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उज्जैन

उज्जैन (प्राचीन अवंती) ऐसा ही एक नगर है, जिसका महत्व समय की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है। उज्जैन (अंग्रेज़ी: Ujjain) भारत के मध्य प्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है जो क्षिप्रा नदी या शिप्रा नदी के किनारे पर बसा है। यह एक अत्यन्त प्राचीन शहर है। यह महान सम्राट विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी थी । उज्जैन को कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हर 12 वर्ष पर सिंहस्थ महाकुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल इस नगरी में स्थित है। उज्जैन मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इन्दौर से 45 कि॰मी॰ पर है। उज्जैन के प्राचीन नाम अवन्तिका, उज्जयिनी, कनकश्रन्गा आदि है। उज्जैन…

उज्जैन (प्राचीन अवंती) ऐसा ही एक नगर है, जिसका महत्व समय की सीमाओं से कहीं आगे तक जाता है। उज्जैन (अंग्रेज़ी: Ujjain) भारत के मध्य प्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है जो क्षिप्रा नदी या शिप्रा नदी के किनारे पर बसा है। यह एक अत्यन्त प्राचीन शहर है। यह महान सम्राट विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी थी । उज्जैन को कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हर 12 वर्ष पर सिंहस्थ महाकुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल इस नगरी में स्थित है। उज्जैन मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इन्दौर से 45 कि॰मी॰ पर है। उज्जैन के प्राचीन नाम अवन्तिका, उज्जयिनी, कनकश्रन्गा आदि है। उज्जैन मंदिरों की नगरी है। यहाँ कई तीर्थ स्थल है। इसकी जनसंख्या 515215 लाख सन ,2011 की जनगणना के हिसाब से है। यह मध्य प्रदेश का पाँचवा सबसे बड़ा शहर है। नगर निगम सीमा का क्षेत्रफल 152 वर्ग किलोमीटर है।

दर्शनीय स्थल

  • महाकालेश्‍वर ज्योतिर्लिङ्ग
  • चिन्तामणी गणेश
  • स्थिरमन गणेश
  • चक्रतीर्थ गणेश
  • गढ़कालिका माताजी
  • हरसिद्धि माताजी
  • कालभैरव देव
  • सिद्धनाथ वट
  • मंगलनाथ देव
  • अंगारेश्वर महादेव
  • राम घाट
  • रामजानकी मन्दिर
  • अक्रूरेश्‍वर महादेव
  • विष्णु सागर
  • पुरुषोत्तम सागर
  • मार्कण्डेश्‍वर महादेव
  • ग्याकोटा महादेव
  • चारधाम मन्दिर
  • विक्रान्त भैरव
  • ओखलेश्वर महादेव
  • गोपाल मन्दिर
  • भर्तृहरि गुफा
  • सिंहेश्वर मन्दिर
  • वैभवलक्ष्मी मन्दिर
  • हनुमतेश्वर मन्दिर
  • भूखीमाता मन्दिर
  • विष्णु चतुष्टिका
  • छत्रेश्वरी चामुण्डा माताजी
  • सान्दीपनि आश्रम
  • च्यवनेश्वर महादेव
  • गुमानदेव हनुमान मन्दिर

दर्शनीय स्थल

  1. श्री महाकालेश्वर मंदिर
  2. बड़े गणेश मंदिर
  3. श्री चिंतामन गणेश मंदिर
  4. हरसिद्धि मंदिर
  5. सिद्धवट
  6. इस्कॉन मंदिर
  7. कालभैरव मंदिर
  8. गढ़कालिका मंदिर
  9. मंगलनाथ
  10. गोपाल मंदिर
  11. नवग्रह मंदिर (त्रिवेणी)
  12. चौबीस खंबा मंदिर
  13. नगरकोट की रानी
  14. राम-जनार्दन मंदिर
  15. वेध शाला (वेधशाला)

इतिहास

राजनैतिक इतिहास उज्जैन का काफी लम्बा रहा है। उज्जैन के गढ़ क्षेत्र से हुयी खुदाई में आद्यैतिहासिक (protohistoric) एवं प्रारंभिक लोहयुगीन सामग्री प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुई है। पुराणों व महाभारत में उल्लेख आता है कि वृष्णि-वीर कृष्ण व बलराम यहाँ गुरु सांदीपनी के आश्रम में विद्याप्राप्त करने हेतु आये थे। कृष्ण की एक पत्नी मित्रवृन्दा उज्जैन की ही राजकुमारी थी। उसके दो भाई विन्द एवं अनुविन्द महाभारत युद्ध में कौरवों की और से युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए थे। ईसा की छठी सदी में उज्जैन में एक अत्यंत प्रतापी राजा हुए जिनका नाम चंड प्रद्योत था। भारत के अन्य शासक उससे भय खाते थे। उसकी दुहिता वासवदत्ता एवं वत्सनरेश उदयन की प्रणय गाथा इतिहास प्रसिद्ध है प्रद्योत वंश के उपरांत उज्जैन मगध साम्राज्य का अंग बन गया।

राजा खदिरसार भील

जैन ग्रंथों के अनुसार राजा खादिरसार का शासन मगध में था , उनकी राजधानी उज्जैन थी , उनके शासन का समय 386 ईसा पूर्व था , राजा खादीरसार के पिता का नाम कुणिका था , जो कि 414 ईसा पूर्व के दौरान मगध के राजा थे , राजा खादिरसार की पत्नी का नाम चेलमा था , प्रारंभ में राजा खादिरसार बौद्घ धर्म के अनुयाई थे , परन्तु रानी चेलामा के उपदेश से प्रभावित होकर उन्होंने जैन धर्म अपना लिया और महावीर स्वामी जी के प्रथम भक्त बन गए [4]।

