बाद में भोपाल शहर में स्थानांतरित कर दिया गया।[2]
मुगल सेना में पश्तून सैनिक, दोस्त मोहम्मद खान (1672-1728) द्वारा भोपाल राज्य की स्थापना की गई थी। बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के बाद, खान ने राजनीतिक रूप से अस्थिर मालवा क्षेत्र में कई स्थानीय सरदारों को भाड़े की सेवाएं प्रदान करना शुरू कर दिया। 1709 में, उन्होंने बेरसिया स्टेट के पट्टे पर लिया। बाद में, उसने मंगलगढ़ की राजपूत रियासत और रानी कमलापति के गोंड साम्राज्य की, उनकी महिला शासकों की मृत्यु के बाद, जिन पर वह भाड़े की सेवा प्रदान कर रहा था, की शुरुआत की। उन्होंने मालवा में कई अन्य क्षेत्रों को भी अपने राज्य में मिला लिया। 1723 के दशक की शुरुआत में, खान ने भोपाल शहर को एक गढ़वाले शहर में स्थापित किया और नवाब की उपाधि धारण की। खान सैय्यद ब्रदर्स के करीबी बन गए, जो मुगल दरबार में अत्यधिक प्रभावशाली राजा-निर्माता बन गए थे। सैय्यद के लिए खान के समर्थन ने प्रतिद्वंद्वी मुगल महानुभाव निजाम-उल-मुल्क की दुश्मनी अर्जित की, जिन्होंने मार्च 1724 में भोपाल पर आक्रमण किया, खान को अपने क्षेत्र में भाग लेने के लिए मजबूर किया, अपने बेटे को बंधक के रूप में त्याग दिया, और निजाम की आत्महत्या स्वीकार कर ली।
दोस्त मोहम्मद खान और उनके पठान ओरकजई वंश ने भोपाल की नींव में संस्कृति और वास्तुकला के लिए इस्लामी प्रभाव लाया। भोपाल शहर के अलावा, जो उनकी राजधानी थी, मोहम्मद खान ने भी जगदीशपुर के पास के किले का जीर्णोद्धार कराया और इसका नाम बदलकर इस्लामनगर रखा। फिर भी, दोस्त मोहम्मद को अपनी गिरावट के वर्षों में हार का सामना करना पड़ा। 1728 में खान की मृत्यु के बाद, भोपाल राज्य ओरकजई वंश के प्रभाव में रहा।
1737 में, पेशवा बाजी राव प्रथम के नेतृत्व में मराठों ने भोपाल की लड़ाई में मुगलों और भोपाल के नवाब की सेनाओं को हराया। मराठों की जीत के बाद, भोपाल एक अर्ध-स्वायत्त राज्य के रूप में मराठा साम्राज्य की अधीनता में आया और 1818 में तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध तक बना रहा।
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दोस्त मोहम्मद खान की भोपाल स्थित कब्र
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दोस्त मोहम्मद खान का मकबरा
दोस्त मोहम्मद खान के बेटे और उत्तराधिकारी, नवाब यार मोहम्मद खान (r.1728-1742) भोपाल से इस्लामनगर की राजधानी चले गए। हालांकि, उनके उत्तराधिकारी, नवाब फैज़ मुहम्मद खान (r.1742–1777) भोपाल वापस चले गए, जो 1949 में गिरने तक भोपाल राज्य की राजधानी बना रहेगा। फ़ैज़ मुहम्मद खान एक धार्मिक वैरागी थे, और राज्य पर उनकी प्रभावशाली सौतेली माँ ममोला बाई का प्रभावी शासन था।
1818 में तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध के बाद राज्य ब्रिटिश रक्षक बन गया और 1949 तक दोस्त मोहम्मद खान के ओराकजई वंशजों द्वारा शासन किया गया, जब इसे सत्तारूढ़ राजवंश के खिलाफ एक लोकप्रिय विद्रोह के बाद भारत के डोमिनियन द्वारा रद्द कर दिया गया था। भोपाल राज्य को 1949 में भारत संघ में मिला दिया गया था। 1901 में राज्य की जनसंख्या 665,961 थी और औसत राजस्व रु 25,00,000 था।
