छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। इसका गठन १ नवम्बर २००० को हुआ था और यह भारत का २६ वां राज्य है। पहले यह मध्य प्रदेश के अन्तर्गत था। संसाधन संपन्न राज्य, यह देश के लिए बिजली और इस्पात का एक स्रोत है, जिसका उत्पादन कुल स्टील का 15% है। [2] छत्तीसगढ़ भारत में सबसे तेजी से विकसित राज्यों में से एक है। [3]
छत्तीसगढ़
| भारत का राज्य
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| राजधानी
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रायपुर
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| सबसे बड़ा शहर
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रायपुर
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| जनसंख्या
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2,55,45,198
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| - घनत्व |
189 /किमी²
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| क्षेत्रफल
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1,35,192 किमी²
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| - ज़िले |
33
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| राजभाषा
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हिन्दी, छत्तीसगढ़ी[1]
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| गठन
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1 नवम्बर 2000
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| सरकार
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छत्तीसगढ़ सरकार
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| - राज्यपाल |
रमन डेका
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| - मुख्यमंत्री |
विष्णुदेव साय
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| - विधानमण्डल |
एकसदनीय विधान सभा (90 सीटें)
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| - भारतीय संसद |
राज्य सभा (5 सीटें) लोक सभा (11 सीटें)
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| - उच्च न्यायालय |
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय
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| डाक सूचक संख्या
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49
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| वाहन अक्षर
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CG
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| आइएसओ 3166-2
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IN-CT
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| cgstate.gov.in
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छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। इसका गठन १ नवम्बर २००० को हुआ था और यह भारत का २६वां राज्य है। पहले यह मध्य प्रदेश के अन्तर्गत था। संसाधन संपन्न राज्य, यह देश के लिए बिजली और इस्पात का एक स्रोत है, जिसका उत्पादन कुल स्टील का 15% है।[2] छत्तीसगढ़ भारत में सबसे तेजी से विकसित राज्यों में से एक है।[3]
