धर्मेन्द्र सिंह देओल (8 दिसम्बर 1935 – 24 नवम्बर 2025) [1] भारतीय अभिनेता, निर्माता और राजनेता थे जिन्हें धर्मेन्द्र के नाम से जाना जाता है। [2] [3] उन्हें हिंदी फिल्मों में अपने अभिनय के लिए जाना जाता था। उन्होंने 65 वर्षों के करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया। [4] [5] [6] [7] सन् 1997 में उन्हें हिंदी सिनेमा में उनके योगदान के लिए फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।भारत की 15 वीं लोकसभा के सदस्य थे इसके लिए वो भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राजस्थान की बीकानेर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। सन् 2012 में उन्हें भारत सरकार द्वारा भारत के तीसरे सर्…
धर्मेन्द्र सिंह देओल (8 दिसम्बर 1935 – 24 नवम्बर 2025)[1] भारतीय अभिनेता, निर्माता और राजनेता थे जिन्हें धर्मेन्द्र के नाम से जाना जाता है।[2][3] उन्हें हिंदी फिल्मों में अपने अभिनय के लिए जाना जाता था। उन्होंने 65 वर्षों के करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया।[4][5][6][7] सन् 1997 में उन्हें हिंदी सिनेमा में उनके योगदान के लिए फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।भारत की 15 वीं लोकसभा के सदस्य थे इसके लिए वो भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राजस्थान की बीकानेर लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। सन् 2012 में उन्हें भारत सरकार द्वारा भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।[8] 2026 में मरणोपरांत पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
व्यक्तिगत जीवन
धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसम्बर 1935 को ब्रितानी भारत के पंजाब प्रांत नसराली गाँव में एक जाट सिख परिवार में किशन सिंह देओल और सतवंत कौर के घर हुआ था।[9][10][11][12][13] उनका पुश्तैनी गांव डांगो, पखोवाल तहसील रायकोट, लुधियाना के पास है।[14][12]
उन्होंने अपना प्रारंभिक जीवन सानेहवाल गाँव में बिताया और लुधियाना के गांव ललतों कलां में सरकारी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में अध्ययन किया, जहाँ उनके पिता गाँव के स्कूल के प्रधानाध्यापक थे।[15] उन्होंने सन् 1952 में फगवाड़ा में मैट्रिक की पढ़ाई की।[16] ये उनकी बुआ का शहर है। जिनका बेटा वीरेंदर पंजाबी फ़िल्मों का सुपर स्टार तथा प्रोड्यूसर डायरेक्टर था। आतंक के दौर में लुधिआना में ही फ़िल्म जट ते ज़मीन की शूटिंग के दौरान आतंकियों ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी थी। उस समय पंजाब के स्कूल पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के अंतर्गत आते थे।
स्वास्थ्य समस्या और निधन
सन् 2010 में धर्मेंद्र ने स्वास्थ्य कारणों से शराब का सेवन बंद कर दिया। इससे पहले उन्हें उनके शराबीपन के लिए जाना जाता था। सन् 2015 से 2020 तक उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याओं का सामना करना पड़ा। सन् 2025 में उनकी बायीं आँख के कॉर्निया में क्षति हुई थी। 31 अक्टूबर 2025 को सांस लेने में समस्या के कारण उन्हें मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती किया गया। कुछ समय के लिए पर्यवेक्षण में रखने के पश्चात् उन्हें अस्पताल से छुटी दे दी गयी।
10 नवंबर 2025 को धर्मेंद्र को पुनः सांस लेने में दिक्कत हो रही थी, इसलिए उन्हें पुनः मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती किया गया। हेमा मालिनी ने सोशल मीडिया पर बताया कि डॉक्टर उनकी लगातार देखभाल कर रहे हैं। उनकी हालत ज़्यादा बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर पर भी रखना पड़ा। देश भर से कलाकारों, नेताओं और प्रशंसकों ने उनके जल्द ठीक होने की कामना की।[17]
अगली सुबह 11 नवंबर 2025 को सोशल मीडिया और कुछ समाचार चैनलों पर अचानक यह झूठी खबर फैलने लगी कि धर्मेंद्र का निधन हो गया है। कई जगह बिना पुष्टि किए इस गलत बात को प्रसारित किया गया। यह अफवाह तब और फैल गई जब कुछ बड़े नेताओं और कलाकारों ने भी गलती से श्रद्धांजलि पोस्ट कर दी।
बाद में हेमा मालिनी और ईशा देओल ने सोशल मीडिया पर साफ़ कहा कि— धर्मेंद्र जिंदा हैं, उनकी हालत स्थिर है, मौत की खबरें पूरी तरह झूठी और गैर-ज़िम्मेदाराना हैं। उन्होंने ऐसी अफवाहें फैलाने वालों की निंदा भी की।[18][17][19]
