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उदयपुर

उदयपुर (Udaipur) भारत के राजस्थान राज्य के उदयपुर ज़िले में स्थित एक नगर है। यह राजस्थान का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जो अपने इतिहास, संस्कृति और अपने आकर्षक स्थलों के लिये प्रसिद्ध है। इसे "पूर्व के वेनिस" के नाम से भी जाना जाता है। [1] [2]

उदयपुर (Udaipur) भारत के राजस्थान राज्य के उदयपुर ज़िले में स्थित एक नगर है। यह राजस्थान का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जो अपने इतिहास, संस्कृति और अपने आकर्षक स्थलों के लिये प्रसिद्ध है। इसे "पूर्व के वेनिस" के नाम से भी जाना जाता है।[1][2]

विवरण

उदयपुर में रेबारी, डाँगी, ब्राह्मण, राजपूत , भील , मीणा के साथ अन्य कई जातियाँ निवास करती हैं। उदयपुर का प्रारंभिक इतिहास सिसोदिया राजवंश से जुड़ा है। एक मत के अनुसार सन् 1558 में महाराणा उदय सिंह - सिसोदिया राजपूत वंश - ने स्थापित किया था। अपनी झीलों के कारण यह शहर झीलों की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। उदयपुर शहर सिसोदिया राजवंश द्वारा ‌शासित मेवाड़ की राजधानी रहा है। राजस्थान का यह सुन्दर शहर देश विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए एक सपना सा लगता है। यह शहर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अनुपम है।[3] किसी समय विलायती प्रशासक जेम्स टोड ने उदयपुर पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर "सबसे रुमानी" शहर कहा था [4]

इतिहास

मेवाड़ की राजधानी उदयपुर की स्थापना 1559 में महाराणा उदयसिंह ने की। किन्तु तिथि को लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कुछ इतिहासकार हिन्दू कैलेंडर के अनुसार उदयपुर की स्थापना आखातीज के दिन मानते हैं तो कुछ का कहना है कि उदयपुर की स्थापना पंद्रह अप्रैल 1553 में ही हो गई थी। जिसके प्रमाण उदयपुर(राजस्थान) के मोतीमहल में मिलते हैं। जिसे उदयपुर का पहला महल माना जाता है जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है, जिसकी सुरक्षा मोतीमगरी ट्रस्ट कर रहा है। महाराणा उदय सिंह द्वितीय, जो महाराणा प्रताप के पिता थे, चित्तौडग़ढ़ दुर्ग से मेवाड़ का संचालन करते थे। उस समय चित्तौडग़ढ़ निरन्तर मुगलों के आक्रमण से घिरा हुआ था। इसी दौरान महाराणा उदयसिंह अपने पौत्र अमरसिंह के जन्म के उपलक्ष्य में मेवाड़ के शासक भगवान एकलिंगजी के दर्शन करने कैलाशपुरी आए थे। उन्होंने यहाँ आयड़ नदी के किनारे शिकार के लिए डेरे डलवाए थे। तब उनके दिमाग में चित्तौडग़ढ़ पर मुगल आतताइयों के आक्रमण को लेकर सुरक्षित जगह राजधानी बनाए जाने का मंथन चल रहा था।

इसी दौरान उन्होंने एक शाम अपने सामंतों के समक्ष उदयपुर नगर बसाने का विचार रखा। जिसका सभी सामंत तथा मंत्रियों ने समर्थन किया। उदयपुर की स्थापना के लिए वह जगह तलाशने पहुँचे तब उन्होंने यहाँ पहला महल बनवाया, जिसका नाम मोती महल दिया, जो वर्तमान मोती मगरी पर खंडहर के रूप में मौजूद है। जिसको लेकर कई इतिहासकारों का मानना है कि मोतीमहल उदयपुर का पहला महल है और एक तरह से इस के निर्माण के साथ ही उदयपुर नगर की स्थापना शुरू हुई। स्थापना का दिन पंद्रह अप्रेल 1553 था और उस दिन आखातीज थी।