राजा गंधर्वसेन या राजा गर्दभिल्ल

उज्जैन में ईसा पूर्व पहली शताब्दी के आरंभ में राजा गन्धर्वसेन का शासन था , वे एक वीर राजा थे , जिनके पराक्रम से शक शासक भी डरते थे ।

सम्राट विक्रमादित्य(विक्रम सेन)

सम्राट विक्रमादित्य उज्जैन के शासक थे , उनके पिता राजा गंधर्वसेन थे , भारत में शकों को बुलाने का श्रेय कलकाचार्य को है , शकों ने उज्जैन के शासक गंधर्वसेन को युद्ध में हराकर उज्जैन पर अधिकार जमा लिया , तब राजा गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य ने शकों के खिलाफ युद्ध किया , विक्रमादित्य ने शकों को परास्त कर उज्जैन में पुनः अपने पूर्वजो का साम्राज्य स्थापित किया और वे इस देश के महान सम्राट कहलाए ।

महान कवि कालिदास

महाकवि कालिदास उज्जयिनी के इतिहास प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। इनको उज्जयिनी अत्यंत प्रिय थी। इसीलिये कालिदास ने उज्जयिनी का अत्यंत ही सुंदर वर्णन किया है। सम्राट विक्रमादित्य ही महाकवि कालिदास के वास्तविक आश्रयदाता के रूप में प्रख्यात है।

महाकवि कालिदास की मालवा के प्रति गहरी आस्था थी। उज्जयिनी में ही उन्होंने अत्यधिक प्रवास-काल व्यतीत किया और यहीं पर कालिदास ने उज्जयिनी के प्राचीन एवं गौरवशाली वैभव को देखा। वैभवशाली अट्टालिकाओं, उदयन, वासवदत्ता की प्रणय गाथा, भगवान महाकाल संध्याकालीन आरती तथा नृत्य करती गौरांगनाओं के साथ ही क्षिप्रा नदी का पौराणिक महत्त्व आदि से भली भांति परिचित होने का अवसर भी प्राप्त किया हुआ जाना पड़ता है।

'मेघदूत' में महाकवि कालिदास ने उज्जयिनी का सुंदर वर्णन करते हुए कहा है कि जब स्वर्गीय जीवों को अपने पुण्य क्षीण होने की स्थिति में पृथ्वी पर आना पड़ा। तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने साथ स्वर्ग का एक खंड (टुकड़ा) भी ले चले। वही स्वर्गखंड उज्जयिनी है। आगे महाकवि ने लिखा है कि उज्जयिनी भारत का वह प्रदेश है जहां के वृद्धजन इतिहास प्रसिद्ध आधिपति राजा उदयन की प्रणय गाथा कहने में पूर्ण दक्ष है।

कालिदास के 'मेघदूत' में उज्जयिनी का वैभव आज भले ही विलुप्त हो गया हो परंतु आज भी विश्व में उज्जयिनी का धार्मिक-पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व के साथ ही ज्योतिष क्षेत्र का महत्त्व भी प्रसिद्ध है। उज्जयिनी भारत की सात पुराण प्रसिद्ध नगरियों में प्रमुख स्थान रखती है। उज्जयिनी में प्रति बारह वर्षों में सिंहस्थ महापर्व का आयोजन होता है। इस अवसर पर देश-विदेश से करोड़ों श्रद्धालु भक्तजन, साधु-संत, महात्मा महामंडलेश्वर एवं आखाड़ा प्रमुख उज्जयिनी में कल्पवास कर मोक्ष प्राप्ति की मंगल कामना करते हैं।

प्रामाणिक इतिहास

उज्जयिनी की ऐतिहासिकता का प्रमाण 600 वर्ष पूर्व मिलता है। तत्कालीन समय में भारत में जो सोलह जनपद थे उनमें अवंति जनपद भी एक था। अवंति उत्तर एवं दक्षिण इन दो भागों में विभक्त होकर उत्तरी भाग की राजधानी उज्जैन थी तथा दक्षिण भाग की राजधानी महिष्मति थी। उस समय चंद्रप्रद्योत नामक सम्राट सिंहासनारूढ थे। प्रद्योत के वंशजों का उज्जैन पर तीसरी शताब्दी तक प्रभुत्व था।

मौर्य साम्राज्य

मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य यहाँ आए थे। उनके पोते अशोक यहाँ के राज्यपाल रहे थे। उनकी एक भार्या वेदिसा देवी से उन्हें महेंद्र और संघमित्रा जैसी संतान प्राप्त हुई जिसने कालांतर में श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया था। मौर्य साम्राज्य के अभुदय होने पर मगध सम्राट बिन्दुसार के पुत्र अशोक उज्जयिनी के समय नियुक्त हुए। बिन्दुसार की मृत्योपरान्त अशोक ने उज्जयिनी के शासन की बागडोर अपने हाथों में सम्हाली और उज्जयिनी का सर्वांगीण विकास कियां सम्राट अशोकके पश्चात उज्जयिनी ने दीर्घ काल तक अनेक सम्राटों का उतार चढ़ाव देखा।

मौर्य साम्राज्य का पतन

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उज्जैन शकों और सातवाहनों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया। शकों के पहले आक्रमण को उज्जैन के वीर सम्राट विक्रमादित्य के नेतृत्व में यहाँ की जनता ने प्रथम सदी पूर्व विफल कर दिया था। कालांतर में विदेशी पश्चिमी शकों ने उज्जैन हस्त गत कर लिया। चस्टान व रुद्रदमन इस वंश के प्रतापी व लोक प्रिय महाक्षत्रप सिद्ध हुए।