इतिहास
छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और दक्षिण कौशल से पहले दंडकारण्य गोंड लोगों का प्राचीन निवास स्थान भी था और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोशल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्य पुराण[क], महाभारत[ख] के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण[ग] के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे।
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा। गोंडवाना उदय 1200 ईस्वी में हुआ।और तब कल्चुरी राजाओं ने गोंड राजाओं की प्रधानता स्वीकार कर ली। छत्तीसगढ़ में गोंड अनुसूचित जनजाति में आते हैं किंतु इनका क्षेत्रीय दृष्टिकोण से क्षत्रिय वर्ण है।[4]
1200 ईस्वी में कलचुरी राजाओं के पतन के बाद छत्तीसगढ़ गोंडवाना साम्राज्य का भग था। 1200 ईस्वी से लेकर 1600 ईस्वी तक यहां गोंड राजाओं का राज रहा। उसके बाद 1650- 1818छत्तीसगढ़ मराठा सामंती राज्य के अंतर्गत आता था। फिर मराठों ने ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि कर ली। इस तरह यह भाग ब्रिटिश राज्य के अंदर आ गया। [5]
आजादी से पहले यहां 14 रियासतें थी।
*बस्तर सबसे बड़ी रियासत थी और शक्ति सबसे छोटी रियासत थी।
1)बस्तर रियासत:
वंश:काकतीय वंश (दक्षिण भारत)
क्षेत्र:33,830 वर्ग किलोमीटर।
2)सरगुजा रियासत:
वंश: रक्सेल
क्षेत्र:15,682 वर्ग किलोमीटर।
3) जशपुर रियासत:
वंश:चौहान
क्षेत्र:5,045 वर्ग किलोमीटर।
4) कोरिया रियासत:
वंश:चौहान
क्षेत्र:4,224 वर्ग किलोमीटर।
5)रायगढ़ रियासत:
वंश:राजगोंड
क्षेत्र:3,849 वर्ग किलोमीटर
6) कांकेर रियासत:
वंश: चन्द्रा
क्षेत्र:3,706 वर्ग किलोमीटर।
7)खैरागढ़ रियायत:
वंश:नागवंशी
क्षेत्र:2,411 वर्ग किलोमीटर।
8)नंदगांव(राजनंदगांव) रियासत:
वंश:बैरागी ब्राह्मण
क्षेत्र:2,225 वर्ग किलोमीटर।
9) चांगभाकर रिसायत:
वंश:चौहान
क्षेत्र:2,223 वर्ग किलोमीटर।
10) कवर्धा रियासत:
वंश:राजगोंड
क्षेत्र:2,067 वर्ग किलोमीटर।
11)उदयपुर रियासत:
वंश:रक्सेल
क्षेत्र:2,741 वर्ग किलोमीटर।
12)सारंगढ़ रियासत:
वंश:राजगोंड
क्षेत्र:1,399 वर्ग किलोमीटर।
13) छुईखदान रियासत:
वंश:बैरागी ब्राह्मण
क्षेत्र:451 वर्ग किलोमीटर।
14) सक्ती रियायत:
वंश:राजगोंड
क्षेत्र:357 वर्ग किलोमीटर।
भूगोल
छत्तीसगढ़ के उत्तर में उत्तर प्रदेश और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का शहडोल संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और झारखंड, दक्षिण में तेलंगाना और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। यहाँ सबसे ज्यादा मिस्रित वन पाया जाता है। सागौन की कुछ उन्नत किस्म भी छत्तीसगढ़ के वनो में पायी जाती है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि॰मी॰ चौड़ा और 322 कि॰मी॰ लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है। पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं : उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ, खारुन, अरपा, पैरी तथा इंद्रावती नदी।[6]