बाकी इतिहासकार भी यह मानते हैं कि उदयपुर की स्थापना आखातीज के दिन हुई है, लेकिन यह तिथि पंद्रह अप्रैल 1553 है इसको लेकर कोई शिलालेख या प्रमाण मौजूद नहीं हैं।

इतिहासकारों की मानें तो एक बार महाराणा उदयसिंह मोतीमहल में निवास कर रहे थे, तभी वह शिकार की भावना से खरगोश का पीछा करते हुए उस जगह पहुँचे जहाँ राजमहल मौजूद हैं। तब उदयुपर में फतहसागर नहीं था और वह एक सहायक नदी के रूप में था। वहाँ एक योगी साधू धूणी रमाए बैठे थे। साधू जगतगिरी से उनकी मुलाकात हुई और महाराणा के दिल का हाल जानकार साधू ने धूणी की जगह पर राज्य बसाने का सुझाव दिया, जिसे महाराणा ने मान लिया।

यह बात सन 1559 की थी। जिस पहाड़ी की चोटी पर महल का निर्माण कराया गया, वह समूचे शहर से दिखाई देता है। जहाँ अलग-अलग काल में महाराणाओं ने राजमहल का निर्माण कराया। बाद में सरदार, राव, उमराव और ठिकानों के लोग भी राजमहल के पास बसाए गए। जिनकी हवेलियाँ भी राजमहल के इर्द-गिर्द मौजूद हैं। इतिहासकार जोगेंद्र राजपुरोहित बताते हैं कि पंद्रह अप्रेल को इस तरह उदयपुर शहर की स्थापना हुई।[5]

पांच हज़ार साल पुरानी सभ्यता

उदयपुर की स्थापना से पांच हजार साल पहले आयड़ नदी के किनारे सभ्यता मौजूद थी। विभिन्न उत्खनन के स्तरों से पता चलता है कि प्रारंभिक बसावट से लेकर अठारहवीं सदी तक यहाँ कई बार बस्तियाँ बसी और उजड़ी। आहड़ के आस-पास तांबे की उपलब्धता के चलते यहाँ के निवासी इस धातु के उपकरण बनाते थे। इसी की वजह से यह तांबावती नगरी के नाम से जाना जाता था। इसी तरह पिछोली गांव भी महाराणा लाखा (सन 1382-1421 )के काल का है।

जब कुछ बंजारे यहाँ से गुजर रहे थे। छीतर नाम के बंजारे की बैलगाड़ी नमी वाली जगह धँस गई और वहाँ पानी का स्रोत जानकर खुदाई की और पिछोला झील का निर्माण हुआ था। तब यहाँ चारों तरफ पहाड़ी इलाके हुआ करते थे।[6]

मेवाड़

8वीं से 16वीं सदी तक बप्पा रावल के वंशजो ने अजेय शासन किया और तभी से यह राज्य मेवाड के नाम से जाना जाता है। बुद्धि तथा सुन्दरता के लिये विख्यात महारानी पद्मिनी भी यहीं की थी। कहा जाता है कि उनकी एक झलक पाने के लिये सल्तनत दिल्ली के सुल्तान अल्लाउदीन खिलजी ने इस किले पर आक्रमण किया। रानी ने अपने चेहरे की परछाई को लोटस कुण्ड में दिखाया। इसके बाद उसकी इच्छा रानी को ले जाने की हुई। पर यह संभव न हो सका। क्योंकि महारानी सभी रानियों और सभी महिलाओं सहित एक-एक कर जलती हुयी आग जिसे विख्यात जौहर के नाम से जानते हैं, में कूद गयी और अल्लाउदीन खिलजी की इच्छा पूरी न हो सकी। मुख्य शासकों में बप्पा रावल (1433-68), राणा सांगा (1509-27) जिनके शरीर पर 80 घाव होने, एक टांग न (अपंग) होने, एक हाथ न होने के बावजूद भी शासन सामान्य रूप से चलाते थे बल्कि बाबर के खिलाफ लडाई में भी भाग लिया। और सबसे प्रमुख महाराणा प्रताप (1572-92) हुए जिन्होने अकबर की अधीनता नहीं स्वीकार की और राजधाने के बिना राज्य किया।

दर्शनीय स्थल (शहर में)

