छत्रपती संभाजीराजे जाधव शिवाजीराजे भोंसले (14 मई 1657 – 11 मार्च 1689) मराठा साम्राज्य के द्वितीय छत्रपति राजा, लेखक, विचारक और छत्रपती शिवाजी के उत्तराधिकारी थे। उन्होंने अपने अपने जीवनकाल में 121 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की। दक्षिण भारत में मुगलों के आक्रमणों को रोकने में संभाजी की प्रमुख भूमिक के लिये प्रसिद्ध थे। [2]
छत्रपती संभाजीराजे जाधव शिवाजीराजे भोंसले (14 मई 1657 – 11 मार्च 1689) मराठा साम्राज्य के द्वितीय छत्रपति राजा, लेखक, विचारक और छत्रपती शिवाजी के उत्तराधिकारी थे। उन्होंने अपने अपने जीवनकाल में 121 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की। दक्षिण भारत में मुगलों के आक्रमणों को रोकने में संभाजी की प्रमुख भूमिक के लिये प्रसिद्ध थे।[2]
जन्म एवं बचपन
संभाजी महाराज का जन्म १४ मई १६५७ को पुरंदर के किले में। वे महान शिवाजी और उनकी पहली पत्नी सईबाई के पुत्र थे। जब वे ढाई साल के थे, तब उनकी मां का निधन हो गया। मां की मृत्यु के बाद शंभुराजे का पालन पोषण उनकी दादी जीजाबाई ने किया। संभाजी राजे न केवल अपनी दादी के करीब थे, बल्कि वे अपने दादा शाहजी महाराज के भी करीब थे।
जीजाबाई ने अपने पुत्र शिवाजी की तरह ही पोते संभाजी में भी राष्ट्रप्रेम, धर्मप्रेम, हिन्दवी स्वराज, देव-देश-धर्म ओर आदर्श जीवन मूल्यों को स्थापित किया। इसके अलावा उन्होंने गणित,तर्क,भूगोल, इतिहास, पुराण, रामायण, व्याकरण आदि का ज्ञान काशीराम शास्त्री से अर्जित किया, पिता शिवाजी ने उन्हें शारीरिक प्रशिक्षण दिया।[उद्धरण चाहिए]
उन्होंने अपने उम्र के केवल 14 साल में उन्होंने बधभूषण, नखशिख, नायिकाभेद तथा सातशातक यह तीन संस्कृत ग्रन्थ लिखे थे, जो उनकी प्रखर विद्वत्ता का परिचय है।
शिवाजी महाराज के सबसे बड़े पुत्र होने के नाते, संभाजी अपने पिता द्वारा हिन्दवी स्वराज के निर्माण के लिए किए गए प्रयासों को देखते हुए बड़े हुए। मराठा साम्राज्य के राजकुमार के रूप में, संभाजी ने एक से अधिक अवसरों पर अपनी बहादुरी और सैन्य प्रतिभा साबित की। उन्होंने 16 साल की उम्र में रामनगर में अपना पहला युद्ध लड़ा और जीता और 1675-76 के दौरान उन्होंने गोवा और कर्नाटक में सफल अभियानों का नेतृत्व किया।
राज्याभिषेक
जीवूबाई, जिन्हें येसुबाई के नाम से भी जाना जाता है, संभाजी की पत्नी थीं। इस वैवाहिक गठबंधन के बाद, शिवाजी को कोंकण क्षेत्र पर नियंत्रण मिल गया। शाहू प्रथम]], संभाजी राजे ओर येसुबाई के सबसे बड़े बेटे थे।
अप्रैल 1680 में शिवाजी महाराज की मृत्यु हो गई, संभाजी की सौतेली माँ सोयराबाई ने उनके सौतेले भाई राजाराम से मराठा साम्राज्य का अगला राजा बनने के लिए कहा। यह खबर सुनकर संभाजी ने पन्हाला किला और रायगढ़ किला जीत लिया। 20 जुलाई 1680 को उनका हिंदू वैदिक परंपराओं के अनुसार राज्याभिषेक किया गया और वे मराठा साम्राज्य के द्वितीय छत्रपति बन गए। राजा बनने के साथ उन्होंने "शककर्ता" ओर "हिंदवी धर्मोधारक" उपाधि धारण की। बाद में उन्होंने राजाराम, राजाराम की पत्नी जानकी बाई और सौतेली माँ सोयराबाई को नजरकैद मे रखा था। उन्होंने सोयराबाई, शिर्के परिवार के उनके समर्थकों और शिवाजी के मंत्रियों को भी उनकी हत्या की साजिश रचने के लिए मार डाला।
उन्होंने नई राजमुद्रा बनवाई जिसमें लिखा था।
श्री शम्भो: शिवजात मुद्रास्य द्यौरिव राजते।
यदंकसेविनी लेखा वर्तते कस्य नोपरि।।
अर्थ: भगवान शिव के भक्त और शिवाजी के पुत्र शंभाजी का राज्य आकाश तक फैला है और सभी प्रजाजनो के लिए हितकारी है।
युद्ध अभियान
शिवाजी महाराज की मृत्यु के तीन महीनों बाद शंभाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ , छत्रपति बनते ही उन्होंने कई प्रजा कल्याण के कार्य किए, सार्वजनिक मार्गों एवं जल निकास व्यवस्था का जीर्णोद्धार कराया, किसानों के ऊपर के कर को घटाया, प्रजा को निःशुल्क उपचार और ओषधि उपलब्ध करवाए।[उद्धरण चाहिए]