छत्तीसगढ़ का विभाजन
एक नये राज्य छत्तीसगढ़ की शुरुआती मांग सन १९२० में उठी। इसी प्रकार की अनेक मांगें उठती रही लेकिन कभी एक संगठित रूप से कोइ मांग नहीं की गयी। संगठित रूप से पृथक छत्तीसगढ़ राज्य की सर्वप्रथम १९२४ में रायपुर की कांग्रेस यूनीट द्वारा की गयी और बाद में त्रिपुरा में भारतीय कांग्रेस की वार्षिक सत्र में चर्चा की गयी। एक क्षेत्रीय कांग्रेस संगठन बनाने की भी मांग उठी।
अर्थव्यवस्था
छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था मुख्यतः खनिज संसाधनों, ऊर्जा उत्पादन, इस्पात उद्योग और कृषि पर आधारित है। राज्य देश के कुल इस्पात उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है और इसे ऊर्जा उत्पादन के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है।
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए राज्य सरकार ने विधानसभा में अपना वार्षिक बजट प्रस्तुत किया। यह बजट विष्णुदेव साय सरकार का तीसरा बजट था, जिसे वित्त मंत्री ओपी चौधरी द्वारा पेश किया गया। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बजट में बुनियादी ढांचे, कृषि, सामाजिक कल्याण और आदिवासी विकास पर विशेष ध्यान दिया गया।[7][8]
जिले
छत्तीसगढ़ राज्य गठन के समय यहाँ सिर्फ 16 जिले थे पर बाद में 2 नए जिलो की घोषणा की गयी जो कि नारायणपुर व बीजापुर थे। पर इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने 15 अगस्त 2011 को 9 और नए जिलो की घोषणा की जो 1 जनवरी 2012 से अस्तित्व में आ गये, इस तरह अब छत्तीसगढ़ में कुल 27 जिले हैं।
- कवर्धा जिला • *कांकेर जिला (उत्तर बस्तर) • कोरबा जिला • कोरिया जिला • जशपुर जिला • जांजगीर-चम्पा जिला • दन्तेवाड़ा जिला (दक्षिण बस्तर) • दुर्ग जिला • धमतरी जिला • बिलासपुर जिला • बस्तर जिला • महासमुन्द जिला • राजनांदगांव जिला • रायगढ जिला • रायपुर जिला • सरगुजा जिला • नारायणपुर जिला • बीजापुर • बेमेतरा • बालोद जिला • बलोदाबाज़ार • बलरामपुर • गरियाबंद • सूरजपुर • कोंडागांव जिला • मुंगेली • सुकमा
कला एवं संस्कृति
आदिवासी कला काफी पुरानी है। प्रदेश की आधिकारिक भाषा हिन्दी है और लगभग संपूर्ण जनसंख्या उसका प्रयोग करती है। प्रदेश की आदिवासी जनसंख्या हिन्दी की एक उपभाषा छत्तीसगढ़ी बोलती है।
साहित्य
छत्तीसगढ़ साहित्यिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है। इस जनपद का लेखन हिन्दी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता-संवारता रहा है।[9] छत्तीसगढ़ी और अवधी दोनों का जन्म अर्धमागधी के गर्भ से आज से लगभग 1080 वर्ष पूर्व नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था।"[10]
भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रूप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे। इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है।
अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है :
- छत्तीसगढ़ी गाथा युग - सन् 1000 से 1500 ई. तक
- छत्तीसगढ़ी भक्ति युग - मध्य काल, सन् 1500 से 1900 ई. तक
- छत्तीसगढ़ी आधुनिक युग - सन् 1900 से आज तक