पिछोला झील

ऐतिहासिक दृष्टि से इस झील के बारे में कहा जाता है कि महाराणा लाखा के काल में इस झील का निर्माण एक बंजारे द्वारा करवाया गया इस झील के बीचों बीच एक नटनी का चबूतरा बना हुआ है महाराणा उदय सिंह द्वितीय ने इस शहर की खोज के बाद इस झील का विस्तार कराया था। झील में दो द्वीप हैं और दोनों पर महल बने हुए हैं। एक है जग निवास, जो अब लेक पैलेस होटल बन चुका है और दूसरा है जग मंदिर। दोनों ही महल राजस्थानी शिल्पकला के बेहतरीन उदाहरण हैं, बोट द्वारा जाकर इन्हें देखा जा सकता है।[7]

जग निवास द्वीप, उदयपुर

पिछोला झील पर बने द्वीप पैलेस में से एक यह महल, जो अब एक सुविधाजनक होटल का रूप ले चुका है। कोर्टयार्ड, कमल के तालाब और आम के पेड़ों की छाँव में बना स्विमिंग-पूल मौज-मस्ती करने वालों के लिए एक आदर्श स्थान है। आप यहाँ आएं और यहाँ रहने तथा खाने का आनंद लें किंतु आप इसके भीतरी हिस्सों में नहीं जा सकते।

जग मंदिर, उदयपुर

पिछोला झील पर बना एक अन्य द्वीप पैलेस। यह महल महाराजा करण सिंह द्वारा बनवाया गया था, किंतु महाराजा जगत सिंह ने इसका विस्तार कराया। महल से बहुत शानदार दृश्य दिखाई देते हैं, गोल्डन महल की सुंदरता दुर्लभ और भव्य है।

सिटी पैलेस, उदयपुर

प्रसिद्ध और शानदार सिटी पैलेस उदयपुर के जीवन का अभिन्न अंग है। यह राजस्थान का सबसे बड़ा महल है। इस महल का निर्माण शहर के संस्थापक महाराणा उदय सिंह-द्वितीय ने करवाया था। उनके बाद आने वाले राजाओं ने इसमें विस्तार कार्य किए। तो भी इसके निर्माण में आश्चर्यजनक समानताएं हैं। महल में जाने के लिए उत्तरी ओर से बड़ीपोल से और त्रिपोलिया द्वार से प्रवेश किया जा सकता है।[8]

शिल्पग्राम, उदयपुर

यह एक शिल्पग्राम है जहाँ गोवा, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के पारंपरिक घरों को दिखाया गया है। यहाँ इन राज्यों के शास्त्रीय संगीत और नृत्य भी प्रदर्शित किए जाते हैं।[9]

सज्‍जनगढ़ (मानसून पैलेस)

उदयपुर शहर के दक्षिण में अरावली पर्वतमाला के एक पहाड़ का निर्माण महाराजा सज्जन सिंह ने करवाया था। यहाँ गर्मियों में भी अच्‍छी ठंडी हवा चलती है। सज्‍जनगढ़ से उदयपुर शहर और इसकी झीलों का सुंदर नज़ारा दिखता है। पहाड़ की तलहटी में अभयारण्‍य है। सायंकाल में यह महल रोशनी से जगमगा उठता है, जो देखने में बहुत सुंदर दिखाई पड़ता है।[10]

फतेह सागर

महाराणा जय सिंह द्वारा निर्मित यह झील बाढ़ के कारण नष्ट हो गई थी, बाद में महाराणा फतेह सिंह ने इसका पुनर्निर्माण करवाया। झील के बीचों-बीच एक बगीचा नेहरु गार्डन, स्थित है। आप बोट अथवा ऑटो द्वारा झील तक पहुँच सकते हैं।

मोती मगरी

यहाँ सिसोदिया राजपूत वंश के विश्व प्रसिद्ध महाप्रतापी राजा महाराणा प्रताप की मूर्ति है। मोती मगरी फतेहसागर के पास की पहाड़ी पर स्थित है। मूर्ति तक जाने वाले रास्तों के आसपास सुंदर बगीचे हैं, विशेषकर जापानी रॉक गार्डन दर्शनीय हैं।