24 नवम्बर 2025 को धर्मेंद्र का निधन हो गया।[20][21] उन्होंने अपने मुंबई स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। उनकी उम्र 89 वर्ष थी। अंतिम संस्कार विले-पार्ले (पवन हंस श्मशान घाट) में हुआ और फिल्म जगत के कई लोग उनके परिवार के साथ अंतिम संस्कार में मौजूद रहे। उनके निधन पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई दिग्गज हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और कहा कि यह “एक युग का अंत” है।[22]
अभिनय कैरियर
1960–1969: प्रारंभिक करियर और प्रसिद्धि की ओर बढ़ना
धर्मेंद्र जब फिल्मों में काम ढूँढने मुंबई आए तो उनके पास कोई तय रास्ता नहीं था। उन्होंने एक ड्रिलिंग कंपनी में नौकरी भी की, लेकिन फिल्मों में काम नहीं मिला, इसलिए वे वापस पंजाब लौट गए। कुछ समय बाद उन्होंने फिल्मफेयर पत्रिका में नये कलाकारों की खोज का विज्ञापन देखा। इसे देखकर वे फिर से मुंबई आये और प्रतियोगिता में दूसरा स्थान हासिल किया। (पहला स्थान पाने वाले सुरेश पुरी बाद में फिल्मों से गायब हो गए।)
हालाँकि उन्हें यह शुरुआती पहचान मिली, फिर भी उन्हें काम पाने में बहुत दिक्कतें हुईं। कहा जाता है कि वे दोबारा मुंबई छोड़ने वाले थे, लेकिन उनके दोस्त और महत्वाकांक्षी अभिनेता मनोज कुमार ने उन्हें रुकने के लिए समझाया।[23]
आखिरकार 1960 में धर्मेंद्र ने अर्जुन हिंगोरानी की फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे से अपने फिल्म करियर की शुरुआत की,[24][25] लेकिन यह फिल्म खास नहीं चली।[26] उनकी पहली बड़ी सफल फ़िल्म सन् 1961 में आई रमेश सैगल की शोला और शबनम थी। इसके बाद उन्होंने अनपढ़ (1962) और बंदिनी (1963) जैसी सफल फिल्में दीं। बंदिनी को उस साल राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।[27][28][29]
सन् 1964 में धर्मेंद्र को बड़ी सफलता मिली। उन्होंने मोहन कुमार की फिल्म आई मिलन की बेला में राजेन्द्र कुमार और सायरा बानो के साथ काम किया।[30] यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई। फिल्म में धर्मेंद्र ने खलनायक का अभिनय किया था, लेकिन फिर भी दर्शकों ने उन्हें बहुत पसंद किया और उन्हें फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिए नामांकन मिला।[31][32]
उसी साल धर्मेंद्र ने चेतन आनन्द की युद्ध पर आधारित फिल्म हकीकत में मुख्य भूमिका निभाई।[33] यह फिल्म 1962 के भारत–चीन युद्ध पर बनी थी। फिल्म को बहुत तारीफ मिली और यह व्यावसायिक रूप से बहुत सफल रही। मोहम्मद रफ़ी का गाना कर चले हम फ़िदा लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ।[34][35] सन् 1965 में, उन्हें राम माहेश्वरी की रोमांटिक ड्रामा काजल में एक और बड़ी सफलता मिली।[36] इस फिल्म में मीना कुमारी, राज कुमार और पद्मिनी भी महत्वपूर्ण अभिनय भूमिकाओं में थे।[37]
सन् 1966 में धर्मेंद्र ने ओ॰ पी॰ रल्हन की फिल्म फूल और पत्थर में मीना कुमारी के साथ फिर काम किया। यह फिल्म उस साल की सबसे सफ़ल फ़िल्म बनी और धर्मेंद्र को एक टॉप स्टार के रूप में स्थापित कर दिया।[38][39] इस फिल्म के लिए उन्हें पहली बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का नामांकन भी मिला।[40][41] फूल और पत्थर की सफलता के बाद उसी साल उनकी कई सफल फिल्में जारी हुईं—जिनमें ममता, देवर, अनुपमा[42] और आये दिन बहार के शामिल हैं।[43] अनुपमा में उनके अभिनय के लिए उन्हें 14वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सम्मानित भी किया गया।
अगले साल धर्मेंद्र ने ऐसी फिल्मों में काम किया जो बॉक्स ऑफिस पर तो नहीं चलीं, लेकिन समालोचकों ने उन्हें पसंद किया। इनमें दुल्हन एक रात की (नूतन के साथ) और मझली दीदी तथा चंदन का पालना शामिल थीं जिनमें उनके साथ अभिनेत्री मीना कुमारी थीं।[44][45] सन् 1968 में धर्मेंद्र आत्मा राम की थ्रिलर फ़िल्म शिकार और रामानन्द सागर की जासूसी फिल्म आंखें के साथ फिर बड़ी लीग में पहुँच गए।[46][47] दोनों फिल्में सुपरहिट रहीं और आंखें उस साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी।[26] सन् 1968 में धर्मेंद्र की और भी सफल फिल्में रिलीज़ हुईं — इनमें टी॰ प्रकाश राव की ड्रामा फिल्म इज्जत और अमर कुमार की रोमांटिक ड्रामा मेरे हमदम मेरे दोस्त शामिल हैं। इज्जत फ़िल्म में उन्होंने दो सौतेले भाइयों का अभिनय किया है।[48]