यह विभाजन किसी प्रवृत्ति की सापेक्षिक अधिकता को देखकर किया गया है। एक और उल्लेखनीय बत यह है कि दूसरे आर्यभाषाओं के जैसे छत्तीसगढ़ी में भी मध्ययुग तक सिर्फ पद्यात्मक रचनाएँ हुई है।
लोकगीत और लोकनृत्य
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। यहाँ के लोकगीतों में विविधता है। गीत आकार में अमूमन छोटे और गेय होते है एवं गीतों का प्राणतत्व है -- भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों में से कुछ हैं: भोजली, पंडवानी, जस गीत, भरथरी लोकगाथा, बाँस गीत, गऊरा गऊरी गीत, सुआ गीत, देवार गीत, करमा, ददरिया, डण्डा, फाग, चनौनी, राउत गीत और पंथी गीत। इनमें से सुआ, करमा, डण्डा व पंथी गीत नाच के साथ गाये जाते हैं।
खेल
छत्तीसगढ़ी बाल खेलों में अटकन-बटकन लोकप्रिय सामूहिक खेल है। इस खेल में बच्चे आंगन परछी में बैठकर, गोलाकार घेरा बनाते है। घेरा बनाने के बाद जमीन में हाथों के पंजे रख देते है। एक लड़का अगुवा के रूप में अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उन उल्टे पंजों पर बारी-बारी से छुआता है। गीत की अंतिम अंगुली जिसकी हथेली पर समाप्त होती है वह अपनी हथेली सीधी कर लेता है। इस क्रम में जब सबकी हथेली सीधे हो जाते है, तो अंतिम बच्चा गीत को आगे बढ़ाता है। इस गीत के बाद एक दूसरे के कान पकड़कर गीत गाते है।
फुगड़ी
बालिकाओं द्वारा खेला जाने वाला फुगड़ी लोकप्रिय खेल है। चार, छः लड़कियां इकट्ठा होकर, ऊंखरु बैठकर बारी-बारी से लोच के साथ पैर को पंजों के द्वारा आगे-पीछे चलाती है। थककर या सांस भरने से जिस खिलाड़ी के पांव चलने रुक जाते हैं वह हट जाती है।
लंगड़ी
यह वृद्धि चातुर्थ और चालाकी का खेल है। यह छू छुओवल की भांति खेला जाता है। इसमें खिलाड़ी एड़ी मोड़कर बैठ जाते है और हथेली घुटनों पर रख लेते है। जो बच्चा हाथ रखने में पीछे होता है बीच में उठकर कहता है।
खुडुवा (कबड्डी)
खुड़वा पाली दर पाली कबड्डी की भांति खेला जाने वाला खेल है। दल बनाने के इसके नियम कबड्डी से भिन्न है। दो खिलाड़ी अगुवा बन जाते है। शेष खिलाड़ी जोड़ी में गुप्त नाम धर कर अगुवा खिलाड़ियों के पास जाते है - चटक जा कहने पर वे अपना गुप्त नाम बताते है। नाम चयन के आधार पर दल बन जाता है। इसमें निर्णायक की भूमिका नहीं होती, सामूहिक निर्णय लिया जाता है।
डांडी पौहा
डांडी पौहा गोल घेरे में खेला जाने वाला स्पर्द्धात्मक खेल है। गली में या मैदान में लकड़ी से गोल घेरा बना दिया जाता है। खिलाड़ी दल गोल घेरे के भीतर रहते है। एक खिलाड़ी गोले से बाहर रहता है। खिलाड़ियों के बीच लय बद्ध गीत होता है। गीत की समाप्ति पर बाहर की खिलाड़ी भीतर के खिलाड़ी किसी लकड़े के नाम लेकर पुकारता है। नाम बोलते ही शेष गोल घेरे से बाहर आ जाते है और संकेत के साथ बाहर और भीतर के खिलाड़ी एक दूसरे को अपनी ओर करने के लिए बल लगाते है, जो खींचने में सफल होता वह जीतता है। अंतिम क्रम तक यह स्पर्द्धा चलती है।
जातियां