बाहुबली हिल्स, उदयपुर

बाहुबली हिल्स उदयपुर से १४ किलोमीटर दूर बड़ी तालाब के समीप की पहाड़ी पर स्थित है ये जगह युवाओ में लोकप्रिय है और उनका पसंदीदा स्थान बन चुकी है।

एकलिंगजी मंदिर[11]

एकलिंगजी मंदिर राजस्थान के सबसे लोकप्रिय मंदिरों में से एक है और उदयपुर के उत्तर में 22 किमी की दूरी पर स्थित है। एकलिंगजी मंदिर हिंदू धर्म के भगवान शिव को समर्पित है और इसकी शानदार वास्तुकला हर साल यहाँ कई पर्यटकों को आकर्षित करती है। इसकी ऊंचाई लगभग 50 फीट है और इसके चार चेहरे भगवान शिव के चार रूपों को दर्शाते है। चाँदी के साँप की माला पहना हुआ शिवलिंग एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है।

सहेलियों की बाड़ी

सहेलियों की बाड़ी / दासियों के सम्मान में बना बाग एक सजा-धजा बाग है। इसमें कमल के तालाब, फव्वारे, संगमरमर के हाथी और कियोस्क बने हुए हैं।

दर्शनीय स्थल (आसपास)

  • नाथद्वारा ४८ किलोमीटर दूर है उदयपुर से
  • कुंभलगढ ८० किलोमीटर
  • कांकरोली ७० किलोमीटर
  • ऋषभदेव यह केसरिया जी के नाम से भी प्रसिद्ध है।
  • एकलिंगजी १३ किलोमीटर
  • हल्दीघाटी २६ मील की दूरी पर स्थित
  • जयसमंद झील
  • सांवरियाजी का मंदिर 80किलोमीटर
  • रणकपुर
  • चित्तौडगढ
  • जगत निवास
  • मेनार ५२ किलोमीटर दूर हैंं उदयपुर से

यातायात

उदयपुर के सार्वजनिक यातायात के साधन मुख्यतः बस, ऑटोरिक्शा और रेल सेवा हैं।

हवाई मार्ग

सबसे नजदीकी हवाई अड्डा उदयपुर हवाई अड्डा है। यह हवाई अड्डा उदयपुर से २० कि॰मी॰ दूर डबोक में है। जयपुर, जोधपुर, औरंगाबाद, दिल्ली तथा मुंबई से यहाँ नियमित उड़ानें उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग

यहाँ उदयपुर सिटी रेलवे स्टेशन नामक रेलवे स्टेशन है। यह स्टे‍शन देश के अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग

यह शहर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर स्थित है। यह सड़क मार्ग से जयपुर से 9 घण्टे, दिल्ली से 14 घण्टे तथा मुंबई से 17 घण्टे की दूरी पर स्थित है।

समाचार पत्र

  • दैनिक भास्कर
  • राजस्थान पत्रिका
  • उदयपुर दोपहर

उदयपुर के पर्यटन स्थल

उदयपुर को पहले मेवाड़ के नाम से जाना जाता था। इस शहर ने बहुत कम समय में देश को कई देशभक्त दिए हैं। यहां का मेवाड़ राजवंश अपने को सूर्य से जोड़ता है। यहां का इतिहास निरंतर संघर्ष का इतिहास रहा है। यह संघर्ष स्वतंत्रता, स्वाभिमान तथा धर्म के लिए हुआ। संघर्ष कभी राजपूतों के बीच तो कभी मुगलों तथा अन्य शासकों के साथ हुआ। यहां जैसी देशभक्ति, उदार व्यवहार तथा स्वतंत्रता के लिए उत्कृष्ट इच्छा किसी दूसरी जगह देखने को नहीं मिलती है।

उदयपुर जिसे झीलों की नगरी कहा जाता है उत्तरी भारत का सबसे आकर्षक पर्यटक शहर माना जाता है। यहां पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए बहुत कुछ है। झीलों के साथ मरुभूमि का अनोखा संगम और कहीं नहीं देखने को मिलता है। यह शहर अरावली पहाड़ी के पास राजस्थान में स्थित है। उदयपुर को हाल ही में विश्व का सबसे खूबसूरत शहर घोषित किया गया है। उदयपुर की पोर्टल वेबसाइट है 'वेब उदयपुर'। इस वेबसाइट में उदयपुर के बारे में हर तरह की जानकारियां उपलब्ध है। सभी पर्यटन स्थलों का विस्तृत वर्णन है इस का पता है।

