मस्जिद-ए-जहाँनुमा , जिसे आमतौर से जामा मस्जिद के नाम से जाना जाता है, पुरानी दिल्ली में स्थित भारत के सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है। [1] इसे 1644 और 1656 के बीच मुग़ल सम्राट शाह जहाँ द्वारा निर्मित किया गया था तथा इसके पहले इमाम अब्दुल ग़फूर शाह बुख़ारी थे। मुग़ल राजधानी शाहजहानाबाद में स्थित, यह मुग़ल सम्राटों की शाही मस्जिद होती थी। जामा मस्जिद भारत पर मुग़ल सत्ता को दर्शाता था। यह ब्रिटिश काल के दौरान भी एक महत्तवपूर्ण स्थल था। मस्जिद आज तक सक्रिय है और यह दिल्ली के सबसे विख्यात स्थलों में से एक है। इसे राष्ट्रीय महत्तव के स्मारकों की सूची में शामिल किया गया है। [2]
मस्जिद-ए-जहाँनुमा, जिसे आमतौर से जामा मस्जिद के नाम से जाना जाता है, पुरानी दिल्ली में स्थित भारत के सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है।[1] इसे 1644 और 1656 के बीच मुग़ल सम्राट शाह जहाँ द्वारा निर्मित किया गया था तथा इसके पहले इमाम अब्दुल ग़फूर शाह बुख़ारी थे। मुग़ल राजधानी शाहजहानाबाद में स्थित, यह मुग़ल सम्राटों की शाही मस्जिद होती थी। जामा मस्जिद भारत पर मुग़ल सत्ता को दर्शाता था। यह ब्रिटिश काल के दौरान भी एक महत्तवपूर्ण स्थल था। मस्जिद आज तक सक्रिय है और यह दिल्ली के सबसे विख्यात स्थलों में से एक है। इसे राष्ट्रीय महत्तव के स्मारकों की सूची में शामिल किया गया है।[2]
नाम
इस मस्जिद के दो नाम हैं। पुराना नाम, मस्जिद-ए-जहाँनुमा (अर्थ: "मस्जिद जो विश्व को दर्शाता है"), शाह जहाँ द्वारा दिया गया था, जो संभवतः जाम-ए-जहाँनुमा का उल्लेख है। दूसरा नाम जामा मस्जिद ज़्यादा सामान्य है, जो विश्व के ऐसे अन्य मस्जिदों को भी कहा जाता है।[3][4]
अवस्थिति
मस्जिद शाहजहानाबाद (वर्तमान पुरानी दिल्ली) में स्थित है। मस्जिद के सामने स्थित लाल क़िला और सुनहरी मस्जिद हैं।[5] पुरानी दिल्ली का एक मुख्य केन्द्र होने के नाते, जामा मस्जिद चाँदनी चौक जैसे विभिन्न हाटों से घिरी हुई है।[6] इसके बग़ल में स्थित स्वतंत्रता कार्यकर्ता मौलाना आज़ाद का मक़बरा है।[7]
इतिहास
निर्माण और मुग़ल काल
मुग़ल सम्राट शाह जहाँ ने 1650 और 1656 के बीच मस्जिद को शाहजहानाबाद के उच्चतम स्थान पर निर्मित किया। इसका निर्माण लगभग 5,000 श्रमिकों द्वारा किया गया था।[8][9][10] विविध कार्यबल में भारतीय, अरब, तुर्क और यूरोपीय लोग थे। निर्माण का पर्यवेक्षण वज़ीर सादुल्ला ख़ान और शाह जहाँ के घर के प्रबंधक फ़ाज़िल ख़ान द्वारा किया गया था। उस समय निर्माण की लागत दस लाख रुपये थी।[11]:8–9 मस्जिद का उद्घाटन 23 जुलाई 1656 को बुख़ारा से सैयद अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुख़ारी द्वारा ने किया। शाह जहाँ ने उन्हें मस्जिद का शाही इमाम बनाया।[12]