छत्तीसगढ़ मॆं कई जातियां और जनजातियां हैं। जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ राज्य की कुल जनसंख्या में से 30.62 प्रतिशत (78.22 लाख) जनसंख्या अनुसूचित जनजातियों की है। अघरीया, गोंड, भुंजिया, कंवर, बिंझवार ,उरांव, हल्बा, भतरा, सवरा आदि प्रमुख जनजातियॉ है। अबूझमाड़िया, कमार, बैगा, पहाड़ी कोरवा तथा बिरहोर राज्य के विशेष पिछड़ी जनजातियाँ हैं। इनके अतिरिक्त अन्य जनजाति समूह भी है, जिनकी जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है।
पर्यटन स्थल
- नवागढ़
- सेतगंगा
- चित्रकोट जलप्रपात
- तीरथगढ़ जलप्रपात
- इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान
- कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान
- गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान
- कैलाश गुफा
- गंगरेल बांध
- सिरपुर
- मल्हार
- भोरमदेव मंदिर
- मैनपाट
(जल विहार बुका) हसदेव नदी के चारो तरफ हरे भरे पहाड़ियों से घिरा जलमग्न सुंदर प्राकृतिक सौंदय से परिपूर्ण मिनीमाता बांगो बांध का भराओ वाला जगह है जो कोरबा जिला के मड़ई गांव से पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।यहां नाविक रहते है जो जल विहार कराते है ।
- (केंदई जल प्रपात)केंदई जलप्रपात कोरबा जिला मुख्यालय से 85 किलोमीटर की दूरी पर अम्बिकापुर रोड पर स्थित है इस पर सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है।जलप्रपात के नीचे जाने पर इंद्रधनुष की सुंदर चित्र बनती है जो मनमोहक है देखा जा सकता है। तथा चारो ओर हरे भरे पहाड़ियों से घिरा हुआ है।
(गोल्डन आइलैंड)गोल्डन आइलैंड केंदई ग्राम से सात किलोमीटर मीटर साउथ में है जहां तक सड़क मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है।जो हसदेव नदी पर एक लैंड बना हुआ है जहां नाविक भी रहते है जो कभी भी जल विहार करा सकते है।जो बहुत ही आनंदमय जगह है।तथा पिकनिक स्पॉट भी है।
बमलेश्वरी मंदिर
टीका टिप्पणी
क. ^ "मन्दाकिनीदशार्णा च चित्रकूटा तथैव च।
तमसा पिप्पलीश्येनी तथा चित्रोत्पलापि च।।"
मत्स्यपुराण - भारतवर्ष वर्णन प्रकरण - 50/25)
ख. ^ "चित्रोत्पला" चित्ररथां मंजुलां वाहिनी तथा।
मन्दाकिनीं वैतरणीं कोषां चापि महानदीम्।।"
https://cgcollegeinfo.in/
- महाभारत - भीष्मपर्व - 9/34
ग. ^ "चित्रोत्पला वेत्रवपी करमोदा पिशाचिका।
तथान्यातिलघुश्रोणी विपाया शेवला नदी।।"
ब्रह्मपुराण - भारतवर्ष वर्णन प्रकरण - 19/31)
रामायणकालीन छत्तीसगढ़
ऐसे अनेक तथ्य हैं जो इंगित करते हैं कि ऐतिहासिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ प्रदेश की प्राचीनता रामायण युग को स्पर्श करती है। उस काल में दण्डकारण्य नाम से प्रसिद्ध यह वनाच्छादित प्रान्त आर्य-संस्कृति का प्रचार केन्द्र था। यहाँ के एकान्त वनों में ऋषि-मुनि आश्रम बना कर रहते और तपस्या करते थे। इनमें वाल्मीकि, अत्रि, अगस्त्य, सुतीक्ष्ण प्रमुख थे इसीलिये दण्डकारण्य में प्रवेश करते ही राम इन सबके आश्रमों में गये। राम के काल में भी कौशल राज्य उत्तर कौशल और दक्षिण कौशल में विभाजित था। कालिदास के रघुवंश काव्य में उल्लेख है कि राम ने अपने पुत्र लव को शरावती का और कुश को कुशावती का राज्य दिया था। यदि शरावती और श्रावस्ती को एक मान लिया जाये तो निश्चय ही लव का राज्य उत्तर भारत में था और कुश दक्षिण कौशल के शासक बने। सम्भवतः