मुख्य पर्यटन स्थल

यहां के प्रमुख दर्शनीय स्थल यहां के शासकों द्वारा बनवाई गई महलें, झीलें, बगीचें तथा स्मारक हैं। ये सभी चीजें सिसौदिया राजपूत शासकों के सदगुण, विजय तथा स्वतंत्रता की याद दिलाते हैं। इनका निर्माण उस समय हुआ जब मेवाड़ ने पहली बार मुगलों की अधीनता स्वीक‍ार की थी तथा बाद में अंग्रेजों की। आपको उदयपुर घूमने के लिए कम-से-कम तीन दिन का समय देना चाहिए। इसके आसपास के स्थानों को घूमने के लिए दो और दिन देना चाहिए।

सिटी पैलेस

सिटी पैलेस की स्थापना 16 वीं शताब्दी में आरम्भ हुई। इसे स्थापित करने का विचार एक संत ने राजा उदय सिंह को दिया था। इस प्रकार यह परिसर 400 वर्षों में बने भवनों का समूह है। यह एक भव्य परिसर है। इसे बनाने में 22 राजाओं का योगदान था। इस परिसर में प्रवेश के लिए टिकट लगता है। बादी पॉल से टिकट लेकर आप इस परिसर में प्रवेश कर सकते हैं।[1] परिसर में प्रवेश करते ही आपको भव्य 'त्रिपोलिया गेट' दिखेगा।[2] इसमें सात आर्क हैं। ये आर्क उन सात स्मरणोत्सवों का प्रतीक हैं जब राजा को सोने और चांदी से तौला गया था तथा उनके वज़न के बराबर सोना-चांदी को गरीबों में बांट दिया गया था। इसके सामने की दीवार 'अगद' कहलाती है। यहां पर हाथियों की लड़ाई का खेल होता था। इस परिसर में एक जगदीश मंदिर भी है। इसी परिसर का एक भाग सिटी पैलेस संग्रहालय है।[3] इसे अब सरकारी संग्रहालय घोषित कर दिया गया है। वर्तमान में शम्भूक निवास राजपरिवार का निवास स्थानन है। इससे आगे दक्षिण दिशा में 'फतह प्रकाश भवन' तथा 'शिव निवास भवन' है। वर्तमान में दोनों को होटल में परिवर्तित कर दिया गया है।

सिटी पैलेस संग्रहालय

सिटी पैलेस संग्रहालय में प्रवेश करते ही आप की नज़र कुछ बेहतरीन चित्रों पर पड़ेगी। ये चित्र श्रीनाथजी, एकलिंगजी तथा चतुर्भुज जी के हैं। यह सभी चित्र मेवाड़ शैली में बने हुए हैं। इसके बाद महल तथा चौक मिलने आरम्भ होते हैं। इन सभी में इनके बनने का समय तथा इन्हें बनाने वाले का उल्लेख मिलता है। सबसे पहले राज्य आंगन मिलता है। इसके बाद चंद्र महल आता है। यहां से पिछोला झील का बहुत सुंदर नजारा दिखता है। बादी महल या अमर विलास महल पत्थरों से बना हुआ है। इस भवन के साथ बगीचा भी लगा हुआ है। कांच का बुर्ज एक कमरा है जो लाल रंग के शीशे से बना हुआ है। कृष्णा निवास में मेवाड़ शैली के बहुत से चित्र बने हुए है। इसका एक कमरा जेम्स टोड को समर्पित है। इसमें टोड का लिखा हुआ इतिहास तथा उनके कुछ चित्र हैं। मोर चौक का निर्माण 1620 ई. में हुआ था।[4] 19 वीं शताब्दी में इसमें तीन नाचते हुए हिरण की मूर्त्ति स्थापित की गई। जनाना महल राजपरिवार की महिलाओं का निवास स्थान था।