यह मस्जिद शाह जहाँ के अंतिम स्मारकों में से एक थी। इसके निर्माण के बाद, यह मुग़ल सम्राटों की शाही मस्जिद रही। जुमा की नमाज़ के समय, सम्राट ख़ुतबा पढ़ते थे। इस प्रकार यह मस्जिद भारत पर मुग़ल शासन का प्रतीक था। यह शाहजहानाबाद के निवासियों के लिए एक महत्तवपूर्ण केन्द्र भी था, जहाँ सब वर्गों के विविध लोग बातचीत कर सकते थे।[3][13] 1757 को, ख़ुतबे को अफ़ग़ानी शासक अहमद शाह दुर्रानी के नाम में पढ़ा गया था, जिन्हें आलमगीर द्वितीय ने दिल्ली में बुलाया था।[14]
ब्रिटिश काल
ब्रिटिश ने 1803 को शाहजहानाबाद पर क़ब्ज़ा किया। मुग़ल सम्राट मस्जिद के अनुष्ठानिक प्रमुख रहें, किन्तु उनकी सत्ता काफ़ी घट चुकी थी।[15][16] शहर में ब्रिटिश नीति लोगों के लिए अनुकूल थी; ब्रिटिश ने जामा मस्जिद की मरम्मत यहाँ तक कि जीर्णोद्धार भी करवाया।[15] दिल्ली के दूसरी मस्जिदों जैसे, यह मस्जिद समाजिक और राजनीतिक चर्चा का स्थान रहा; उदाहरणार्थ, मुसलमानों और ईसाइयों के बीच धार्मिक और दार्शनिक बहसें होती थी।[17]
1857 की क्रांति इस काल में एक महत्तवपूर्ण घटना थी। क्रांति से शहर में रहने वाले कई ब्रिटिश व्यक्तियों की मृत्यु हुई और ब्रिटिश सत्ता निर्बल हो गई थी।[15] इससे मुग़ल साम्राज्य का भी अंत हुआ। ब्रिटिश ने माना की इस क्रांति के पीछे मुसलमान थे, जिन्होनें दिल्ली की मस्जिदों में इसे भड़काया।[18] उसी वर्ष जब ब्रिटिश ने शाहजहानाबाद में अपनी सत्ता को पुनःस्थापित किया, उन्होनें अनेक मस्जिदों को ढाया और बची हुई मस्जिदों में मुसलमानों की जमात पर प्रतिबंध लगाया। जामा मस्जिद को ज़ब्त किया गया था। इसे कई बार नष्ट करने पर विचार किया गया था, किन्तु बाद में ब्रिटिश ने इसका प्रयोग अपने सिख और यूरोपीय सिपाहियों के लिए बैरक के तौर से किया। यह मस्किद का अनादर था; अज़ीज़ मानते हैं की यह शहर के मुस्लिम निवासियों की भावनाओं का अपमान करने के लिए जानबूझकर किया गया था।[19]
ब्रिटिश के यह निर्णय के बढ़ते आक्रोश हेतु इस मस्जिद को 1862 में खोला गया था। इस बार कई शर्तें लागू की गई थी; मस्जिद का प्रयोग केवल धार्मिक मक़सद के लिए वैध था और ब्रिटिश गश्त आवश्यक थी। इन शर्तों को लागू रखने के लिए जामा मस्जिद प्रबंधन समिति (JMMC) को स्थापित किया गया था।[20][21]
हालाँकि मुग़ल साम्राज्य भंग हो चुका था, मस्जिद विभिन्न मुस्लिम शासकों का संरक्षण पाया। 1886 को, रामपुर के नवाब ने मस्जिद की मरम्मत के लिए 1,55,000 रुपये दान किया। 1926 को, हैदराबाद के निज़ाम ने भी 1 लाख रुपये दान किया।[22]
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अशांति 1911 से दिल्ली की मस्जिदों में शुरू हुई। नियमों के विरुद्ध, मस्जिद का प्रयोग राजनीतिक कार्य के लिए किया जाने लगा। जबकि ब्रिटिश सार्वजनिक स्थानों पर गश्त करके ऐसे कार्यों को रोक सकते थे, जामा मस्जिद धार्मिक स्थल होने के नाते दोनों विधि (धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम, 1863) दिल्लीवालों की भावनाओं द्वारा ऐसे वार्यवाही से संरक्षित था।[23] उनके बीच बढ़ती तनाव के बावुजूद, हिन्दुओं अक्सर मुसलमानों के साथ औपनिवेशिक विरोधी एकता व्यक्त करने के लिए मस्जिद के अंदर इकट्ठा होते थे।[24]