सन् 1969 में राजेश खन्ना सुपरस्टार बनकर उभरे और उनकी फिल्मों आराधना और दो रास्ते ने धूम मचा दी।[49] इस दौर में कई अभिनेता नेपथ्य में चले गये[50] लेकिन धर्मेंद्र और देव आनन्द की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ा।[50] सन् 1969 में धर्मेंद्र की फिल्म आया सावन झूम के सुपरहिट रही और इसके बाद यकीन, प्यार ही प्यार और आदमी और इंसान जैसी सफल फिल्में भी आईं।[51] इस समय की उनकी सबसे सराही गई फिल्म थी ऋषिकेश मुखर्जी की सामाजिक ड्रामा सत्यकाम है। इस फिल्म में धर्मेंद्र ने एक ईमानदार और सिद्धांतों वाले व्यक्ति का किरदार निभाया, जिसे समालोचकों और दर्शकों दोनों ने उनके करियर का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन माना। यह फिल्म हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीती।[52][53]
1970 से 1977 : सुपरस्टार के रूप में
1970 में धर्मेंद्र ने लगातार कई सफल फिल्में दीं और हेमा मालिनी के साथ उनकी जोड़ी खूब पसंद की गई।[24] उनकी पहली फिल्म सत्येन बोस की अपराध ड्रामा जीवन मृत्यु थी, जो बहुत बड़ी हिट साबित हुई और साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही।[54] इसके बाद उनकी दो और फिल्में—तुम हसीन मैं जवान और शराफत—भी सुपरहिट रहीं। इसके बाद इश्क पर ज़ोर नहीं फ्लॉप हो गई, लेकिन कब? क्यूं? और कहां? फिल्म हिट रही।[43] हालांकि यह फिल्म रिलीज़ के समय नहीं चली, लेकिन बाद में इसे पंथ फिल्म का दर्जा मिला और कई आलोचकों ने इसे बेहतरीन भारतीय फिल्मों में गिना।[55][56]
1971 में धर्मेंद्र ने राज खोसला की एक्शन ड्रामा मेरा गाँव मेरा देश में काम किया,[57] जो बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी और इससे धर्मेंद्र की एक्शन हीरो की छवि बन गई।[58] इस फिल्म ने दर्शकों और उद्योग दोनों को रोमांटिक फिल्मों से हटकर एक्शन फिल्मों की ओर मोड़ा।[26] इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर का दूसरा नॉमिनेशन मिला।[59]
1972 में उनकी लगातार कई फिल्में — सीता और गीता, राजा जानी और समाधि — बड़ी हिट रहीं।[60] 1971–72 की इन धमाकेदार सफलताओं ने धर्मेंद्र को अपने समय का नंबर वन स्टार और "सुपरस्टार" बना दिया।[61][39][62][63]
1973 धर्मेंद्र के करियर का सबसे अच्छा साल माना जाता है, क्योंकि इस साल उनकी कई फिल्में सफल रहीं।[26] उनकी पहली फिल्म लोफर थी, जो एक्शन–क्राइम फिल्म थी। यह सुपरहिट हुई, खासकर इसके गाने—"आज मौसम बड़ा बेईमान", "मैं तेरे इश्क में", "कोई शहरी बाबू"—बहुत पॉपुलर हुए और इसका संगीत 70 के दशक के सबसे ज़्यादा बिकने वाले एल्बमों में शामिल हो गया।[64][65] इसके बाद उनकी दो फिल्में आईं—झील के उस पार (मिस्ट्री थ्रिलर) और जुगनू (एक्शन ड्रामा)। झील के उस पार हिट रही, जबकि जुगनू भारत और सोवियत संघ—दोनों जगह—ब्लॉकबस्टर साबित हुई और 1973 की दूसरी सबसे बड़ी हिट बनी।[66][67]
इसके बाद दो और फिल्में रिलीज़ हुईं—कीमत (जासूसी थ्रिलर) और ज्वार भाटा (हल्की-फुल्की ड्रामा)।[68][69] दोनों को आलोचकों ने पसंद किया और ये ठीक-ठाक सफल रहीं।[26]साल के अंत में धर्मेंद्र तीन फिल्मों में नज़र आए—यादों की बारात, ब्लैकमेल[70] और कहानी किस्मत की। नासिर हुसैन द्वारा निर्देशित और सलीम-जावेद द्वारा लिखित यादों की बारात को भारत की पहली मसाला फिल्म माना जाता है और यह बड़ी ब्लॉकबस्टर थी।[70] इसका संगीत भी 70 के दशक की दूसरी सबसे अधिक बिकने वाली एल्बमों में शामिल हुआ।[71][26][72] ब्लैकमेल में धर्मेंद्र और राखी पर फिल्माया गया मशहूर गाना "पल पल दिल के पास" आज भी लोकप्रिय है।[73] कहानी किस्मत की भी बहुत सफल रही और उनकी सफलता का सिलसिला जारी रखा।[74]
अगले साल (1974) धर्मेंद्र की फिल्म दोस्त रिलीज़ हुई, जिसमें शत्रुघन सिन्हा और हेमा मालिनी भी थे।[75] यह फिल्म ब्लॉकबस्टर हुई। इसके बाद पत्थर और पायल और "रेशम की डोरी" जैसी फिल्मों ने ठीक-ठाक प्रदर्शन किया। रेशम की डोरी के लिए धर्मेंद्र को फिल्मफेयर अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर का अपना चौथा और आखिरी नॉमिनेशन मिला।[76]
1975 में लगे आपातकाल से लोग बहुत नाराज़ हो गए थे। इसी वजह से ऐसी फ़िल्में लोकप्रिय होने लगीं जिनमें हीरो भ्रष्टाचार और गलत सिस्टम के खिलाफ लड़ता था। पहले जहाँ रोमांस और समाज पर आधारित फ़िल्में ज़्यादा चलती थीं, अब उनकी जगह एक्शन वाली, कई हीरो वाली फ़िल्में ज़्यादा हिट होने लगीं। इसी समय अमिताभ बच्चन एक बहुत बड़े स्टार बनकर उभरे, लेकिन धर्मेंद्र भी अपनी जगह मज़बूती से बनाए रहे और लगातार हिट फ़िल्में देते रहे।[77]