गुप्त साम्राज्य

चौथी शताब्दी में गुप्तों और औलिकरों ने मालवा से इन शकों की सत्ता समाप्त कर दी। शकों और गुप्तों के काल में इस क्षेत्र का अद्वितीय आर्थिक एवं औद्योगिक विकास हुआ। छठी से दसवीं सदी तक उज्जैन गुर्जर प्रतिहारों की राजनैतिक व सैनिक स्पर्धा का दृश्य देखता रहा।

सातवीं शताब्दी में उज्जैन कन्नौज के हर्षवर्धन साम्राज्य में विलीन हो गया। उस काल में उज्जैन का सर्वांगीण विकास भी होता रहा। वर्ष ६४८ में हर्ष वर्धन की मृत्यु के पश्चात गुर्जर काल में नवी शताब्दी तक उज्जैन परमार राजवंश के आधिपत्य में आया जो ग्यारहवीं शताब्दी तक कायम रहा इस काल में उज्जैन की उन्नति होती रही। इसके पश्चात उज्जैन गोर बंजारा पावर लुंसावत वंश और चौहान राजवंश और तोमर राजवंश के अधिकारों में आ गया।

वर्ष १००० से १३०० तक मालवा परमार-शक्ति द्वारा शासित रहा। काफी समय तक उनकी राजधानी उज्जैन रही। इस काल में सीयक द्वितीय, मुंजदेव, भोजदेव, उदयादित्य, नरवर्मन जैसे महान शासकों ने साहित्य, कला एवं संस्कृति की अभूतपूर्व सेवा की।

दिल्ली सल्तनत

दिल्ली के दास एवं खिलजी सुल्तानों के आक्रमण के कारण परमार वंश का पतन हो गया। वर्ष १२३५ में दिल्ली का शमशुद्दीन इल्तमिश विदिशा विजय करके उज्जैन की और आया यहां उस क्रूर शासक ने उज्जैन को न केवल बुरी तरह लूटा अपितु उनके प्राचीन मंदिरों एवं पवित्र धार्मिक स्थानों का वैभव भी नष्ट किया। वर्ष १४०६ में मालवा दिल्ली सल्तनत से मुक्त हो गया और उसकी राजधानी मांडू से धोरी, खिलजी व अफगान सुलतान स्वतंत्र राज्य करते रहे। मुग़ल सम्राट अकबर ने जब मालवा पर किया तो उज्जैन को प्रांतीय मुख्यालय बनाया गया। मुग़ल बादशाह अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ व औरंगज़ेब यहाँ आये थे।

गोर बंजारा

बंजारा वंश के पवार कुल (लुनावत) के लोगों. उज्जैन की गदीपर राज किया यह। पुरानो उनका उल्लेख मिला है। यह बात खुद भाट वंश के लोग बताते है।

मराठों का अधिकार

सन् १७३७ ई. में उज्जैन सिंधिया वंश के अधिकार में आया उनका वर्ष १८८० तक एक छत्र राज्य रहा जिसमें उज्जैन का सर्वांगीण विकास होता रहा। सिंधिया वंश की राजधानी उज्जैन बनी। राणोजी सिंधिया ने महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इस वंश के संस्थापक राणोजी शिंदे के मंत्री रामचंद्र शेणवी ने वर्तमान महाकाल मंदिर का निर्माण करवाया। वर्ष १८१० में सिंधिया राजधानी ग्वालियर ले जाई गयी किन्तु उज्जैन का सांस्कृतिक विकास जारी रहा। १९४८ में ग्वालियर राज्य का नवीन मध्य भारत में विलय हो गया।

उज्जयिनी में आज भी अनेक धार्मिक पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थान हैं जिनमें भगवान महाकालेश्वर मंदिर, गोपाल मंदिर, चौबीस खंभा देवी, चौसठ योगिनियां, नगर कोट की रानी, हरसिध्दि मां, गढ़कालिका, काल भैरव, विक्रांत भैरव, मंगलनाथ, सिध्दवट, मजार-ए-नज़मी, बिना नींव की मस्जिद, गज लक्ष्मी मंदिर, बृहस्पति मंदिर, नवगृह मंदिर, भूखी माता, भर्तृहरि गुफा, पीरमछन्दर नाथ समाधि, कालिया देह महल, कोठी महल, घंटाघर, जन्तर मंतर , चिंतामन गणेश आदि प्रमुख हैं।

आज का उज्जैन

वर्तमान उज्जैन नगर विंध्यपर्वतमाला के समीप और पवित्र तथा ऐतिहासिक क्षिप्रा नदी के किनारे समुद्र तल से 1678 फीट की ऊंचाई पर 23°डिग्री.50' उत्तर देशांश और 75°डिग्री .50' पूर्वी अक्षांश पर स्थित है। नगर का तापमान और वातावरण समशीतोष्ण है। यहां की भूमि उपजाऊ है। कालजयी कवि कालिदास और महान रचनाकार बाणभट्ट ने नगर की खूबसूरती को जादुई निरूपति किया है। कालिदास ने लिखा है कि दुनिया के सारे रत्न उज्जैन में हैं और समुद्रों के पास सिर्फ उनका जल बचा है। उज्जैन नगर और अंचल की प्रमुख बोली मीठी मालवी बोली है। हिंदी भी प्रयोग में है।

उज्जैन इतिहास के अनेक परिवर्तनों का साक्षी है। क्षिप्रा के अंतर में इस पारम्परिक नगर के उत्थान-पतन की निराली और सुस्पष्ट अनुभूतियां अंकित है। क्षिप्रा के घाटों पर जहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य की छटा बिखरी पड़ी है, असंख्य लोग आए और गए। रंगों भरा कार्तिक मेला हो या जन-संकुल सिंहस्थ या दिन के नहान, सब कुछ नगर को तीन और से घेरे क्षिप्रा का आकर्षण है।