उत्तर औपनिवेशिक काल
जामा मस्जिद भारत के स्वतंत्रता के बाद भी एक राजनैतिक प्रतीक रहा। स्वतंत्रता कार्यकर्ता मौलाना आज़ाद ने 23 अक्टूबर 1947 को गुरुवार के नमाज़ के समय भाषण दिया। देश के विभाजन से दिल्ली में बड़े जनसंख्या प्रवास हुए थे। आज़ाद ने दिल्ली के मुसलमानों को भारत में रहने का निवेदन किया और उनको विश्वास दिलाया कि भारत उनकी मातृभूमि थी।[25]
1948 को, हैदराबाद के अंतिम निज़ाम, मीर उस्मान अली ख़ान से मस्जिद के फ़र्श के एक चौथाई भाग की मरम्मत के लिए 75,000 रुपये का दान माँगा गया था। निज़ाम ने उसके बजाय 3 लाख रुपये का दान दिया, और कहा कि फ़र्श का तीन चौथाई भाग पुराना नहीं दिखना चाहिए।[26][27]
मस्जिद बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित होने के लिए भी जाना जाता है। 1986 को मस्जिद के शाही इमाम अब्दुल्ला बुख़ारी ने इस विवाद के बारे में कई भाषण दिए, जिनमें वह हिन्दुओं को दिया गया समर्थन की निंदा की और मुसलमानों की भावनाओं को भड़काएँ। एक बार इस कारण पुरानी दिल्ली में दंगे और झड़पें भड़क उठीं। 1987 में, जामा मस्जिद में बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित एक प्रमुख शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। 28 मई 1987 को, देश भर में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और दंगों के बीच, सरकार के आक्रोश में जामा मस्जिद इमाम द्वारा बंद एवं काले कपड़े से सजाई गई थी। यह निर्णय इस्लामी नेतृत्व के बीच बहुत विवादास्पद था।[28]
आधुनिक काल
जामा मस्जिद दिल्ली की मुख्य मस्जिद है।[29] शहर के मुसलमान वहाँ जुमे की नमाज़ और ईद जैसे त्यौहारों के लिए जाते है। मस्जिद एक प्रमुख पर्यटन स्थल भी है, और अपना आय ज़्यादातर विदेशियों के दौरे से पाती है।[30]
मस्जिद का प्रयोग राजनीतिक कार्य के लिए आज भी किया जाता है। उदाहरणार्थ, 2001 को, 9/11 हमलों के बाद, मस्जिद में अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी बमबारी के विरुद्ध प्रदर्शन किए गए थे।[31] 2019 को, वहाँ नागरिकता संशोधन अधिनियम हेतु सामुहिक विरोध प्रदर्शन हुए थे।[32]
नवीकरण
2006 को, मस्जिद की मरम्मत की अत्यावश्यकता थी, जिसके बाद सऊदी अरब के राजा अब्दुल्ला ने उसकी लागत उठाने का प्रस्ताव किया। इमाम ने कहा कि उन्हें यह प्रस्ताव सीधे सऊदी अधिकारियों से मिला था, किंतु उन्होंने उनको भारत सरकार से मिलने के लिए कहा था।[33] हालाँकि दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि इस मामले के पास कुछ "क़ानूनी महत्तव" नहीं है और इमाम कोई "विशेष साम्या" नहीं दी गई थी।
अनेक प्रशासनिक रुकावटों के कारण, मस्जिद की नवीकरण की एक परियोजना को दशक 2000 की शुरुआत से रोका गया है।[34][35]