1975 में धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन दो फ़िल्मों में साथ नज़र आए। पहली फ़िल्म थी चुपके चुपके, जो एक हल्की-फुल्की कॉमेडी थी।[78] आलोचकों को यह फ़िल्म पसंद आई और यह बॉक्स ऑफिस पर हिट रही।[79] दूसरी फ़िल्म थी शोले,[80] जिसे रमेश सिप्पी ने बनाया था। यह 15 अगस्त 1975 स्वतंत्रता दिवस को बॉम्बे में रिलीज़ हुई। शुरुआत में फ़िल्म को ज़्यादा अच्छा रिस्पॉन्स नहीं मिला, क्योंकि इसके प्रचार के तरीके बहुत मजबूत नहीं थे और समीक्षाएँ भी साधारण थीं। पहले दो हफ्तों में कमाई भी कम रही।
लेकिन तीसरे हफ्ते से लोगों को फ़िल्म बहुत पसंद आने लगी और सिर्फ़ मुंह-ज़बानी प्रचार से दर्शक बढ़ते गए।[81] शुरू में फ़िल्म के बिज़नेस को देखकर मेकर्स ने सोचा था कि शायद अमिताभ बच्चन वाले किरदार को मरने नहीं दिखाया जाए और कुछ सीन फिर से शूट किए जाएँ, लेकिन बाद में इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी।[82] जब फ़िल्म का साउंडट्रैक, जिसमें फ़िल्म के संवाद भी थे, रिलीज़ हुआ, तब शोले रातोंरात बहुत बड़ी हिट बन गई। इसके बाद फ़िल्म को देश के और कई बड़े राज्यों में भी रिलीज़ किया गया।
शोले 1975 की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली हिंदी फ़िल्म बनी और बॉक्स ऑफिस इंडिया ने इसे "ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर" कहा।[75] फ़िल्म ने पूरे भारत में 60 से ज़्यादा "गोल्डन जुबली" और 100 से ज़्यादा सिनेमाघरों में "सिल्वर जुबली" मनाई — जो उस समय एक रिकॉर्ड था।[82] बॉम्बे के मिनर्वा थिएटर में यह पाँच साल से ज़्यादा समय तक लगातार चली, और कोलकाता के ज्योति सिनेमा में लगभग दो साल तक।[83][84] शोले सबसे लंबे समय तक चलने वाली भारतीय फ़िल्म थी, जब तक कि 2001 में दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ने इसका रिकॉर्ड नहीं तोड़ दिया।[85]
वर्ष खत्म होने से पहले धर्मेंद्र की एक और फ़िल्म प्रतिज्ञा रिलीज़ हुई,[86] जो बहुत बड़ी हिट साबित हुई। इस फ़िल्म में दमदार एक्शन के साथ मज़ेदार स्लैपस्टिक कॉमेडी भी थी। इसी वजह से इसे “कॉमेडी की शानदार फ़िल्म” कहा गया।[87][88]
1976 में धर्मेंद्र ने रामानंद सागर की एक्शन थ्रिलर चरस में काम किया। यह फ़िल्म उस घटना पर आधारित थी जब 1972 में युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने भारतीयों को देश से निकाल दिया था। चरस को पूरे देश में बेहद अच्छा रिस्पॉन्स मिला और यह सुपरहिट रही।[89] उसी साल आई उनकी दूसरी फ़िल्म माँ, एक पारिवारिक ड्रामा थी, जिसे आलोचकों ने बहुत सराहा।[90]
1977 धर्मेंद्र के लिए बहुत बड़ा साल रहा। मनमोहन देसाई की एक्शन ड्रामा धरम वीर ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर बनी। देसाई की ही एक और मसाला फ़िल्म चाचा भतीजा सुपरहिट रही। इसके बाद खेल खिलाड़ी का (1977 फ़िल्म) (मिस्ट्री थ्रिलर) और ड्रीम गर्ल (एक्शन कॉमेडी) जैसी हिट फ़िल्में आईं।[91][92]
धरम वीर ने विदेशों में भी कमाल किया। यूनाइटेड किंगडम के 5 शहरों में इसके 23 शो हुए। रफ़ी के गानों की लोकप्रियता के कारण फ़िल्म ने यूके में बहुत तेज़ शुरुआत की और लगभग 50,000 पाउंड कमाए।[93] इसके अलावा, फ़िल्म ने सोवियत संघ में 3.2 करोड़ (32 मिलियन) टिकट बेचे, जो अपने समय में बहुत बड़ा रिकॉर्ड था।[94]
1978–1997: निरंतर सफलता और कभी-कभी असफलताएँ
1977 के बाद धर्मेंद्र की फ़िल्मों की गुणवत्ता थोड़ी कम होने लगी, इसलिए उनकी बहुत बड़ी कमाई करने वाली फ़िल्में भी कम हो गईं। लेकिन उनकी लोकप्रियता पहले जैसी ही बनी रही, और इसी वजह से उनकी सफल फ़िल्में 1990 के दशक तक आती रहीं।[26] 1978 में उनकी चार फ़िल्में रिलीज़ हुईं— शालीमार, आज़ाद, दिल्लगी और फंदेबाज़। इनमें से शालीमार और फंदेबाज़ न तो आलोचकों को पसंद आईं और न ही बॉक्स ऑफिस पर चलीं। लेकिन आज़ाद और दिल्लगी, जिनमें उनकी हीरोइन हेमा मालिनी थीं, दोनों हिट रहीं। खासकर आज़ाद, जो सुपरहिट रही और साल की चौथी सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म बनी।[95] 1979 में धर्मेंद्र को दो और सफलताएँ मिलीं— मोहन सहगल की कर्तव्य, जो सुपरहिट थी। दुलाल गुहा की "दिल का हीरा", जो सफल साबित हुई।[96]
धर्मेंद्र ने 1980 के दशक की शुरुआत द बर्निंग ट्रेन से की, जो रवि चोपड़ा की बड़े बजट वाली एक्शन थ्रिलर थी।[97] इसमें उनके साथ जितेन्द्र, विनोद खन्ना, हेमा मालिनी और परवीन बॉबी भी थे। फ़िल्म से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन यह बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ़ औसत रही। बाद में, समय के साथ इसे लोगों ने पसंद करना शुरू किया और यह एक क्लासिक मानी जाने लगी।[98] इसके बाद उनकी दो फ़िल्में आईं— अलीबाबा और 40 चोर, जो ठीक-ठाक चली। राम बलराम, जिसमें वे फिर से अमिताभ बच्चन के साथ दिखे, और यह फ़िल्म हिट रही।[99]