लोकेशन: जगदीश मंदिर से 150 मीटर दक्षिण में। प्रवेश शुल्क:: वयस्कों के लिए 50 रु. तथा बच्चों के लिए 30 रु.। समय: सुबह 9:30 बजे से शाम 4:30 बजे तक, सभी दिन खुला हुआ।

सरकारी संग्रहालय

सरकारी संग्रहालय में मेवाड़ से संबंधित शिलालेख रखे हुए हैं।[5] ये शिलालेख दूसरी शताब्दी. ईसा पूर्व से 19 वीं शताब्दी तक हैं। यहां बहुत से प्रतिमाएं भी रखी हुई हैं। कृष्ण और रुक्मणी के मेवाड़ शैली में बने हुए बहुत से चित्र भी यहां रखे हुए हैं। इसमें खुर्रम (बाद में शाहजहां) का साफा भी रखा हुआ है। खुर्रम ने जब जहांगीर के खिलाफ विद्रोह किया था तो वह उदयपुर में ही रहा था।

लोकेशन: सिटी पैलेस परिसर में प्रवेश शुल्क:: 3 रु. समय: सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक। शुक्रवार बंद।

कांच गैलेरी

कांच गैलेरी धन के अपव्यय को दर्शाती है। राणा सज्जन सिंह ने 1877 ई. में इंग्लैण्ड के एफ एंड सी ओसलर एण्ड कंपनी से कांच के इन सामानों की खरीदारी की थी।[6] इन सामानों में कांच की कुर्सी, बेड, सोफा, डिनर सेट आदि शामिल था। बाद के शासकों ने इन सामानों को सुरक्षित रखा। अब इन सामानों को फतह प्रकाश भवन के दरबार हॉल में पर्यटकों को देखने के लिए रखा गया है।

लोकेशन: फतह प्रकाश महल प्रवेश शुल्क:: वयस्कों के लिए 325 रु. तथा बच्चों के लिए 165 रु.। समय: सुबह 10 बजे से शाम 8 बजे तक। सभी दिन खुला हुआ।

विंटेज कार

विन्टेज कार संग्रह सिटी पैलेस परिसर से 2 किलोमीटर की दूरी पर विंटेज तथा अन्य पुरानी कारों का अच्छा संग्रह है। यहां करीब दो दर्जन कारें पर्यटकों को देखने के‍ लिए रखी हुई हैं। इन कारों में 1934 ई. की रोल्स रॉयस फैंटम भी है। तथा 1939 ई. में काडिलेक कन्वेर्टिबल भी है।[6] 1939 ई. में जब जैकी कैनेडी उदयपुर के दौरे पर आए थे तो इसी कार से घूमे थे।

प्रवेश शुल्क: 100 रु. समय: सुबह 9:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक। प्रतिदिन।

जगदीश मंदिर

जगदीश मंदिर की स्थापना 1651 ई.में हुई थी। यह मंदिर इंडो-आर्यन शैली में बना हुआ था। इस मंदिर में भगवान विष्णु तथा जगन्नाथ की मूर्त्ति स्थापित है।[7]


समय: सुबह 5 बजे से दोपहर 2 बजे तक तथा शाम 4 बजे से रात 11 बजे तक।

बगोर की हवेली

बगोर की हवेली पहले उदयपुर के प्रधानमंत्री अमरचंद वादवा का निवास स्थान था।[6] यह हवेली पिछोला झील के सामने है। इस हवेली का निर्माण 18वीं शताब्दी में हुआ था। इस हवेली में 138 कमरे हैं। इस हवेली में हर शाम को 7 बजे मेवाड़ी तथा राजस्थानी नृत्य का आयोजन किया जाता है।

प्रवेश शुल्क‍: 25 रु. समय: सुबह 10 बजे से शाम 7 बजे तक। सभी दिन खुला।

भारतीय लोक कला संग्रहालय यहां से थोड़ी ही दूर पर स्थित है। यहां कपड़ों, चित्रों तथा कठपुतली की प्रदर्शनी लगाई जाती है।