उनकी राजधानी कुशावती आज के बिलासपुर जिले में थी, शायद कोसला ग्राम ही उस काल की कुशावती थी। यदि कोसला को राम की माता कौशल्या की जन्मभूमि मान लिया जावे तो भी किसी प्रकार की विसंगति प्रतीत नहीं होती। रघुवंश के अनुसार कुश को अयोध्या जाने के लिये विन्ध्याचल को पार करना पड़ता था इससे भी सिद्ध होता है कि उनका राज्य दक्षिण कौशल में ही था। उपर्युक्त सभी उद्धरणों से स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ आदिकाल से ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों का पावन तपोस्थल रहा है।
प्रतीत होता है कि छोटा नागपुर से लेकर बस्तर तथा कटक से ले कर सतारा तक के बिखरे हुये राजवंशों को संगठित कर राम ने वानर सेना बनाई हो। आर.पी. व्हान्स एग्न्यू लिखते हैं, "सामान्य रूप से इस विश्वास की परम्परा चली आ रही है कि रतनपुर के राजा इतने प्राचीनतम काल से शासन करते चले आ रहे हैं कि उनका सम्बन्ध हिन्दू 'माइथॉलाजी' (पौराणिक कथाओं) में वर्णित पशु कथाओं (fables) से है। (चारों महान राजवंश) सतारा के नरपति, कटक के गजपति, बस्तर के रथपति और रतनपुर के अश्वपति हैं" (A Reeport on the Suba or Province of Chhattisgarh - written in 1820)। अश्व और हैहय पर्यायवाची हैं। श्री एग्न्यू का मत है कि कालान्तर में 'अश्वपति' ही हैहय वंशी हो गये। इससे स्पष्ट है कि इन चारों राजवंशो का सम्बन्ध अत्यन्त प्राचीन है तथा उनके वंशों का नामकरण चतुरंगिनी सेना के अंगों के आधार पर किया गया है। बस्तर के शासकों का 'रथपति' होने के प्रमाण स्वरूप आज भी दशहरे में रथ निकाला जाता है तथा दन्तेश्वरी माता की पूजा की जाती है। यह राम की उस परम्परा का संरक्षण है जब कि दशहरा के दिन राम ने शक्ति की पूजा कर लंका की ओर प्रस्थान किया था। राजाओं की उपाधियों से यह स्पष्ट होता है राम ने छत्तीसगढ़ प्रदेश के तत्कालीन वन्य राजाओं को संगठित किया और चतुरंगिनी सेना का निर्माण कर उन्हें नरपति, गजपति, रथपति और अश्वपति उपाधियाँ प्रदान की। इस प्रकार रामायण काल से ही छत्तीसगढ़ प्रदेश राम का लीला स्थल तथा दक्षिण भारत में आर्य संस्कृति का केन्द्र बना।
राम वन गमन पथ
अयोध्या से श्रीलंका तक की 14 साल की यात्रा में श्रीराम ने करीब 10 किमी का सफर तय किया। इस बीच लगभग 248 ऐसे प्रमुख स्थल थे जहां उन्होंने या तो विश्राम किया या फिर उनसे उनका कोई रिश्ता जुड़ा। आज यह स्थान धार्मिक रूप में राम की वन यात्रा के रूप में याद किए जाते हैं।[1]
छत्तीसगढ़ का भगवान राम से काफी करीब का नाता है। माता कौशल्या खुद छत्तीसगढ़ की राजकुमारी थी, वहीं भगवान राम ने भी अपने वनवास के दौरान काफी वक्त छत्तीसगढ़ में गुजारा। आज भी छत्तीसगढ़ में पौराणिक, धार्मिक व ऐतिहासिक मान्यताओं के आधार कई ऐसे स्थान मिल जाएंगे, जिन्हें भगवान राम से जोड़कर देखा जाता है। रामवनगमन पथ में इस सभी स्थानों को सरकार जोड़ने का प्रयास कर रही है।[2]
छत्तीसगढ़ी साहित्य
छत्तीसगढ़ी पूर्वी हिंदी की तीन विभाषाओं में से एक है। यह रायगढ़, सरगुजा, बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, जगदलपुर तथा बस्तर आदि में बोली जाती है। संभलपुर में तथा उसके आसपास छत्तीसगढ़ी लरिया कहलाती है। छत्तीसगढ़ी भाषा मराठी तथा उड़िया भाषाओं से प्रभावित हुई है।