भोपाल के प्रारंभिक (669-679 ई० तक) राजा भूपाल सिंह शाह सल्लाम थे। उनके राज्य की राजधानी भूपाल ही था, जो अब मध्य प्रदेश का एक जिला और राजधानी है। शहर का पूर्व नाम 'भूपाल' था जो राजा भूपाल सिंह शाह सल्लाम के नाम पर बना था। गोंड राजवंश राजाओं के अस्त के बाद यह शहर कई बार लूट का शिकार बना।
1738 में पेशवा बाजी राव प्रथम के नेतृत्व में मराठों ने भोपाल की लड़ाई में मुगलों और भोपाल के नवाब की सेनाओं को हराया। मराठों की जीत के बाद, भोपाल एक अर्ध-स्वायत्त राज्य के रूप में मराठा साम्राज्य की अधीनता में आ गया।
मराठों ने आसपास के कई राज्यों पर विजय प्राप्त की, जिनमें पश्चिम में इंदौर और उत्तर में ग्वालियर शामिल हैं, लेकिन दोस्त मोहम्मद खान के उत्तराधिकारियों के तहत भोपाल एक मुस्लिम शासित राज्य बना रहा। इसके बाद, एक सामान्य नवाब वज़ीर मोहम्मद खान ने एक स्थिर अर्ध-स्वायत्त राज्य बनाया।
नवाब जहाँगीर मोहम्मद खान ने किले से एक मील की दूरी पर एक छावनी की स्थापना की। इसे उनके बाद जहांगीराबाद कहा जाता था। उन्होंने जहांगीराबाद में ब्रिटिश मेहमानों और सैनिकों के लिए उद्यान और बैरक का निर्माण किया।
1778 में, प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान, जब ब्रिटिश जनरल थॉमस गोडार्ड ने पूरे भारत में अभियान चलाया, तो भोपाल रियासत उन कुछ राज्यों में से एक था, जो अंग्रेजों तक पहुँच गए थे। 1809 में, द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान, जनरल क्लोज़ ने मध्य भारत में एक ब्रिटिश अभियान का नेतृत्व किया। भोपाल के नवाब ने ब्रिटिश संरक्षण में प्राप्त करने के लिए व्यर्थ याचिका दायर की। 1817 में, जब तीसरा एंग्लो-मराठा युद्ध शुरू हुआ, तो भारत सरकार और भोपाल के नवाब के बीच निर्भरता की संधि पर हस्ताक्षर किए गए। भारत में ब्रिटिश राज के दौरान भोपाल ब्रिटिश सरकार का मित्र बना रहा।
फरवरी-मार्च 1818 में, भोपाल ईस्ट इंडिया कंपनी और नवाब नज़र मुहम्मद खान (1816–1819 के दौरान भोपाल का नवाब) के बीच एंग्लो-भोपाल संधि के परिणामस्वरूप ब्रिटिश भारत में एक रियासत बन गया। भोपाल राज्य में वर्तमान भोपाल, रायसेन और सीहोर जिले शामिल थे, और मध्य भारत एजेंसी का हिस्सा था। इसने विंध्य रेंज का विस्तार किया, जिसका उत्तरी भाग मालवा पठार पर और दक्षिणी भाग नर्मदा नदी की घाटी में स्थित था, जिसने राज्य की दक्षिणी सीमा बनाई। भोपाल एजेंसी का गठन मध्य भारत के प्रशासनिक खंड के रूप में किया गया था, जिसमें भोपाल राज्य और उत्तर-पूर्व के कुछ राज्य शामिल थे, जिसमें खिलचीपुर, नरसिंहगढ़, राजगढ़ और 1931 के बाद देवास राज्य शामिल थे। यह भारत के ब्रिटिश गवर्नर-जनरल को एक एजेंट द्वारा प्रशासित किया गया था।
- 1- नवाब सूरज सिंह शाह 1675 - 1703
- 2- नवाब निजाम शाह = 1703 - 1720
- 3- नवाब आलम शाह = 1720 - 1723 (निजाम शाह के मृत्य के बाद उनका भतीजा)
- 1-नवाब दोस्त मुहम्मद खान (1723-1728)
- 2- नवाब यार मुहम्मद खान (1728-1742)
- 3- नवाब फैज़ मुहम्मद खान (1742-1777)
- 4- नवाब हयात मुहम्मद खान (1777-1807)
- 5- नवाब ग़ौस मुहम्मद खान (1807-1826)
- 6- नवाब वज़ीर मुहम्मद खान (ग़ौस मुहम्मद खान के विरोध में) - (1807-1816)