उज्जैन के दक्षिण-पूर्वी सिरे से नगर में प्रवेश कर क्षिप्रा ने यहां के हर स्थान से अपना अंतरंग संबंध स्थापित किया है। यहां त्रिवेणी पर नवगृह मंदिर है और कुछ ही गणना में व्यस्त है। पास की सड़क आपको चिन्तामणि गणेश पहुंचा देगी। धारा मुत्रड गई तो क्या हुआ? ये जाने पहचाने क्षिप्रा के घाट है, जो सुबह-सुबह महाकाल और हरसिध्दि मंदिरों की छाया का स्वागत करते हैं।

क्षिप्रा जब पूर आती है तो गोपाल मंदिर की देहलीज को छू लेती है। दुर्गादास की छत्री के थोड़े ही आगे नदी की धारा नगर के प्राचीन परिसर के आस-पास घूम जाती है। भर्तृहरि गुफा, पीर मछिन्दर और गढकालिका का क्षेत्र पार कर नदी मंगलनाथ पहुंचती है। मंगलनाथ का यह मंदिर सान्दीपनि आश्रम और निकट ही राम-जनार्दन मंदिर के सुंदर दृश्यों को निहारता रहता है। सिध्दवट और काल भैरव की ओर मुत्रडकर क्षिप्रा कालियादेह महल को घेरते हुई चुपचाप उज्जैन से आगे अपनी यात्रा पर बढ़ जाती है।

कवि हों या संत, भक्त हों या साधु, पर्यटक हों या कलाकार, पग-पग पर मंदिरों से भरपूर क्षिप्रा के मनोरम तट सभी के लिए समान भाव से प्रेरणाम के आधार है।

उज्जयिनी नगरी

आज जो नगर उज्जैन नाम से जाना जाता है वह अतीत में अवंतिका, उज्जयिनी, विशाला, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णशृंगा, अमरावती आदि अनेक नामों से अभिहित रहा। मानव सभ्यता के प्रारंभ से यह भारत के एक महान तीर्थ-स्थल के रूप में विकसित हुआ। पुण्य सलिला क्षिप्रा के दाहिने तट पर बसे इस नगर को भारत की मोक्षदायक सप्तपुरियों में एक माना गया है।

अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका। पुरी द्वारावतीश्चैव सप्तैतामोक्षदायिका।।

पर्यटन

महाकालेश्वर मंदिर

उज्जैन के महाकालेश्वर महादेव की मान्यता भारत के प्रमुख बारह ज्योतिर्लिंगों में है। महाकालेश्वर मंदिर का माहात्म्य विभिन्न पुराणों में विस्तृत रूप से वर्णित है। महाकवि तुलसीदास से लेकर संस्कृत साहित्य के अनेक प्रसिध्द कवियों ने इस मंदिर का वर्णन किया है। लोक मानस में महाकाल की परम्परा अनादि है। उज्जैन भारत की कालगणना का केंद्र बिन्दु था और महाकाल उज्जैन के अधिपति आदि देव माने जाते हैं।

इतिहास के प्रत्येक युग में-शुंग, कुषाण, सात वाहन, गुप्त, परिहार तथा अपेक्षाकृत आधुनिक मराठा काल में इस मंदिर का निरंतर जीर्णोध्दार होता रहा है। वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण राणोजी सिंधिया के काल में मालवा के सूबेदार रामचंद्र बाबा शेणवी द्वारा कराया गया था। वर्तमान में भी जीर्णोध्दार एवं सुविधा विस्तार का कार्य होता रहा है। महाकालेश्वर की प्रतिमा दक्षिणमुखी है। तांत्रिक परम्परा में प्रसिध्द दक्षिण मुखी पूजा का महत्त्व बारह ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर को ही प्राप्त है। ओंकारेश्वर में मंदिर की ऊपरी पीठ पर महाकाल मूर्ति की तरह इस तरह मंदिर में भी ओंकारेश्वर शिव की प्रतिष्ठा है। तीसरे खण्ड में नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा के दर्शन केवल नागपंचमी को होते हैं। विक्रमादित्य और भोज की महाकाल पूजा के लिए शासकीय सनदें महाकाल मंदिर को प्राप्त होती रही है। वर्तमान में यह मंदिर महाकाल मंदिर समिति के तत्वावधान में संरक्षित है।

श्री बड़े गणेश मंदिर

श्री महाकालेश्वर मंदिर के निकट हरिसिद्धि मार्ग पर बड़े गणेश की भव्य और कलापूर्ण मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस मूर्ति का निर्माण पद्मविभूषण पं॰ सूर्यनारायण व्यास के पिता विख्यात विद्वान स्व. पं॰ नारायण जी व्यास ने किया था। मंदिर परिसर में सप्तधातु की पंचमुखी हनुमान प्रतिमा के साथ-साथ नवग्रह मंदिर तथा कृष्ण यशोदा आदि की प्रतिमाएं भी विराजित हैं। यहाँ गणपति की प्रतिमा बहुत विशाल होने के कारण ही इसे बड़ा गणेश के नाम से जानते हैं। गणेश जी की मूर्ति संरचना में पवित्र सात नदियों के जल एवं सप्त पूरियों के मिट्टी को प्रयोग में लाया गया था। यहाँ गणेश जी को महिलायें अपने भाई के रूप में मानती हैं,एवं रक्षा बंधन के पावन पर्व पर राखी पहनाती हैं।

मंगलनाथ मंदिर

पुराणों के अनुसार उज्जैन नगरी को मंगल की जननी कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है, वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए यहाँ पूजा-पाठ करवाने आते हैं। यूँ तो देश में मंगल भगवान के कई मंदिर हैं, लेकिन उज्जैन इनका जन्मस्थान होने के कारण यहाँ की पूजा को खास महत्त्व दिया जाता है। कहा जाता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। सिंधिया राजघराने में इसका पुनर्निर्माण करवाया गया था। उज्जैन शहर को भगवान महाकाल की नगरी कहा जाता है, इसलिए यहाँ मंगलनाथ भगवान की शिवरूपी प्रतिमा का पूजन किया जाता है। हर मंगलवार के दिन इस मंदिर में श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है।