छत्तीसगढ़ी साहित्य में भारतीय संस्कृति के तत्त्व वर्तमान हैं। इस साहित्य में अनेक लोककथाएँ हैं जिनके मूल भाव भारत की अन्य भाषाओं में भी सामान्य रूप से पाए जाते हैं। कहीं कहीं स्थानीय तथा सामयिक ढंग से इन कथाओं की रोचकता बढ़ गई है। छत्तीसगढ़ी पँवाड़ों के प्रबन्धगीत किसी न किसी कहानी पर आधारित हैं। पँवाड़ों के केंद्रविन्दु बहुधा ऐतिहासिक है। वीरगाथाओं में राजा वीरसिंह की गाथा प्रसिद्ध है। इसमें मध्यकालीन विश्वासों की प्रचुरता है। कुछ गीतों में देवता के पराक्रम का वर्णन है। श्रवणकुमार संबंधी "सरवन" के गीत तथा "सरवन" की गाथा प्रसिद्ध है। छत्तीसगढ़ी में ऋतुगीत, नृत्यगीत, संस्कारगीत, धार्मिक गीत, बालकगीत तथा अन्य प्रकार के विविध गीत पाए जाते हैं। लोकोक्तियों तथा पहेलियों की भी कमी नहीं है।
कबीर दास के शिष्य और उनके समकालीन (संवत 1520) धनी धर्मदास को छत्तीसगढ़ी के आदि कवि का दर्जा प्राप्त है, जिनके पदों का संकलन व प्रकाशन हरि ठाकुर जी ने किया है। बाबू रेवाराम के भजनों ने छत्तीसगढ़ी की इस शुरुआत को बल दिया।
पद्य साहित्य
छत्तीसगढ़ी के उत्कर्ष को नया आयाम दिया – पं. सुन्दरलाल शर्मा, लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, नरसिंह दास वैष्णव, बंशीधर पांडेय, शुकलाल पांडेय ने। कुंजबिहारी चौबे, गिरिवरदास वैष्णव ने राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में अपनी कवितीओं की अग्नि को साबित कर दिखाया। इस क्रम में पुरुषोत्तम दास एवं कपिलनाथ मिश्र का उल्लेख भी आवश्यक होगा। 70 के दशक में पं॰ द्वारिका प्रसाद तिवारी, बाबू प्यारेलाल गुप्त, कोदूराम दलित, हरि ठाकुर, श्यामलाल चतुर्वेदी, कपिलनाथ कश्यप, बद्रीविशाल परमानंद, नरेन्द्र देव वर्मा, हेमनाथ यदु, भगवती सेन, नारायणलाल परमार, डॉ॰ विमल कुमार पाठक, लाला जगदलपुरी, केयूर भूषण, डॉ. सुरेश तिवारी, बृजलाल शुक्ल आदि ने छत्तीसगढ़ी साहित्य की विषय विविधता को सिद्ध कर दिखाया। छत्तसीगढ़ी भाषा और रचनाओं को लोकप्रिय बनाने में दानेश्वर शर्मा, पवन दीवान, लक्ष्मण मस्तुरिहा, रामेश्वर वैष्णव और विमल पाठक ने न केवल कवि सम्मेलनों के मंचों में अपना लोहा मनवाया अपितु उन्होंने सार्थक एवं अकादमिक लेखन भी किया है, जो इस प्रदेश के जन-जन के मन में रमे हैं। इधर डॉ॰ सुरेन्द्र दुबे ने देश-विदेश के मंचों में कविता पढ़कर छत्तीसगढ़ी का मान बढ़ाया है। छत्तीसगढ़ी के विकास में विद्याभूषण मिश्र, मुकुन्द कौशल, हेमनाथ वर्मा विकल, मन्नीलाल कटकवार, बिसंभर यादव, माखनलाल तंबोली, रघुवर अग्रवाल पथिक, डॉ. सुरेश तिवारी, ललित मोहन श्रीवास्तव, डॉ॰ पालेश्वर शर्मा, श्री राम कुमार वर्मा बाबूलाल सीरिया, नंदकिशोर तिवारी, मुरली चंद्राकर, प्रभंजन शास्त्री, रामकैलाश तिवारी, एमन दास मानिकपुरी का विशेष योगदान रहा है। डॉ॰ हीरालाल शुक्ल, डॉ॰ बलदेव, डॉ॰ मन्नूलाल यदु, डॉ॰ बिहारीलाल साहू, डॉ॰ चितरंजन कर, डॉ॰ सुधीर शर्मा, डॉ॰ व्यासनारायण दुबे, डॉ॰ केशरीलाल वर्मा, डॉ॰ निरुपमा शर्मा,उर्मिला शुक्ल इनका छत्तीसगढ़ कविता के क्षेत्र में एक अलग स्थान है। मृणालिका ओझा, डॉ॰ विनय पाठक ने भाषा एवं शोध के क्षेत्र में जो कार्य किया है वह मील का पत्थर है।