- 7- नवाब नज़र मुहम्मद खान (वज़ीर मुहम्मद खान का पुत्र) - (1816-1819)
- 8- नवाब सुल्तान कुदसिया बेगम (ग़ज़ल मुहम्मद की बेटी और नज़र मुहम्मद खान की पत्नी) - (1819-1937)
- 9- नवाब जहाँगीर मुहम्मद खान (सिकंदर जहाँ बेगम के पति) - (1837-1844)
- 10- नवाब सिकंदर जहाँ बेगम (1860-1868)
- 11- नवाब सुल्तान शाहजहाँ बेगम (1844-1860 और 1868-1901)
- 12- कखोरो जहान बेगम भोपाल (1901-1926)
- 13- नवाब हमीदुल्ला खान (1926-1949)
भोपाल राज्य का स्वतंत्रता संघर्ष[संपादित करें]
15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्रत हुआ था, उस समय भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खाँ ने भोपाल राज्य को स्वतंत्र रखने का निर्णय लिया। परन्तु वर्ष 1948 में भोपाल राज्य की भारत में विलय की मांग उठने लगी , जिसके नेतृत्व में भाई रतन कुमार, ठाकुर ललसिंघ, रामचरण राय, डॉ शंकरदायल शर्मा, प्रो. अक्षय कुमार, पत्रकार प्रेम श्रीवास्तव, सूरजमल जैन,बालकृष्ण गुप्त, मोहनी देवी, शांति देवी और बसंती देवी आदि लोग सम्मिलित थे। इस आंदोलन को गति देने के लिए भाई रतन कुमार और उनके सहयोगियों ने नई राह नामक' अखबार निकाला। इस आंदोलन का केंद्र जुमेराती स्थित रतन कुटी था , जहां 'नई राह' रहा अखबार का कार्यालय भी था। परन्तु नवाब के आदेश पर इस कार्यालय को बंद कर दिया गया। तब होशंगाबाद से एडवोकेट बाबूलाल वर्मा के घर से भूमिगत होकर आंदोलन चलाया गया। अंततः जनता का दबाव देखकर सरदार पटेल ने हस्तक्षेप किया, जिसके कारण भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खां को विवश होकर विलय समझौते पर हस्ताक्षर करने पड़े। इस प्रकार भोपाल 1 जून 1949 को भारत में सम्मिलित हो गया।
भोपाल नवाब ने 'भारत माता की जय' बोलने वालों को गोलियों से भून दिया था
भारत देश भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया था, लेकिन भोपाल के नागरिकों को आजादी नहीं मिली। 15 अगस्त 1947 से लगातार 01 जून 1949 तक यानी 659 दिन भोपाल पर नवाब का शासन रहा। यहां भारत का राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराना गुनाह माना जाता था। अंतत: एक जबर्दस्त संघर्ष के बाद 01 जून 1949 को भोपाल में तिरंगा लहराया और आजादी का ऐलान किया गया।
नवाब हमीदुल्ला खाॅं भोपाल को स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे
भोपाल रियासत के भारत गणराज्य में विलय में लगभग दो साल का समय इसलिए लगा कि, भोपाल नवाब हमीदुल्ला खाॅं इसे स्वतंत्र रियासत के रूप में रखना चाहते थे। साथ ही हैदराबाद निजाम उन्हें पाकिस्तान में विलय के लिए प्रेरित कर रहे थे जो कि भौगोलिक दृष्टि से असंभव था। आजादी के इतने समय बाद भी भोपाल रियासत का विलय न होने से जनता में भारी आक्रोश था जो विलीनीकरण आन्दोलन में परिवर्तित हो गया, जिसने आगे जाकर उग्र रूप ले लिया।
आजादी के लिए विलीनीकरण आन्दोलन चलाया गया
भोपाल रियासत के भारत संघ में विलय के लिए चल रहे विलीनीकरण आन्दोलन की रणनीति और गतिविधियों का मुख्य केन्द्र भोपाल स्थित रतनकुटी ही था। नवाबी शासन ने आन्दोलन को दबाने का पूरा प्रयास किया। आन्दोलनकारियों पर लाठिया-गोलियां चलवाईं गईं।