1981 में धर्मेंद्र की फ़िल्म कातिलों के कातिल सुपरहिट रही। लेकिन उनकी बाकी फ़िल्में जैसे आस पास और क्रोधी उतनी सफल नहीं रहीं।[100][101] 1982 में स्थिति बदल गई। इस साल उनकी पाँच फ़िल्में लगातार हिट रहीं— राजपूत, बदले की आग, गज़ब, बघावत और सम्राट। इन सभी ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की।[102]
1983 में धर्मेंद्र की फ़िल्म नौकर बीवी का हिट रही। इसके बाद कयामत भी सफल हुई। लेकिन उस साल की सबसे बड़ी और सबसे चर्चित फ़िल्म रज़िया सुल्तान, जिसे कमाल अमरोही ने बनाया था, बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली और असफल साबित हुई।[103][104]
1984 में उनकी सात फ़िल्में रिलीज़ हुईं। इनमें से बाज़ी, जागीर, जिने नहीं दूंगा और धर्म और कानून ठीक-ठाक रहीं। बाकी फ़िल्में न तो आलोचकों को पसंद आईं और न ही दर्शकों को, इसलिए वे फ्लॉप रहीं।
1985 में धर्मेंद्र की बड़ी फ़िल्म गुलामी आई, जिसे जे. पी. दत्ता ने बनाया था। इसमें मिथुन चक्रवर्ती, नसीरुद्दीन शाह, रीना रॉय और स्मिता पाटिल भी थे। फ़िल्म को अच्छी समीक्षाएँ मिलीं और यह सुपरहिट रही। यह साल की पाँच सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्मों में भी शामिल थी। लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार द्वारा गाया गया इसका गाना "ज़ीहले मुस्किन मकुन बा-रंजिश" बहुत लोकप्रिय हुआ और बिनाका गीत माला की साल के अंत की टॉप गानों में गिना गया।[105]
1986 में धर्मेंद्र को एक और सफलता मिली फ़िल्म "बेगाना" से, जिसमें उनके साथ कुमार गौरव और रति अग्निहोत्री थे।
1987 में धर्मेंद्र ने शानदार वापसी की और उस साल आठ सफल फ़िल्में दीं। उनकी पहली दो फ़िल्में थीं— इंसानियत के दुश्मन और लोहा। दोनों एक्शन फ़िल्में थीं और दोनों ही हिट रहीं। इसके बाद वे दादागिरी, हुकूमत और आग ही आग में नज़र आए।[106][107] दादागिरी ठीक-ठाक चली। हुकूमत और आग ही आग सुपरहिट रहीं। खासकर हुकूमत, जो साल की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म बनी। इसके बाद उनकी एक और हिट फ़िल्म आई—वतन के रखवाले। साथ ही रजनीकान्त के साथ उनकी फ़िल्म इंसाफ कौन करेगा भी सफल रही। इस दशक में धर्मेंद्र की दो और बड़ी हिट फ़िल्में थीं— खतरों के खिलाड़ी (1988) और एलान-ए-जंग (1989)।[108][109]
1990 का दशक शुरू होते ही धर्मेंद्र की स्टार पावर कम होने लगी। 1990 से 1992 के बीच उनकी कुछ फ़िल्में सफल रहीं, जैसे— नाकाबंदी (1990), वीरू दादा (1990), हमसे ना टकराना (1990), कोहराम (1991) और तहलका (1992) – यह बतौर हीरो उनकी आख़िरी हिट फ़िल्म रही।[109] 1993 में वे जे. पी. दत्ता की बड़ी एक्शन फ़िल्म क्षत्रिय में दिखे। इसमें सुनील दत्त, विनोद खन्ना, सनी देओल, संजय दत्त, राखी गुलज़ार, मीनाक्षी और रवीना टंडन जैसे कई बड़े सितारे थे।[110] फ़िल्म की शुरुआत बहुत अच्छी रही, लेकिन 1993 के बॉम्बे बम धमाकों में संजय दत्त का नाम आने पर यह कई सिनेमाघरों से हटा दी गई।[111][112] इसके बाद कमाई गिर गई और फ़िल्म फ्लॉप हो गई। 1990 के दशक के मध्य में धर्मेंद्र की कुछ फ़िल्में ठीक-ठाक चलीं, जैसे— पुलिसवाला गुंडा (1995), माफिया (1996)। लेकिन उनकी बाकी फ़िल्में, जैसे मैदान-ए-जंग (1995) और रिटर्न ऑफ़ ज्वेल थीफ़ (1996), बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं।[113][114][115]
2016 में द हिन्दू के एक लेख में, फ़िल्म समीक्षक विजय लोकपल्ली ने लिखा कि-1980 के दशक के आख़िर में धर्मेंद्र ने कम बजट वाली एक्शन फ़िल्मों में काम करना शुरू किया। यह बदलाव उन्हें दारा सिंह की तरह दिखाता था, जो पहले आम कामगार और छोटे शहरों के दर्शकों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। लोकपल्ली के अनुसार, जब हिंदी सिनेमा में खान तिकड़ी (सलमान–शाहरुख–आमिर) और अक्षय कुमार जैसे नए सितारे छाने लगे, तब धर्मेंद्र ने जानबूझकर एक अलग तरह के दर्शकों को चुना— मज़दूर, छोटे शहरों के लोग और पुराने ज़माने के एक्शन हीरो के चाहने वाले। इस वजह से धर्मेंद्र ने ऐसी फ़िल्में करना शुरू किया जो कम पैसों में बनती थीं, जल्दी शूट हो जाती थीं और ज़्यादातर बी- और सी-ग्रेड सिनेमाघरों (सिंगल स्क्रीन) में दिखाई जाती थीं।