गद्य साहित्य
छत्तीसगढ़ी का गद्य साहित्य भी निरन्तर पुष्ट हो रहा है। इसके प्रमाण में हम हीरू के कहिनी, (पं. वंशीधर शर्मा), दियना के अंजोर (शिवशंकर शुक्ला), चंदा अमरित बगराईस (लखनलाल गुप्त), कुल के मरजाद (केयूर भूषण), छेरछेरा (कृष्णकुमार शर्मा), प्रस्थान (परदेशीराम वर्मा), को प्रस्तुत कर सकते हैं जो उपन्यास कृतियाँ हैं। खूबचंद बघेल, टिकेन्द्र टिकरिहा, रामगोपाल कश्यप, नरेन्द्रदेव वर्मा, विश्वेन्द्र ठाकुर सुकलाल पांडेय, कपिलनाथ कश्यप, नन्दकिशोर तिवारी के नाटक, शायमलाल चतुर्वेदी, नारायणलाल परमार, डॉ॰ पालेश्वर शर्मा,श्री राम कुमार वर्मा , परदेशीराम वर्मा, डॉ. सुरेश तिवारी, उर्मिला शुक्ल छत्तीसगढ़ की महिला कहानीकारों में बहु चर्चित नाम डॉ॰ बिहारी लाल साहू की कहानियों, जी.एस. रामपल्लीवार, परमानंद वर्मा, जयप्रकाश मानस, सुशील यदु एवं राजेन्द्र सोनी के गद्य व्यंग्यों को भी इसी शृंखला में रखा जा सकता है। जयप्रकाश मानस द्वारा लिखित कलादास के कलाकारी को प्रसिद्ध विद्वान स्व. हरि ठाकुर ने छत्तीसगढी भाषा का प्रथम व्यंग्य संग्रह माना है। स्व. रवीन्द्र कंचन की छत्तीसगढ़ी रचनाएं देश की विभिन्न पत्रिकाओं में साग्रह छापी जाती रही हैं। यह छत्तीसगढ़ी की संप्रेषणीयता एवं प्रभाव का ही प्रतीक है। कुबेर सिंह साहू, (भोलापुर के कहानी, कहा नहीं, छत्तीसगढ़ी कथा कंथली, सुरति अऊ सूरत, ढाई आखर प्रेम के, चेखव के दुनिया) समर्थ गंवइहा, रामलाल निषाद, जीवन यदु, गौरव रेणु नाविक, डॉ॰ पी.सी. लाल यादव, नारायण बरेठ, राम प्रसाद कोसरिया, हफीज कुरैशी, ठाकुर जीवन सिंह, शिवकुमार यदु, एमन दास मानिकपुरी, चेतन भारती, पंचराम सोनी, शत्रुहनसिंह राजपूत, मिथलेश चौहान, रमेश विश्वहार, परमेश्वर वैष्णव, डॉ. सुरेश तिवारी, देवधर महंत, डॉ॰ सीताराम साहू, डुमनलाल ध्रुव, पुनुराम साहू, भरतलाल नायक, राजेश तिवारी, रुपेश तिवारी, तीरथराम गढ़ेवाल, राजेश चौहान आदि छत्तीसगढ़ी के समर्थ रचनाकार हैं। यहाँ प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी के छत्तीसगढ़ी का प्रथम हाइकु संग्रह ("मइनसे के पीरा"-2000) तथा डॉ॰ राजेन्द्र सोनी के बहुआयामी लेखन का जिक्र करना उचित होगा, जिन्हें छत्तीसगढ़ी में प्रथम लघुकथा संग्रह (खोरबहरा तोला गांधी बनाबो), प्रथम क्षणिका संग्रह (दूब्बर ला दू असाढ़), हाइकू संग्रह (चोर ले जादा मोटरा उतिअइल 2001) रचने का गौरव प्राप्त है।इस अवधि के उपरांत गद्य लेखन में विविधता दिखने लगी और लेखकों ने सभी विधाओं में प्रचुर मात्रा में सृजनात्मक लेखन लिखा।इस अनुक्रम में रामनाथ साहू के उपन्यास -कका के घर,भुइँया, माटी के बरतन और जानकी प्रकाशित हुए।प्रथम तीन उपन्यास तो छत्तीसगढ़ी के मुखपत्र' छत्तीसगढ़ी लोकक्षर'में किश्तों में लगातार छपते रहे थे । रामनाथ साहू के दो नाटक-जागे जागे सुतिहा गो! और हरदी पींयर झांगा पागा भी प्रकाशित हैं। कहानी संग्रह -गति मुक्ति भी चर्चित रही है।
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