हरसिद्धि

उज्जैन नगर के प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में हरसिद्धि देवी का मंदिर प्रमुख है। चिन्तामण गणेश मंदिर से थोड़ी दूर और रूद्रसागर तालाब के किनारे स्थित इस मंदिर में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा हरिसिद्धि देवी की पूजा की जाती थी। हरसिध्दि देवी वैष्णव संप्रदाय की आराध्य रही। शिवपुराण के अनुसार दक्ष यज्ञ के बाद सती की कोहनी यहां गिरी थी।

क्षिप्रा घाट

उज्जैन नगर के धार्मिक स्वरूप में क्षिप्रा नदी के घाटों का प्रमुख स्थान है। नदी के दाहिने किनारे, जहाँ नगर स्थित है, पर बने ये घाट स्थानार्थियों के लिये सीढ़ीबध्द हैं। घाटों पर विभिन्न देवी-देवताओं के नये-पुराने मंदिर भी है। क्षिप्रा के इन घाटों का गौरव सिंहस्थ के दौरान देखते ही बनता है, जब लाखों-करोड़ों श्रद्धालु यहां स्नान करते हैं।

गोपाल मंदिर

गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर नगर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित है। मंदिर का निर्माण महाराजा दौलतराव सिंधिया की महारानी बायजा बाई ने वर्ष 1833 के आसपास कराया था। मंदिर में कृष्ण (गोपाल) प्रतिमा है। मंदिर के चांदी के द्वार यहां का एक अन्य आकर्षण हैं।

गढकालिका देवी

गढकालिका देवी का यह मंदिर आज के उज्जैन नगर में प्राचीन अवंतिका नगरी क्षेत्र में है। कालयजी कवि कालिदास गढकालिका देवी के उपासक थे। इस प्राचीन मंदिर का गुर्जर सम्राट नागभट्ट द्वारा जीर्णोध्दार कराने का उल्लैख मिलता है। गढ़ कालिका के मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, फिर भी माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट नागभट्ट द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया।

भर्तृहरि गुफा

भर्तृहरि की गुफा ग्यारहवीं सदी के एक मंदिर का अवशेष है, जिसका उत्तरवर्ती दोर में जीर्णोध्दार होता रहा।

काल भैरव -

काल भैरव मंदिर आज के उज्जैन नगर में स्थित प्राचीन अवंतिका नगरी के क्षेत्र में स्थित है। यह स्थल शिव के उपासकों के कापालिक सम्प्रदाय से संबंधित है। मंदिर के अंदर काल भैरव की विशाल प्रतिमा है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में राजा भद्रसेन ने कराया था। पुराणों में वर्णित अष्ट भैरव में काल भैरव का स्थल है।

महाकाल लोक -

भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा 11-10-2022 को महाकालेश्वर मंदिर के समीप श्री महाकाल महालोक का लोकार्पण किया गया। इस कॉरिडोर में भगवान शिव से संबंधित मुर्तियों,चित्रभितियों एवं प्रतिमाओं का निर्माण किया गया है। इस महालोक में सप्तऋषियों की प्रतिमाएँ ,कमल कुण्ड तथा 108 स्तम्भ वाला षेड मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। [5]

सिंहस्थ कुम्भ

सिंहस्थ उज्जैन का महान स्नान पर्व है। बारह वर्षों के अंतराल से यह पर्व तब मनाया जाता है जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित रहता है। पवित्र क्षिप्रा नदी में पुण्य स्नान की विधियां चैत्र मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होती हैं और पूरे मास में वैशाख पूर्णिमा के अंतिम स्नान तक भिन्न-भिन्न तिथियों में सम्पन्न होती है। उज्जैन के महापर्व के लिए पारम्परिक रूप से दस योग महत्वपूर्ण माने गए हैं।

देश भर में चार स्थानों पर कुम्भ का आयोजन किया जाता है। प्रयाग, नासिक, हरिद्धार और उज्जैन में लगने वाले कुम्भ मेलों के उज्जैन में आयोजित आस्था के इस पर्व को सिंहस्थ के नाम से पुकारा जाता है। उज्जैन में मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में गुरु के आने पर यहाँ महाकुंभ मेले का आयोजन किया जाता है, जिसे सिहस्थ के नाम से देशभर में पुकारा जाता है। सिंहस्थ आयोजन की एक प्राचीन परम्परा है। इसके आयोजन के संबंध में अनेक कथाएँ प्रचलित है।

अमृत बूंदे छलकने के समय जिन राशियों में सूर्य, चन्द्र, गुरु की स्थिति के विशिष्ट योग के अवसर रहते हैं, वहां कुंभ पर्व का इन राशियों में ग्रहों के संयोग पर आयोजन होता है। इस अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, गुरु और चन्द्रमा के विशेष प्रयत्न रहे। इसी कारण इन्हीं ग्रहों की उन विशिष्ट स्थितियों में कुंभ पर्व मनाने की परम्परा है।

स्वादिष्ट भोज पेय

बाबा महाकाल का प्रिय पेय भांग यहां का स्वादिष्ट पेय है। मालवा के प्रसिद्ध दाल बाटी व दाल बाफले यहाँ के स्वादिष्ट भोज है। महाकाल व देवासगट बस स्टेंड पर अनेक भोजनालय है ,मंगलनाथ स्थित साँई पैलेस पर स्वादिष्ट दाल बाफले विश्व प्रसिद्ध हैं। महाकाल से कालभैरव मार्ग में दानीगेट चौराहे पर गाँधी जी के पोहे समोसे स्वादिष्ट स्वल्पाहार है। महाकाल से काल भैरव मंदिर जाते समय जूना सोमवारिया पीपली नाका मार्ग पर जीजी की रसोई नामक रेस्टोरेंट बहुत ही फेमस हैं।