शुरुआत में प्रेस और कुछ लोगों ने इसे "गिरावट" कहा और कहा कि धर्मेंद्र बी-ग्रेड फ़िल्मों में काम कर रहे हैं। लेकिन लोकपल्ली का मानना था कि यह उनकी सोची-समझी रणनीति थी— ये फ़िल्में कम खर्च में बन जाती थीं, एक महीने में तैयार हो जाती थीं, और उनका एक स्थिर, वफ़ादार दर्शक वर्ग था जो अभी भी पुराने ढंग का एक्शन और हीरोइज़्म पसंद करता था।[116] हालाँकि, इतना सब होने के बावजूद, धर्मेंद्र की छवि को नुकसान हुआ क्योंकि उन्होंने अपने करियर में बहुत सी कम बजट या बी-ग्रेड फ़िल्में कीं। इसका असर यह हुआ कि-उनके पास बहुत सारी ब्लॉकबस्टर और हिट फ़िल्में होने के बावजूद, उनके नाम पर सबसे ज़्यादा फ्लॉप फ़िल्मों का रिकॉर्ड भी जुड़ गया। अनुमान है कि 1960 से 2013 के बीच उनकी लगभग 180 फ़िल्में रिलीज़ हुईं, और इनमें से ज़्यादातर उनकी “बी-ग्रेड फ़िल्म” वाले दौर में आईं।[117]
1997 में धर्मेंद्र को फ़िल्मफ़ेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिला। पुरस्कार लेते समय, जब उन्होंने दिलीप कुमार और अपनी पत्नी सायरा बानो के सामने यह पुरस्कार स्वीकार किया, तो धर्मेंद्र भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि इतने सारे हिट फ़िल्मों और लगभग सौ लोकप्रिय फ़िल्मों के बावजूद, उन्होंने कभी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार नहीं जीता।[118]
इस मौके पर दिलीप कुमार ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा,
"जब भी मैं भगवान से मिलूंगा, मैं उनसे अपनी एक ही शिकायत करूंगा – आपने मुझे धर्मेंद्र जितना सुंदर क्यों नहीं बनाया?"[119]
1998–2025: चरित्र भूमिकाओं की ओर बदलाव
1990 के दशक के अंत से धर्मेंद्र ने चरित्र भूमिकाएँ निभानी शुरू कीं। उनकी इस तरह की पहली फ़िल्म थी प्यार किया तो डरना क्या (1998), जिसे सोहेल ख़ान ने बनाया। इस फ़िल्म में उनके साथ सलमान ख़ान, काजोल और अरबाज़ ख़ान भी थे।[120] फ़िल्म को आलोचकों ने पसंद किया और यह सुपरहिट साबित हुई।[121]
नए दशक की धर्मेंद्र की पहली दो बड़ी फ़िल्में थीं— कैसे कहूं के… प्यार है (2003) और किस किस की किस्मत (2004)।[122][123] लेकिन दोनों फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रहीं। इसके बाद, धर्मेंद्र ने थोड़ा समय लिया और 2007 में तीन फ़िल्मों के साथ वापसी की— लाइफ़ इन ए... मेट्रो (अनुराग बसु) – ड्रामा, अपने (अनिल शर्मा) – स्पोर्ट्स ड्रामा और जॉनी गद्दार (श्रीराम राघवन) – नियो-नोयर थ्रिलर।[124][125] इनमें से लाइफ इन ए… मेट्रो और अपने आलोचकों और दर्शकों दोनों को पसंद आईं और सुपरहिट रहीं।[126][127] वहीं, जॉनी गद्दार बॉक्स ऑफिस पर असफल रही, लेकिन आलोचकों ने इसे सराहा और बाद में इसे पंथ फ़िल्म माना गया।[128][129]
उसी साल धर्मेंद्र ने ओम शांति ओम में गाने “दीवानगी दीवानगी” में अतिथि भूमिका निभाई।[130] 2011 में उन्होंने दो फ़िल्मों में काम किया— यमला पगला दीवाना – बॉक्स ऑफिस हिट और टेल मी ओ खुदा – व्यावसायिक रूप से फ़्लॉप।[131][132] इसके बाद धर्मेंद्र ने यमला पगला दीवाना के सीक्वल में भी काम किया— यमला पगला दीवाना 2 (2013) और यमला पगला दीवाना फिर से (2018)। लेकिन सीक्वल फ़िल्मों को दर्शकों से खराब प्रतिक्रिया मिली और वे पहले की तरह हिट नहीं रहीं।[133]
2023 में धर्मेंद्र ने करण जौहर की पारिवारिक ड्रामा फ़िल्म रॉकी और रानी की प्रेम कहानी में काम किया। फ़िल्म को आलोचकों की मिश्रित प्रतिक्रिया मिली, लेकिन यह हिट रही और दुनिया भर में ₹3.5 बिलियन (US$41 मिलियन) से अधिक कमाई की। यह साल की दसवीं सबसे ज्यादा कमाई करने वाली भारतीय फ़िल्म भी बनी।[134][135] इसके अलावा, 71वें राष्ट्रीय पुरस्कारों में फ़िल्म ने सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता।[136] अगले साल उन्होंने तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया में शाहिद कपूर और कृति सेनन के साथ काम किया।[137] लेकिन इस फ़िल्म को आलोचकों से नकारात्मक समीक्षा मिली।[138]
उनकी अंतिम फ़िल्म थी "इक्कीस" (2025), जो अरुण खेतरपाल के जीवन पर आधारित युद्ध ड्रामा थी। हालाँकि फिल्म की रिलीज़ से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई।[139]
लगातार सहयोग
धर्मेंद्र की सबसे सफल और प्रसिद्ध जोड़ी हेमा मालिनी के साथ थी, जिनसे उन्होंने बाद में शादी की।[24] इस जोड़ी ने कई हिट फ़िल्मों में साथ काम किया, जैसे— तुम हसीं मैं जवां, शराफत, नया जमाना, सीता और गीता, राजा जानी, जुगनू, दोस्त, पत्थर और पायल, शोले, चरस, मां, चाचा भतीजा और आजाद।[140]