लोकेशन: गंगौरघाट हवेली प्रवेश शुल्क:: भारतीयों के लिए 15 रु.तथा विदेशियों के लिए 25 रु.। समय: सुबह 9बजे से शाम 6 बजे तक। सभी दिन खुला।

आहर, उदयपुर

इसका उपयोग मेवाड़ के राजपरिवार के लोगों के कब्रिस्तान के रूप में होता है। यहां मेवाड़ के 19 शासकों का स्मारक है। ये स्मारक चार दशकों में बने हैं। यहां सबसे प्रमुख स्मारक महाराणा अमर सिंह का है। अमर सिंह ने सिंहासन त्यागने के बाद अपना अंतिम समय यहीं व्यतीत किया था। इस स्थान का संबंध हड़प्पा सभ्यता से भी जोड़ा जाता है। यहां एक पुरातात्विक संग्रहालय भी है।

लोकेशन: शहर से 2 किलोमीटर पूर्व में प्रवेश शुल्क:: 3 रु. समय: सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक। शुक्रवार बंद।

मानसून भवन, उदयपुर

इसे मूल रूप से सज्जन घर के नाम से जाना जाता था। इसे सज्जन सिंह ने 19 वीं शताब्दी में बनवाया था। पहले यह वेधशाला के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यह एक लॉज के रूप में तब्दील हो चुका है।

लोकेशन: शहर से 8 किलोमीटर पच्छिम में समय: सुबह 10बजे से 6 बजे तक। सभी दिन खुला।

उदयपुर की सात बहनें

उदयपुर के शासक जल के महत्त्व को समझते थे। इसलिए उन्होंने कई डैम तथा जलकुण्ड बनवाए थे। ये कुण्ड उस समय की विकसित इंजीनियरिंग का सबूत हैं। पिछोला, दूध तलाई, गोवर्धन सागर, कुमारी तालाब, रंगसागर, स्वरुप सागर तथा फतह सागर यहां की सात प्रमुख झीलें हैं। इन्हेंन सामूहिक रूप से उदयपुर की सात बहनों के नाम से जाना जाता है। ये झीलें कई शताब्दियों से उदयपुर की जीवनरेखा हैं। ये झीलें एक-दूसरें से जुड़ी हुई हैं। एक झील में पानी अधिक होने पर उसका पानी अपने आप दूसरे झील में चला जाता है।

उदयपुर के आसपास अन्य दर्शनीय स्‍थान

नागदा

(22 किलोमीटर उत्तर) यह एकलिंगजी से कुछ पहले स्थित है। नागदा का प्राचीन शहर कभी रावल नागादित्य की राजधानी थी। वर्तमान में यह एक छोटा सा गांव है। यह गांव 11वीं शताब्दी में बने 'सास-बहू' मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर का मूल नाम 'सहस्त्रहबाहु' था जोकि यह नाम विकृत होकर सास-बहू हो गया है। यह एक छोटा सा मंदिर है। लेकिन मंदिर की वास्तुशैली काफी आकर्षक है। लोकेशन: राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 से 2 किलोमीटर पहले

एकलिंगजी

(23 किलोमीटर उत्तर) यह मंदिर परिसर कैलाशपुरी गांव में स्थित है। एकलिंगजी को शिव का ही एक रूप माना जाता है। माना जाता है कि एकलिंगजी ही मेवाड़ के शासक हैं। राजा तो उनके प्रतिनिधि के रूप में यहां शासन करता था। इस मंदिर का निर्माण बप्पाी रावल ने 8वीं शताब्दी में करवाया था। बाद में यह मंदिर टूटा और पुन: बना। वर्तमान मंदिर का निर्माण महाराणा रायमल ने 15वीं शताब्दीत में करवाया था। इस परिसर में कुल 108 मंदिर हैं। मुख्यत: मंदिर में एकलिंगजी की चार सिरों वाली मूर्त्ति स्थापित है। उदयपुर से यहां जाने के लिए बसें मिलती हैं। लोकेशन: राष्ट्री य राजमार्ग संख्या 8 पर समय: सुबह 4 बजे से 6:30 तक, 10:30 से दोपहर 1:30 तक तथा शाम 5:30 से रात 8 बजे तक।