जनसंख्या

2024 में उज्जैन शहर की वर्तमान अनुमानित जनसंख्या 730,000 है | 2011 में, उज्जैन की जनसंख्या 1,986,864 थी, जिसमें पुरुष और महिलाएँ क्रमशः 1,016,289 और 970,575 थीं। [6]

परिवहन

वायु: निकटतम हवाई अड्डा इंदौर (53 किमी)

रेल: उज्जैन पश्चिम रेलवे का एक रेलवे स्टेशन है।

सड़क: नियमित बस सेवाएं उज्जैन को इंदौर, भोपाल, रतलाम, ग्वालियर, मांडू, धार, कोटा और ओंकारेश्वर आदि से जोड़ती हैं। अच्छी सड़कें उज्जैन को अहमदाबाद (402 किलोमीटर), भोपाल (183 किलोमीटर), मुंबई (655 किलोमीटर), दिल्ली से जोड़ती हैं। (774 किलोमीटर), ग्वालियर (451 किलोमीटर), इंदौर (53 किलोमीटर) और खजुराहो (570 किलोमीटर) आदि।

  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 3 (NH3 – आगरा बॉम्बे)
  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 59 (अहमदाबाद – गोधरा – उज्जैन)
  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 59A (उज्जैन – बैतूल – नागपुर एनएच 69 को जोड़ने)

मुम्बई- राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 3 का उज्जैन खंड और अहमदाबाद – राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 59 शहर से गुजरने वाले अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रीय राजमार्ग हैं:

  • स्टेट हाईवे नंबर 27 (झालावाड – उज्जैन – बुरहानपुर)
  • स्टेट हाईवे नंबर 31 (नीमच – रतलाम – धार)

उज्जैन

दर्शनीय स्थल

  • महाकालेश्‍वर ज्योतिर्लिङ्ग
  • चिन्तामणी गणेश
  • स्थिरमन गणेश
  • चक्रतीर्थ गणेश
  • गढ़कालिका माताजी
  • हरसिद्धि माताजी
  • कालभैरव देव
  • सिद्धनाथ वट
  • मंगलनाथ देव
  • अंगारेश्वर महादेव
  • राम घाट
  • रामजानकी मन्दिर
  • अक्रूरेश्‍वर महादेव
  • विष्णु सागर
  • पुरुषोत्तम सागर
  • मार्कण्डेश्‍वर महादेव
  • ग्याकोटा महादेव
  • चारधाम मन्दिर
  • विक्रान्त भैरव
  • ओखलेश्वर महादेव
  • गोपाल मन्दिर
  • भर्तृहरि गुफा
  • सिंहेश्वर मन्दिर
  • वैभवलक्ष्मी मन्दिर
  • हनुमतेश्वर मन्दिर
  • भूखीमाता मन्दिर
  • विष्णु चतुष्टिका
  • छत्रेश्वरी चामुण्डा माताजी
  • सान्दीपनि आश्रम
  • च्यवनेश्वर महादेव
  • गुमानदेव हनुमान मन्दिर

दर्शनीय स्थल

  1. श्री महाकालेश्वर मंदिर
  2. बड़े गणेश मंदिर
  3. श्री चिंतामन गणेश मंदिर
  4. हरसिद्धि मंदिर
  5. सिद्धवट
  6. इस्कॉन मंदिर
  7. कालभैरव मंदिर
  8. गढ़कालिका मंदिर
  9. मंगलनाथ
  10. गोपाल मंदिर
  11. नवग्रह मंदिर (त्रिवेणी)
  12. चौबीस खंबा मंदिर
  13. नगरकोट की रानी
  14. राम-जनार्दन मंदिर
  15. वेध शाला (वेधशाला)

इतिहास

राजा खदिरसार भील

राजा गंधर्वसेन या राजा गर्दभिल्ल

सम्राट विक्रमादित्य(विक्रम सेन)

महान कवि कालिदास

प्रामाणिक इतिहास

मौर्य साम्राज्य

मौर्य साम्राज्य का पतन

गुप्त साम्राज्य

दिल्ली सल्तनत

गोर बंजारा

मराठों का अधिकार

आज का उज्जैन

उज्जयिनी नगरी

पर्यटन

महाकालेश्वर मंदिर

श्री बड़े गणेश मंदिर

मंगलनाथ मंदिर

हरसिद्धि

क्षिप्रा घाट

गोपाल मंदिर

गढकालिका देवी

भर्तृहरि गुफा

काल भैरव -

सिंहस्थ कुम्भ

स्वादिष्ट भोज पेय

जनसंख्या

परिवहन

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  • राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 59A (उज्जैन – बैतूल – नागपुर एनएच 69 को जोड़ने)
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उज्जैन का पर्यटन

उज्जयिनी(उज्जैन) भारत के मध्य प्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है जो क्षिप्रा नदी या शिप्रा नदी के किनारे पर बसा है। यह एक अत्यन्त प्राचीन शहर है। यह महान सम्राट विक्रमादित्य के राज्य की राजधानी थी । उज्जैन को कालिदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ हर 12 वर्ष पर सिंहस्थ महाकुंभ मेला लगता है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल इस नगरी में स्थित है। उज्जैन मध्य प्रदेश के सबसे बड़े शहर इन्दौर से 45 कि॰मी॰ पर है। उज्जैन के प्राचीन नाम अवन्तिका, उज्जयिनी, कनकश्रन्गा आदि है। उज्जैन मंदिरों की नगरी है। यहाँ कई तीर्थ स्थल है। इसकी जनसंख्या 515215 लाख सन ,2011 की जनगणना के हिसाब से है। यह मध्य प्रदेश का पाँचवा सबसे बड़ा शहर है। नगर निगम सीमा का क्षेत्रफल 152 वर्ग किलोमीटर है।

