रविदास भारत के मध्यकाल के एक संत कवि थे। 'रविदसिया पंथ' गुरु रविदास की शिक्षाओं पर आधारित पन्थ है। इन्होंने जात-पात का घोर खंडन किया और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। वे जूता बनाने का कार्य करते थे। गुरु ग्रन्थ साहिब मे इनके 41 पद हैं जो इनके ही 16 रागों मे संकलित हैं।
रविदास भारत के मध्यकाल के एक संत कवि थे। 'रविदसिया पंथ' गुरु रविदास की शिक्षाओं पर आधारित पन्थ है। इन्होंने जात-पात का घोर खंडन किया और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। वे जूता बनाने का कार्य करते थे। गुरु ग्रन्थ साहिब मे इनके 41 पद हैं जो इनके ही 16 रागों मे संकलित हैं।
जीवन
रविदास (रैदास) का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत 1337 को हुआ था उनका एक दोहा प्रचलित है। "चौदह सौ तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास जी" । उनके पिता संतोख दास तथा माता का नाम कलसांं देवी था। उनकी पत्नी का नाम लोना देवी बताया जाता है।[3] रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से नहीं बल्कि उन्हें गुरु रामदास दीक्षा दी थी, और गुरु मार्ग पर चल कर ज्ञान प्राप्त किया था। रविदास चमार जाति में जन्में और जूते बनाने का काम किया करते थे औऱ ये उनका व्यवसाय था और अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। कई लोगों का मानना है कि संत रविदास जी का कोई गुरु नहीं था ( उनके गुरु का नाम है रामानंद, इस बात के बहुत सारे प्रमाण भी दिए जा चुके हैंगुरु रविदास जी के आध्यात्मिक गुरु स्वामी रामानंद माने जाते हैं। मध्यकालीन ग्रंथों जैसे 'भक्तमाल' और 'रत्नावली' के अनुसार, रविदास जी ने उन्हीं से दीक्षा ली थी)।
कहा जाता है कि यह सनातनी हिंदू थे और कहा था "वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान, फिर क्यों छोड़ूँ इसे पढ लूँ झूठ कुरान" इन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों और अज्ञानता के लिए आम जनमानस को धार्मिक अंधविश्वास और आडंबर से दूर रहने का संदेश दिया और कहा कि अगर मन सच्ची श्राद्ध है । ”मन चंगा तो कठौती में गंगा” इनकी प्रसिद्ध उक्ति है जो इस बात पर प्रकाश डालती है।
इस्लाम धर्म में फैली बुराइयों को भी इन्होंने समान रूप से अपनी अभिव्यक्ति में शामिल किया था । समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके सच को बेबाकी से और नर्मदिली से बोलने के व्यवहार से काशी में स्थित बड़े बड़े विद्वान भी उनके सामने नत मस्तक होते हैं।
उन्होंने देश में फैली जातिबाद (छुआ छूत) की बीमारी को खत्म करने को लेकर बहुत प्रयास किया और सामाजिक भाइचारे की एक बहुत मजबूत नींव रखी।
स्वभाव
उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है। एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु । गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि - मन चंगा तो कठौती में गंगा।[4]
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया।
वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।
- कृस्न, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
- वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा ॥
- चारो वेद के करे खंडौती । जन रैदास करे दंडौती।।
उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। अपने एक भजन में उन्होंने कहा है-
- कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
- तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै॥
उनके विचारों का आशय यही है कि ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वतः उनके अनुयायी बन जाते थे।
उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये। कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं।
- वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
- सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की ॥
आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग इन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।
रैदास के ४० पद गुरु ग्रन्थ साहब में मिलते हैं जिसका सम्पादन गुरु अर्जुन देव ने १६ वीं सदी में किया था ।
इन्हें भी देखें
बाहरी कड़ियाँ