धर्मेंद्र ने कई अलग-अलग निर्देशकों के साथ काम किया, जिनकी फिल्म बनाने की शैली अलग थी।[141] उनका सबसे लंबा सहयोग अर्जुन हिंगोरानी के साथ था, जो 1960 से 1991 तक चला। उनकी पहली फिल्म दिल भी तेरा हम भी तेरे थी, और यह अर्जुन हिंगोरानी द्वारा निर्देशित धर्मेंद्र की पहली मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म थी।[142][143]
इसके अलावा उन्होंने हिंगोरानी के निर्देशन और निर्माण में कई फ़िल्में कीं, जैसे—किस्मत की, खेल खिलाड़ी का, कातिलों के कातिल, कौन करे कुर्बानी। हिंगोरानी द्वारा निर्मित सल्तनत और करिश्मा कुदरत में भी उन्होंने काम किया।[144]
धर्मेंद्र ने अन्य निर्देशकों के साथ भी कई फ़िल्में कीं— प्रमोद चक्रवर्ती के साथ: नया ज़माना, जुगनू, ड्रीम गर्ल, आजाद।[145]
अनिल शर्मा के साथ: हुकूमत, एलान-ए-जंग, फरिश्ते, तहलका, अपने।[146][147]
अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत में धर्मेंद्र ने जगन्नाथ चटर्जी द्वारा निर्देशित पारी (1966) नामक बंगाली फ़िल्म में काम किया। इस फ़िल्म में दिलीप कुमार और केष्टो मुखर्जी भी मुख्य भूमिका में थे।[148]
धर्मेंद्र समय-समय पर पंजाबी फ़िल्मों में भी दिखाई दिए, जैसे— कंकन दे ओहले (1970), दो शेर (1974), दुख भंजन तेरा नाम (1974), तेरी मेरी इक जिंदरी (1975), पुत्त जट्टां दे (1982) और कुर्बानी जट्ट दी (1990)। वह 2014 में फ़िल्म डबल दी ट्रबल के साथ पंजाबी सिनेमा में वापसी की।[149]
अन्य कार्य
धर्मेंद्र को हिंदी सिनेमा का दिग्गज अभिनेता माना जाता है, लेकिन फिल्मों से हटकर उनका एक अलग और सादा जीवन भी चर्चा में रहा है। यह बात अब न्यूज़ रिपोर्ट्स और इंटरव्यू के ज़रिए सामने आ चुकी है कि धर्मेंद्र खेती-बाड़ी से गहराई से जुड़े हुए थे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, महाराष्ट्र के लोनावला स्थित उनके फार्म हाउस में वे नियमित रूप से खेती करते थे। उन्होंने वहां सब्ज़ियां, फल और अनाज उगाए और कई बार खुद ट्रैक्टर चलाते हुए भी देखे गए। यह कोई दिखावटी शौक नहीं था, बल्कि खेती उनके जीवन का अहम हिस्सा थी। धर्मेंद्र ने खुद स्वीकार किया था कि मिट्टी से जुड़कर उन्हें मानसिक शांति मिलती है और गांव-देहात की यादें ताज़ा हो जाती हैं।
खबरों में यह भी बताया गया कि वे ऑर्गेनिक खेती के समर्थक थे और रासायनिक खादों से दूर रहना पसंद करते थे। उन्होंने गाय-भैंस पालने और देसी जीवनशैली को अपनाने पर भी ज़ोर दिया। सोशल मीडिया पर उनके खेती करते हुए वीडियो और तस्वीरें वायरल हुईं, जिन्हें लोगों ने काफी सराहा।
इस तरह न्यूज़ से साफ होता है कि धर्मेंद्र सिर्फ परदे के हीरो नहीं थे, बल्कि असल जिंदगी में भी किसान-मन और प्रकृति प्रेमी इंसान थे।
राजनीतिक करियर
धर्मेंद्र ने भारतीय जनता पार्टी की ओर से 2004 से 2009 तक राजस्थान में बीकानेर का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय संसद (लोकसभा) के सदस्य के रूप में कार्य किया। 2004 में अपने चुनाव अभियान के दौरान, उन्होंने एक आक्रामक टिप्पणी की कि उन्हें "लोकतंत्र के लिए आवश्यक बुनियादी शिष्टाचार" सिखाने के लिए हमेशा के लिए तानाशाह चुना जाना चाहिए, जिसके लिए उनकी कड़ी आलोचना की गई थी।[150] जब सदन का सत्र चल रहा था, तब वे शायद ही कभी संसद में उपस्थित होते थे, फिल्मों की शूटिंग या अपने फार्म हाउस में खेत का काम करने में समय बिताना पसंद करते थे।[151]
टेलीविजन कैरियर
2011 में, धर्मेंद्र ने लोकप्रिय रियलिटी शो इंडियाज गॉट टैलेंट की तीसरी श्रृंखला के पुरुष जज के रूप में साजिद खान की जगह ली।[152]
29 जुलाई 2011 को, इंडियाज गॉट टैलेंट ने धर्मेंद्र के साथ नए जज के रूप में कलर्स पर प्रसारित किया और पिछले दो सीज़न की शुरुआती रेटिंग को पार कर गया।[153]
फिल्मों का निर्माण और प्रस्तुतीकरण
1983 में, धर्मेंद्र ने एक प्रोडक्शन कंपनी की स्थापना की जिसे विजयता फिल्म्स के नाम से जाना जाता है। 1983 में रिलीज़ हुई अपने पहले उद्यम बेताब में, विजयता फिल्म्स ने मुख्य अभिनेता के रूप में सनी देओल को लॉन्च किया। यह फिल्म साल की दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी। 1990 में उन्होंने एक्शन फिल्म घायल का निर्माण किया, जिसमें सनी ने भी अभिनय किया। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार सहित सात फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। इसने संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। धर्मेंद्र ने 1995 में बरसात में अपने छोटे बेटे बॉबी के करियर की शुरुआत की।[154]
निजी जीवन