भोपाल की आजादी के लिए बोरास में 4 युवक शहीद हुए
भोपाल की नई पीढ़ी के कुछ ही लोगों को यह जानकारी होगी कि भोपाल रियासत के विलीनीकरण मेें रायसेन जिले के ग्राम बोरास में 4 युवा शहीद हुए। यह चारों शहीद 30 साल से कम उम्र के थे। इनकी उम्र को देखकर उस वक्त युवाओं में देशभक्ति के जज्बे का अनुमान लगाया जा सकता है। शहीद होने वालों में श्री धनसिंह आयु 25 वर्ष, मंगलसिंह 30 वर्ष, विशाल सिंह 25 वर्ष और एक 16 वर्षीय किशोर मा. छोटेलाल शामिल था। इन शहीदों की स्मृृति में उदयपुरा तहसील के ग्राम बोरास में नर्मदा तट पर 14 जनवरी 1984 में शहीद स्मारक स्थापित किया गया है। नर्मदा के साथ-साथ बोरास का यह शहीद स्मारक भी उतना ही पावन और श्रृद्धा का केन्द्र है। प्रतिवर्ष यहां 14 जनवरी को विशाल मेला आयोजित होता आ रहा है।
भोपाल में भारत माता की जय का नाला लगाने वालों को गोलियों से भून दिया गया था
14 जनवरी 1949 को उदयपुरा तहसील के ग्राम बोरास के नर्मदा तट पर विलीनीकरण आन्दोलन को लेकर विशाल सभा चल रही थी। सभा को चारों ओर से भारी पुलिस बल ने घेर रखा था। सभा में आने वालों के पास जो लाठियां और डण्डे थे उन्हें पुलिस ने रखवा लिया था। विलीनीकरण आन्दोलन के सभी बड़े नेताओं को पहले ही बन्दी बना लिया गया था। बोरास में 14 जनवरी को तिरंगा झण्डा फहराया जाना था। आन्दोलन के सभी बड़े नेतओं की गैर मौजूदगी को देखते हुएं बैजनाथ गुप्ता आगे आए और उन्होंने तिरंगा झण्डा फहराया। तिरंगा फहराते ही बोरास का नर्मदा तट भारत माता की जय और विलीनीकरण होकर रहेगा नारों से गूंज उठा। पुलिस के मुखिया ने कहा जो विलीनीकरण के नारे लगाएगा, उसे गोलियों से भून दिया जाएगा। उस दरोगा की यह धमकी सुनते ही एक 16 साल का किशोर छोटेलाल हाथ में तिरंगा लेकर आगे आया और उसने भारत माता की जय और विलीनीकरण होकर रहेगा नारा लगाया। पुलिस ने छोटेलाल पर गोलियां चलाई और वह गिरता इससे पहले धनसिंह नामक युवक ने तिरंगा थाम लिया, धनसिंह पर भी गोलिया चलाई गई, फिर मगलसिंह पर और विशाल सिंह पर गोलियां चलाई गईं लेकिन किसी ने भी तिरंगा नीचे नहीं गिरने दिया। ये चारो युवा शहीद हो गए लेकिन तिरंगा नीचे नहीं गिरने दिया। इस गोली काण्ड में कई लोग गम्भीर रूप से घायल हुए। बोरास में आयोजित विलीनीकरण आन्दोलन की सभा में होशंगाबाद, सीहोर से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे।
बोरास गोली कांड से भड़के आंदोलनकारी, नवाब डर गया
बोरास में 16 जनवरी को शहीदों की विशाल शव यात्रा निकाली गई जिसमें हजारों लोगों ने अश्रुपूरित श्रृृद्धांजली के साथ विलीनीकरण आन्दोलन के इन शहिदों को विदा किया। अंतिम विदाई के समय बोरास का नर्मदा तट शहीद अमरे रहे और भारत माता की जय के नारो से आसमान गुंजायमान हो उठा। बोरास के गोली काण्ड की सूचना सरदार वल्लभ भाई पटेल को मिलते ही उन्होंने श्री बीपी मेनन को भोपाल भेजा था। भोपाल रियासत का 01 जून 1949 को भारत गणराज्य में विलय हो गया और भारत की आजादी के 659 दिन बाद भोपाल में तिरंगा झण्डा फहाराया गया।
- भोपाल राज्य (१९४९-५६)
- भोपाल
- भोपाल का इतिहास
संदर्भ / स्रोत
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