महाकालेश्वर मंदिर

उज्जैन के महाकालेश्वर की मान्यता भारत के प्रमुख बारह ज्योतिर्लिंगों में है। महाकालेश्वर मंदिर का माहात्म्य विभिन्न पुराणों में विस्तृत रूप से वर्णित है। महाकवि तुलसीदास से लेकर संस्कृत साहित्य के अनेक प्रसिध्द कवियों ने इस मंदिर का वर्णन किया है। लोक मानस में महाकाल की परम्परा अनादि है। उज्जैन भारत की कालगणना का केंद्र बिन्दु था और महाकाल उज्जैन के अधिपति आदिदेव माने जाते हैं।

इतिहास के प्रत्येक युग में-शुंग, कुषाण, सात वाहन, गुप्त, परिहार तथा अपेक्षाकृत आधुनिक मराठा काल में इस मंदिर का निरंतर जीर्णोध्दार होता रहा है। वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण राणोजी सिंधिया के काल में मालवा के सूबेदार रामचंद्र बाबा शेणवी द्वारा कराया गया था। वर्तमान में भी जीर्णोध्दार एवं सुविधा विस्तार का कार्य होता रहा है। महाकालेश्वर की प्रतिमा दक्षिण मुखी है। तांत्रिक परम्परा में प्रसिध्द दक्षिण मुखी पूजा का महत्त्व बारह ज्योतिर्लिंगों में केवल महाकालेश्वर कोही प्राप्त है। ओंकारेश्वर में मंदिर की ऊपरी पीठ पर महाकाल मूर्ति कीतरह इस तरह मंदिर में भी ओंकारेश्वर शिव की प्रतिष्ठा है। तीसरे खण्ड में नागचंद्रेश्वर की प्रतिमा के दर्शन केवल नागपंचमी को होते हैं। विक्रमादित्य और भोज की महाकाल पूजा के लिए शासकीय सनदें महाकाल मंदिर को प्राप्त होती रही है। वर्तमान में यह मंदिर महाकाल मंदिर समिति के तत्वावधान में संरक्षित है।

श्री बड़े गणेश मंदिर

श्री महाकालेश्वर मंदिर के निकट हरसिध्दि मार्ग पर बड़े गणेश की भव्य और कलापूर्ण मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस मूर्ति का निर्माण पद् मविभूषण पं॰ सूर्यनारायण व्यास के पिता विख्यात विद्वान स्व. पं॰ नारायण जी व्यास ने किया था। मंदिर परिसर में सप्तधातु की पंचमुखी हनुमान प्रतिमा के साथ-साथ नवग्रह मंदिर तथा कृष्ण यशोदा आदि की प्रतिमाएं भी विराजित हैं।

हरसिध्दि

उज्जैन नगर के प्राचीन और महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में हरसिध्दि देवी का मंदिर प्रमुख है। महाकाल मंदिर से थोडी दूर और रूद्रसागर तालाब के किनारे स्थित इस मंदिर में सम्राट विक्रमादित्य द्वारा हरसिध्दि देवी की पूजा की जाती थी। हरसिध्दि देवी वैष्णव संप्रदाय की आराद्या देवी हैं, शिवपुराण के अनुसार दक्ष यज्ञ के बाद सती की कोहनी यहां गिरी थी।माँ आदिशक्ति के ५२ शक्तिपिठो में से यह भी एक है,मान्यताओ के अनुसार राजा विक्रामादित्य को देवी द्वारा यह वरदान प्राप्त था की उनके राज्य में यदि कोई दूसरा शासक आ भी गया तो वह रात्रि विश्राम नहीं कर सकेगा ,इसी मान्यता के अनुसार आज भी कोई मुख्यमंत्री या शासक उज्जैन में रात्रि विश्राम नहीं करता| मंदिर बहुत ही आकर्षक है तथा दो दीप मलिकाएं आकर्षण का केंद्र है जिनमे रात्रि के समय दीप दर्सन बड़ा ही मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है |

क्षिप्रा घाट

उज्जैन नगर के धार्मिक स्वरूप में क्षिप्रा नदी के घाटों का प्रमुख स्थान है। नदी के दाहिने किनारे, जहां नगर स्थित है, पर बने ये घाट स्थानार्थियों के लिये सीढीबध्द हैं। घाटों पर विभिन्न देवी-देवताओं के नये-पुराने मंदिर भी है। क्षिप्रा के इन घाटों का गौरव सिंहस्थ के दौरान देखते ही बनता है, जब लाखों-करोडों श्रध्दालु यहां स्नान करते हैं।

राम घाट - राम घाट छिप्रा का एक प्रमुख घाट है ,जिसमे श्रद्धालु स्नान दान ,दीप दान करते हैं ,घाट के किनारे कई मंदिर मठ हैं ,सामने दत्तात्रेय का बहुत बड़ा मंदिर है ,सायंकालीन ७ बजे वनारस की गंगा आरती की तरह छिप्रा आरती भी की जाती है |

गोपाल मंदिर

गोपाल मंदिर उज्जैन नगर का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर है। यह मंदिर नगर के मध्य व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित है। मंदिर का निर्माण महाराजा दौलतराव सिंधिया की महारानी बायजा बाई ने सन् 1833 के आसपास कराया था। मंदिर में कृष्ण (गोपाल) प्रतिमा है। मंदिर के चांदी के द्वार यहां का एक अन्य आकर्षण हैं।