धर्मेंद्र की पहली शादी 1954 में 19 साल की उम्र में प्रकाश कौर से हुई थी।[155] इस शादी से उनके दो बेटे थे, सनी और बॉबी, दोनों सफल फिल्म अभिनेता, और दो बेटियां, विजेता और अजीता। उनके भतीजे अभय देओल भी एक अभिनेता हैं।
बॉम्बे जाने और फिल्म व्यवसाय में आने के बाद, धर्मेंद्र ने हेमा मालिनी से शादी कर ली।[156][157] उन्होंने और मालिनी ने 1970 के दशक की शुरुआत में कई फिल्मों में एक साथ अभिनय किया, जिसमें शोले भी शामिल है।[158][159] दंपति की दो बेटियां हैं, ईशा देओल (एक अभिनेत्री, जिसका जन्म 1981 में हुआ था) और अहाना देओल (एक सहायक निर्देशक, 1985 में पैदा हुई)।
धर्मेंद्र के पोते और बॉबी देओल के बेटे का नाम भी धर्मेंद्र के नाम पर "धर्म सिंह देओल" रखा गया है।[160]
2019 में, धर्मेंद्र के पोते और सनी देओल के बेटे करण देओल ने पल पल दिल के पास के साथ शुरुआत की।[161]
पुरस्कार
मुख्य लेख: धर्मेंद्र फिल्मोग्राफी
प्रशंसा और सम्मान
नागरिक पुरस्कार
मुख्य लेख: नागरिक पुरस्कार
- 2012 - पद्म भूषण, भारत सरकार की ओर से भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान[8]
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
मुख्य लेख: राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
- 1990 - संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म - घायल
फिल्मफेयर पुरस्कार
मुख्य लेख: फिल्मफेयर पुरस्कार
| साल
|
श्रेणी
|
फिल्म
|
परिणाम
|
| 1965
|
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता
|
आई मिलन की बेला
|
नामित
|
| 1967
|
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता
|
फूल और पत्थर
|
नामित
|
| 1972
|
मेरा गाँव मेरा देश
|
नामित
|
| 1974
|
यादों की बारात
|
नामित
|
| 1975
|
रेशम की डोरी
|
नामित
|
| 1984
|
सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता
|
नौकर बीवी का
|
नामित
|
| 1991
|
सर्वश्रेष्ठ फिल्म
|
घायल
|
जीत
|
| 1997
|
लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
|
—
|
जीत
|
अन्य पुरस्कार और सम्मान
- सत्तर के दशक के मध्य में, धर्मेंद्र को दुनिया के सबसे सुंदर पुरुषों में से एक चुना गया था।[162]
- उन्हें विश्व लौह पुरुष पुरस्कार मिला है।[163]
- उन्हें कलाकर पुरस्कारों में "भारतीय सिनेमा में योगदान" के लिए एक विशेष पुरस्कार मिला।
- वह भारतीय मनोरंजन उद्योग में उनके उत्कृष्ट योगदान की मान्यता में फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा "लिविंग लीजेंड अवार्ड" के प्राप्तकर्ता हैं।[164]
- 2003 में उन्हें सैनसुई व्यूअर्स च्वाइस मूवी अवार्ड्स में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।[165]
- 2004 में, उन्हें भारतीय सिनेमा में सर्वश्रेष्ठ योगदान के लिए सम्मानित किया गया।[166]
- 2005 में, उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए ज़ी सिने अवार्ड मिला
- 2007 में, उन्हें पुणे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (PIFF) में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया
- 2007 में, उन्हें IIFA लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।
- 2007 में, उन्हें भारतीय राष्ट्र के लिए मानवीय सेवाओं के लिए एक पुरस्कार मिला।[167]
- 2007 में, उन्हें डीबीआर एंटरटेनमेंट द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया।[168]
- 2007 में, पंजाबी अखबार कौमी एकता ने उन्हें भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया।[168]
- 2008 में, मैक्स स्टारडस्ट अवार्ड्स में उन्हें "अभिनेता पार उत्कृष्टता" नामित किया गया था।
- 2008 में, उन्हें 10वें मुंबई अकादमी ऑफ़ द मूविंग इमेज (MAMI) अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।[169]
- 2009 में, उन्हें नासिक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (NIFF) में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिला।[170]
- 2010 में, उन्हें बिग स्टार एंटरटेनमेंट अवार्ड्स में उनकी अर्धशतकीय उत्कृष्टता के लिए बिग स्टार एंटरटेनर के रूप में सम्मानित किया गया।[171]
- 2011 में, उन्हें अप्सरा फिल्म एंड टेलीविज़न प्रोड्यूसर्स गिल्ड अवार्ड में अवार्ड मिला।
- 2011 में, उन्हें फिल्म उद्योग में 50 साल पूरे करने के लिए "सलाम महाराष्ट्र पुरस्कार" मिला।[172]
- 2011 में, उन्हें भारतीय टेलीविजन अकादमी पुरस्कारों में "द आईटीए स्क्रॉल ऑफ ऑनर" से सम्मानित किया गया।[173]
फ़िल्में
नामांकन और पुरस्कार
- फ़िल्मफ़ेयर जीवनकाल सफलता पुरस्कार
- आइफ़ा जीवनकाल सफलता पुरस्कार