2006 जामा मस्जिद बमबारियाँ
14 अप्रैल 2006, जुमे की नमाज़ों के तुरंत बाद मस्जिद में दो विस्फोट हुए। स्पष्ट नहीं हो पाया कि विस्फोट कैसे हुए। हताहतों में से, एक व्यक्ति बुरे तरह से घायल थे, जबकि आठ अन्य लोग। इमाम अहमद बुख़ारी ने कहा, "हमारे लोगों के बीच ग़ुस्सा है लेकिन में उन्हें शांत रखने की कोशिश कर रहा हूँ"।[36]
2010 जामा मस्जिद आक्रमण
15 सितंबर 2010 को, मोटरसाइकिल पर बैठे बंदूक़धारियों ने मस्जिद के तीसरे द्वार के पास खड़े बस पर गोली चलाई, जिससे दो ताइवानी पर्यटक घायल हुए।[37] हमले के बाद, पुलिस ने पूछताछ के लिए 30 व्यक्तियों को हिरासत में लिया और अपराध के स्थल को घेर लिया था।[38]
नवंबर 2011 को, दिल्ली पुलिस ने भारतीय मुजाहिदीन (IM) के छह सदस्यों को गिरफ़्तार किया, जिन्हें जामा मस्जिद दुर्घटना के साथ-साथ पुणे बमबारी के पीछे भी माना जा रहा था। स्रोतों ने कहा की समूह के 'नेता' इमरान ने मस्जिद के बाहर खड़ी गाड़ी में बम लगाया था।[39] सितंबर 2013 को कहा गया था कि समूह के एक नेता यासीन भटकल के साथ असदुल्ला अख़्तर को एक महीने पहले गिरफ़्तार किया गया था और उन्होंने स्वीकार कर लिया था कि वे पाकिस्तानी फ़रार अपराधी वक़ास के साथ हमला किया। यासीन ने कहा कि हमले का आदेश IM के मुखिया रियाज़ भटकल ने दिया, क्योंकि इमाम "आधे नंगे" पर्यटकों को मस्जिद के अंदर आने दिया।[40]
वास्तुकला
जामा मस्जिद दिल्ली में शाह जहाँ की नई राजधानी शाहजहानाबाद का भाग होता था। इसके निर्माण के समय, यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी। शाह जहाँ ने कहा कि इसे फ़तेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद के अनुरूप निर्मित किया गया था, और इसे आँगन और बाहरी अभिकल्प में देखा जा सकता है। हालाँकि, मस्जिद का आंतरिक भाग आगरा की जामा मस्जिद को दर्शाता है।[41]:202 मस्जिद ज़्यादातर लाल बलुए पत्थर से बनी है, और इसमें अन्य मस्जिदों से ज़्यादा श्वेत संगमरमर है। काला संगमरमर भी एक सजावट है।[42][41]:250 अरबी और फ़ारसी सुलेख मस्जिद के विभिन्न स्तहों में प्रकट हैं।[42][41]:202 [43]
एक पहाड़ी पर निर्मित होने के नाते, मस्जिद शहर से 10 m ऊँचे चबूतरे पर स्थित है।[42][43] परिसर मक्का की ओर पश्चिम की दिशा में स्थित है।[43] इसके पास में एक शाही महाविद्यालय, शाही औषधालय और एक मदरसा होता था, लेकिन वे 1857 के विद्रोह के दौरान नष्ट हो गए थे।[44]
द्वार
मस्जिद के दो द्वार हैं। मुख्य द्वार, जो तीन-मंज़िला पूर्वी द्वार है, मस्जिद का शाही प्रदेश होता था, जिससे केवल सम्राट और उनके सहयोगियों अंदर आ सकते थे। दूसरे दो प्रदेश उत्तरी और दक्षिणी द्वार हैं, जो दो मंज़िले हैं और जहाँ आम लोग जाते थे।[10][45] हर द्वार के सामने तीन क़दम वाली सीढ़ी है, जहाँ नमाज़ की मुद्राएँ श्वेत रंग से चिह्नित हैं।[10]
शाही इमाम