छत्रपति शम्भुराज ने अपनी प्रजा की दुर्दशा को सबसे पहले रखा। उन्होंने राज्य में गरीबी और खाद्यान्न की कमी की भरपाई के लिए १६८० में औरंगजेब के खानदेश सुभा की राजधानी बुरहानपुर पर हमला किया। इस हमले में मराठों को विशाल मुगल खजाना हाथ लगा।[उद्धरण चाहिए]
खानदेश पर आक्रमण
संभाजी महाराज के इतिहास में बुरहानपुर का आक्रमण बहुत प्रसिद्ध था क्योंकि छत्रपति बनने के बाद यह संभाजी महाराज का पहला युद्ध था। इस युद्ध में २०,००० मराठा सेना ने मुगल सेना को हरा दिया और खानदेश में औरंगजेब की राजधानी को लूट लिया।
मैसूर आक्रमण
खानदेश और बुरहानपुर में मुगलों को हराने के बाद संभाजी महाराज ने मैसूर पर आक्रमण किया। संभाजी राजा ने ई. स. १६८१ में वोडियार राजवंश के खिलाफ दक्षिणी मैसूर अभियान शुरू किया। उस समय वोडियार राजवंश के राजा थे “वोडियार चिक्कादेवराय”।
चिक्कदेवराय बहुत चिड़चिड़े राजा थे। उन्होंने संभाजी महाराज के सामने आत्मसमर्पण करने के बजाय मराठा सेना पर हमला कर दिया। परिणामस्वरूप, संभाजी महाराज ने अपनी विशाल सेना के साथ जमकर युद्ध किया और युद्ध जीत कर चिक्कदेवराय को मृत्युदंड दिया।
पुर्तगालियों पर आक्रमण
पुर्तगाली मुगलों को व्यापार में मदद करते थे और मुगलों को अपने क्षेत्र से गुजरने देते थे। संभाजी महाराज का मुख्य उद्देश्य मुगलों और पुर्तगालियों के बीच गठबंधन को तोड़ना था। इसी लिए संभाजी ने आक्रमण कर युद्ध में पुर्तगालियों को हराया, उनके किलो को ध्वस्त किया, पुर्तगाली खजाने ओर हथियारों पर कब्जा किया ओर पुर्तगाली जनरल ऑफिसरों को मृत्युदंड दिया।
इसके अलावा भी छत्रपति संभाजी महाराज ने अपने अल्प जीवनकाल में कुल १२० युद्ध लड़े और अजेय रहते हुए उन सभी युद्धों में जीत हासिल की। इतिहास में सिकन्दर जैसे बहुत कम राजा हुए जिनको हराना असंभव था ! संभाजी महाराज उन्हीं चुनिंदा राजाओं में से एक है।
गनोजी द्वारा विश्वासघात
संभाजी महाराज ने मुगलों को भारत से पूरी तरह से उखाड़ फेंकने की योजना बनाई। इसकी योजना और आगे की कार्यवाही के लिए संगमेश्वर में एक गुप्त बैठक बुलाई गई। गनोजी शिर्के संभाजी महाराज के बहनोई थे, संभाजी महाराज ने उन्हें वतनदारी और जहागिरी देने से साफ इनकार कर दिया। अत: गनोजी शिर्के ने मुगलों से हाथ मिला लिया।गणोजी ने संभाजी के साथ विश्वासघात करते हुए मुगल सरदार मुकर्रबखान को सूचित किया कि संभाजी महाराज संगमेश्वर में हैं। संभाजी राजे ने अपने अभियानों में जिन गुप्त मार्गों का उपयोग किया, वे केवल मराठों को ही ज्ञात थे। गणोजी शिर्के ने मुकर्रबखां को संगमेश्वर के गुप्त मार्ग के बारे में बताया। संभाजी महाराज ने कुछ सरदारों और विश्वस्त मंत्रियों को संगमेश्वर बुलाया था। एक गुप्त बैठक के बाद गाँव वालों के आग्रह पर वे उनकी बात का सम्मान करते हुए कुछ समय तक प्रतीक्षा करने को तैयार हो गये। उन्होंने सेना को अपने साथ रायगढ़ भेजा और अपने साथ केवल २०० सैनिक, अपने मित्र और सलाहकार कवि कलश और २५ विश्वसनीय सलाहकार रखे।
जैसे ही संभाजी महाराज गांव से बाहर निकल रहे थे, १०,००० मुगल सैनिकों ने उन्हें और उनके साथियों को घेर लिया। सभी साथियों और प्रमुखों ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी।
झड़प गांव में एक भयानक रक्तपात हुआ जहां संभाजी राजा की सेना ने अपनी पूरी ताकत से मुगलों की विशाल सेना का सामना किया, लेकिन अंत में १ फरवरी, १६८९ को मुगलों ने संभाजी ओर उनके मित्र कवि क्लश को धोखे से पकड़ कर बंदी बना लिया गया।
यातनाएं तथा देहत्याग
सबसे पहले जुल्फिकार खान सेना के साथ छत्रपति संभाजी भोसले और कवि कलश को कराड-बारामती के रास्ते बहादुरगढ़ ले गये. फिर अंतिम अंतिम दिनों में उन्हें भीमा, भामा और इंद्रायणी के त्रिवेणी संगम पर स्थित गांव तुलापुर ले जाया गया।वहां औरंगजेब ने उन दोनों के साथ बहुत अमानवीय व्यवहार किया।
औरंगज़ेब द्वारा बंदी बनाए जाने के बाद उन पर भीषण मानसिक व शारीरिक अत्याचार किए गए। इसके बावजूद उन्होंने न तो अपना धर्म बदला और न ही स्वाभिमान से समझौता किया। उनके इस बलिदान ने उन्हें मराठा इतिहास में 'धर्मवीर' का स्थान दिलाया।
संबंधित पृष्ठ
- मराठा साम्राज्य
- हिंदवी स्वराज्य
- छावां
- येसुबाई