हल्दी घाटी

(40 किलोमीटर उत्तर) यह एकलिंगजी से 18 किलोमीटर की दूरी पर है। हल्दीघाटी इतिहास में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच हुए युद्ध के लिए प्रसिद्ध है। यह युद्ध 18 जून 1576 ई. को हुआ था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप को हार का सामना करना पड़ा था। इसी युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रसिद्ध घोड़ा चेतक मारा गया था। अब यहां एक संग्रहालय है। इस संग्रहालय में हल्दीघाटी के युद्ध के मैदान का एक मॉडल रखा गया है। इसके अलावा यहां महाराणा प्रताप से संबंधित वस्तुओं को रखा गया है। प्रवेश शुल्क: 20 रु. समय: सुबह 8 बजे से शाम 8 बजे तक। सभी दिन खुला हुआ।

नाथद्वारा

(47 किलोमीटर उत्तर) यहां श्रीनाथजी का मंदिर है। यह मंदिर पुष्टिमार्ग संप्रदाय के अनुयायियों का सबसे पवित्र स्था न है। श्रीनाथजी भगवान कृष्ण के ही रूप हैं। इस संप्रदाय की स्थापना 16वीं शताब्दी में वल्लभाचार्य ने की थी। इस मंदिर में भगवान विष्णु की एक मूर्त्ति है। यह मूर्त्ति काले पत्थर की बनी हुई है। इस मूर्त्ति को औरंगज़ेब के कहर से सुरक्षित रखने के लिए 1669 ई. में मथुरा से लाया गया था। यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए दिन में सात बार खोली जाती है, लेकिन हर बार सिर्फ आधे घण्टे के लिए। यह स्थाान पिच्चमवाई पेंटिग्स के लिए भी प्रसिद्ध है। उदयपुर से यहां के लिए बसें चलती हैं।

कांकरोली तथा राजसमंद

(66 किलोमीटर उत्तर पूर्व) राजसमंद झील कांकरोली तथा राजसमंद शहरों के बीच स्थित है। इस झील की स्थापना 17वीं शताब्दी में मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने की थी। इस झील का निर्माण गोमती, केलवा तथा ताली नदियों पर डैम बनाकर किया गया है। कांकरोली में झील के तट पर द्वारकाधीश कृष्णा का मंदिर है। यहां जाने के लिए उदयपुर से सीधी बस सेवा है।

[जयसमंद झील]

(48 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व) यह भारत का सबसे बड़ा कृत्रिम झील है। यह झील 88 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। महाराणा जयसिंह ने इस झील का निर्माण 17वीं शताब्दी में गोमती नदी पर डैम बनाकर किया था। इसके तटबंध पर मार्बल का एक स्माीरक तथा भगवान शिव का एक मंदिर है। इस झील के दूसरी तरफ राजपरिवार के लोगों के गर्मियों में रहने के लिए महल बने हुए हैं। इस झील में सात द्वीप हैं। यह झील के चारों तरफ पहाडियां हैं। पहाडियों पर दो महल बने हुए हैं। इनमें से एक हवा महल तथा दूसरा रुठी रानी का महल है। यहां एक जयसमंद वन्याजीव अभ्याेरण भी है।

अभ्यांरण में प्रवेश शुल्कठ

भारतीयों के लिए 10 रु. तथा विदेशियों के लिए 80 रु.। समय:सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक। सभी दिन खुला। यहां ठहरने के लिए जयसमंद आईलैंड रिजॉर्ट है।

यातायात सुविधाएं

हवाई मार्ग

सबसे नजदीकी हवाई अड्डा उदयपुर हवाई अड्डा है। यह हवाई अड्डा डबौक में है। जयपुर, जोधपुर औरंगाबाद, दिल्ली तथा मुंबई से यहां नियमित उड़ाने उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग

यहां उदयपुर सिटी रेलवे स्टेशन नामक रेलवे स्टेशन है। यह स्टे‍शन देश के अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग

करणी माता माता मन्दिर

करणी माता का मंदिर उदयपुर के दक्षिण भाग में माछला मंगरा पर स्थित है जिि

संदर्भ / स्रोत

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