शाह जहाँ की इच्छा भारत की सबसे महान मस्जिद बनाने की थी। वह यह भी चाहते थे कि उस मस्जिद के इमाम साम्राज्य के सबसे बड़े धार्मिक नेता होंगे। इस प्रकार जामा मस्जिद के इमाम को शाही इमाम की उपाधि दी गई। औरंगज़ेब के राज से सभी मुग़ल सम्राटों को दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम द्वारा ताज पहनाया गया था।[46]
सारे शाही इमाम मस्जिद के पहले इमाम, सैयद अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुख़ारी, के वंशज हैं, जिन्हें शाह जहाँ द्वारा चुना गया था।[11]:34–35 वर्तमान इमाम के होने वाले उत्तराधिकारी को नायब इमाम कहा जाता है।[28] शाही इमामों का उपनाम बुख़ारी है, क्योंकि उनकी वंशावली बुख़ारा से है।
| सं. |
नाम |
उपाधि |
शुरू |
अंत |
कार्यकाल
|
| &&&&&&&&&&&&&&01.&&&&&01 |
अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुख़ारी |
इमाम-उस-सुल्तान |
23 जुलाई 1656 (1656-07-23) |
| &&&&&&&&&&&&&&02.&&&&&02 |
अब्दुल शकूर शाह बुख़ारी |
| &&&&&&&&&&&&&&03.&&&&&03 |
अब्दुल रहीम शाह बुख़ारी |
| &&&&&&&&&&&&&&04.&&&&&04 |
अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुख़ारी द्वितीय |
| &&&&&&&&&&&&&&05.&&&&&05 |
अब्दुल रहमान शाह बुख़ारी |
| &&&&&&&&&&&&&&06.&&&&&06 |
अब्दुल करीम शाह बुख़ारी |
| &&&&&&&&&&&&&&07.&&&&&07 |
मीर जीवन शाह बुख़ारी |
| &&&&&&&&&&&&&&08.&&&&&08 |
मीर अहमद अली शाह बुख़ारी |
| &&&&&&&&&&&&&&09.&&&&&09 |
मोहम्मद शाह बुख़ारी |
16 अक्टूबर 1892 (1892-10-16) |
| &&&&&&&&&&&&&010.&&&&&010 |
अहमद बुख़ारी |
शम्स-उल-उलमा |
| &&&&&&&&&&&&&011.&&&&&011 |
हमीद बुख़ारी |
20 फ़रवरी 1942 (1942-02-20) |
8 जुलाई 1973 (1973-07-08) |
31 वर्ष, 138 दिन
|
| &&&&&&&&&&&&&012.&&&&&012 |
अब्दुल्ला बुख़ारी |
8 जुलाई 1973 (1973-07-08) |
14 अक्टूबर 2000 (2000-10-14) |
27 वर्ष, 98 दिन
|
| &&&&&&&&&&&&&013.&&&&&013 |
अहमद बुख़ारी |
14 अक्टूबर 2000 (2000-10-14) |
25 फ़रवरी 2024 (2024-02-25) |
23 वर्ष, 134 दिन
|
| &&&&&&&&&&&&&014.&&&&&014 |
शाबान बुख़ारी |
25 फ़रवरी 2024 (2024-02-25) |
पदधारी |
2 वर्ष, 243 दिन
|
| स्रोत:[47][11]:34–35
|
गैलरी
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मुख्य प्रवेश
-
अन्दर से मुख्य प्रवेश
-
मुख्य प्रवेश का लोहे का दरवाज़ा
-
बीच की गुम्बद
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मीनारें
-
महराबें
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प्रवेश द्वार
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अन्दर से मुख्य प्रवेश
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अन्दर का भाग, महराबें
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महराबें
-
मुख्य महराब
-
मस्जिद से लाल क़िले का दृश्य
-
जामा मस्जिद का एक दृश्य