गढकालिका देवी

गढकालिका देवी का यह मंदिर आज के उज्जैन नगर में प्राचीन अवंतिका नगरी क्षेत्र में है। कालजयी कवि कालिदास गढकालिका देवी के उपासक थे। इस प्राचीन मंदिर का सम्राट हर्षवर्धन द्वारा जीर्णोध्दार कराने का उल्लैख मिलता है।

भर्तृहरि गुफा

भैरव

काल भैरव मंदिर आज के उज्जैन नगर में स्थित प्राचीन अवंतिका नगरी के क्षेत्र में स्थित है। यह स्थल शिव के उपासकों के कापालिक सम्प्रदाय से संबंधित है। मंदिर के अंदर भैरवनाथ की विशाल प्रतिमा है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में राजा भद्रसेन ने कराया था। पुराणों में वर्णित अष्ट भैरव में काल भैरव का स्थान है।

गढ़कालिका मंदिर, उज्जैन

गढ़कालिका मंदिर, मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। कालजयी कवि कालिदास गढ़ कालिका देवी के उपासक थे। कालिदास के संबंध में मान्यता है कि जब से वे इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने लगे तभी से उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण होने लगा। कालिदास रचित 'श्यामला दंडक' महाकाली स्तोत्र एक सुंदर रचना है। ऐसा कहा जाता है कि महाकवि के मुख से सबसे पहले यही स्तोत्र प्रकट हुआ था। यहाँ प्रत्येक वर्ष कालिदास समारोह के आयोजन के पूर्व माँ कालिका की आराधना की जाती है।

गढ़कालिका मंदिर 51 शक्तिपीठों में एक है यहां भगवती सती के ऊर्ध ओष्ठ (ऊपरी होंठ) गिरे थे, यहां की शक्ति अवंती और भैरव लंबकरण है। गढ़कालिका का मंदिर 18 महाशक्तिपीठों में भी आता है 18 शक्तिपीठ स्त्रोत जो जगतगुरु आदि शंकराचार्य के द्वारा लिखा गया है। उसमें कहा गया है उज्जयिनी या महाकाली जो उज्जैन की महाकाली का वर्णन किया गया है उसे स्रोत में वह गढ़ कालिका ही है।

मान्यताएं

गढ़ कालिका के मंदिर में माँ कालिका के दर्शन के लिए रोज हजारों भक्तों की भीड़ जुटती है। तांत्रिकों की देवी कालिका के इस चमत्कारिक मंदिर की प्राचीनता के विषय में कोई नहीं जानता, फिर भी माना जाता है कि इसकी स्थापना महाभारतकाल में हुई थी, लेकिन मूर्ति सतयुग के काल की है। बाद में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार सम्राट हर्षवर्धन द्वारा किए जाने का उल्लेख मिलता है। स्टेटकाल में ग्वालियर के महाराजा ने इसका पुनर्निर्माण कराया।

शक्तिपीठ

वैसे तो गढ़ कालिका का मंदिर शक्तिपीठ में शामिल नहीं है, किंतु उज्जैन क्षेत्र में माँ हरसिद्धि ‍शक्तिपीठ होने के कारण इस क्षेत्र का महत्व बढ़ जाता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि उज्जैन में ‍शिप्रा नदी के तट के पास स्थित भैरव पर्वत पर माँ भगवती सती के ओष्ठ गिरे थे।

मेले

यहाँ पर नवरा‍त्रि में लगने वाले मेले के अलावा भिन्न-भिन्न मौकों पर उत्सवों और यज्ञों का आयोजन होता रहता है। माँ कालिका के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

आवागमन

वायुमार्ग

उज्जैन से इंदौर एअरपोर्ट लगभग 65 किलोमीटर दूर है।

रेलमार्ग

उज्जैन से मक्सी-भोपाल मार्ग (दिल्ली-नागपुर लाइन), उज्जैन-नागदा-रतलाम मार्ग (मुंबई-दिल्ली लाइन) द्वारा आप आसानी से उज्जैन पहुँच सकते हैं।

सड़क मार्ग

उज्जैन-आगर-कोटा-जयपुर मार्ग, उज्जैन-बदनावर-रतलाम-चित्तौड़ मार्ग, उज्जैन-मक्सी-शाजापुर-ग्वालियर-दिल्ली मार्ग, उज्जैन-देवास-भोपाल मार्ग आदि देश के किसी भी हिस्से से आप बस या टैक्सी द्वारा यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं।

संदर्भ / स्रोत

  1. उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; 2025 table 2 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  2. "Ujjain City" . मूल से से 26 अक्तूबर 2021 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: 15 फ़रवरी 2025 . ↗
  3. "District Census Handbook - Ujjain" (PDF) . Census of India . p. 12,22 . अभिगमन तिथि: 6 December 2015 . ↗
  4. वर्णी, जिनेन्द्र (1970). जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश . Bhāratīya Jñānapīṭha Prakāsana. ISBN 978-81-263-1737-0 . ↗
  5. "महाकाल कॉरिडोर (महाकाल लोक)" . ↗
  6. "Ujjain District - Population 2011-2024" . ↗
  7. उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; 2025 table 2 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
  8. "Ujjain City" . मूल से से 26 अक्तूबर 2021 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: 15 फ़रवरी 2025 . ↗
  9. "District Census Handbook - Ujjain" (PDF) . Census of India . p. 12,22 . अभिगमन तिथि: 6 December 2015 . ↗
  10. वर्णी, जिनेन्द्र (1970). जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश . Bhāratīya Jñānapīṭha Prakāsana. ISBN 978-81-263-1737-0 . ↗
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  12. "Ujjain District - Population 2011-2024" . ↗