शाहरुख़ ख़ान (जन्म 2 नवंबर 1965), जिन्हें अनौपचारिक रूप में एस॰आर॰के॰ ( SRK ) नाम से सन्दर्भित किया जाता, यह एक भारतीय फ़िल्म अभिनेता है। अक्सर मीडिया में इन्हें "बॉलीवुड का बादशाह", "किंग ख़ान", "रोमांस किंग" और किंग ऑफ़़ बॉलीवुड नामों से पुकारा जाता है। शाहरुख़ ख़ान ने रोमैंटिक नाटकों से लेकर ऐक्शन थ्रिलर जैसी शैलियों में 72 हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है। [1] [2] [3] [4] फ़िल्म उद्योग में उनके योगदान के लिये उन्होंने तीस नामांकनों में से चौदह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते हैं। वे और दिलीप कुमार ही ऐसे दो अभिनेता हैं जिन्होंने फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ…
शाहरुख़ ख़ान (जन्म 2 नवंबर 1965), जिन्हें अनौपचारिक रूप में एस॰आर॰के॰ (SRK) नाम से सन्दर्भित किया जाता, यह एक भारतीय फ़िल्म अभिनेता है। अक्सर मीडिया में इन्हें "बॉलीवुड का बादशाह", "किंग ख़ान", "रोमांस किंग" और किंग ऑफ़़ बॉलीवुड नामों से पुकारा जाता है। शाहरुख़ ख़ान ने रोमैंटिक नाटकों से लेकर ऐक्शन थ्रिलर जैसी शैलियों में 72 हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय किया है।[1][2][3][4] फ़िल्म उद्योग में उनके योगदान के लिये उन्होंने तीस नामांकनों में से चौदह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीते हैं। वे और दिलीप कुमार ही ऐसे दो अभिनेता हैं जिन्होंने फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार 8 बार जीता है। 2005 में भारत सरकार ने उन्हें भारतीय सिनेमा के प्रति उनके योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया। 2020 में दुनिया के सबसे अमीर अभिनेता माने गए थे[5]
अर्थशास्त्र में उपाधि ग्रहण करने के बाद इन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1980 में रंगमंचों व कई टेलिविज़न धारावाहिकों से की और 1992 में व्यापारिक दृष्टि से सफल फ़िल्म दीवाना से फ़िल्म क्षेत्र में कदम रखा और अपने करियर की शुरुआत की । इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर प्रथम अभिनय पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके पश्चात् उन्होंने कई फ़िल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं अदा की जिनमें डर (1993), बाज़ीगर (1993) और अंजाम (1994) शामिल है। वे कई प्रकार की भूमिकाओं में दिखें व भिन्न-भिन्न प्रकार की फ़िल्मों में कार्य किया जिनमे रोमांस फ़िल्में, हास्य फ़िल्में, खेल फ़िल्में व ऐतिहासिक ड्रामा शामिअर्थशास्त्र में उपाधि ग्रहण करने के बाद इन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1980 में रंगमंचों व कई टेलिविज़न धारावाहिकों से की और 1992 में व्यापारिक दृष्टि से सफल फ़िल्म दीवाना से फ़िल्म क्षेत्र में कदम रखा। इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर प्रथम अभिनय पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके पश्चात् उन्होंने कई फ़िल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं अदा की जिनमें डर (1993), बाज़ीगर (1993) और अंजाम (1994) शामिल है। वे कई प्रकार की भूमिकाओं में दिखें व भिन्न-भिन्न प्रकार की फ़िल्मों में कार्य किया जिनमे रोमांस फ़िल्में, हास्य फ़िल्में, खेल फ़िल्में ,एक्शन थ्रिलर फ़िल्मे व ऐतिहासिक ड्रामा शामिल है।
उनके द्वारा अभिनीत ग्यारह फ़िल्मों ने विश्वभर में 100 करोड़ का व्यवसाय किया है। ख़ान की कुछ फ़िल्में जैसे दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995), कुछ कुछ होता है (1998), देवदास (2002), चक दे! इंडिया (2007), ओम शांति ओम (2007), रब ने बना दी जोड़ी (2008) और रा.वन (2011) अब तक की सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों में रही है और कभी ख़ुशी कभी ग़म (2001), कल हो ना हो (2003), वीर ज़ारा'उनके द्वारा अभिनीत ग्यारह फ़िल्मों ने विश्वभर में 100 करोड़ का व्यवसाय किया है। ख़ान की कुछ फ़िल्में जैसे दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे (1995),देवदास (2002), चक दे! इंडिया (2007), ओम शांति ओम (2007), रब ने बना दी जोड़ी (2008) और रा.वन (2011) अब तक की सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों में रही है और कभी ख़ुशी कभी ग़म (2001), कल हो ना हो (2003), वीर ज़ारा (2006)।
२०२३ मे आने वाली शाहरुख़ की पहली फ़िल्म पठान उनकी आजतक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फ़िल्म बन चुकी है। जिसने बॉक्स ऑफ़िस पर 1050 करोड़ का कारोबार किया । यह फ़िल्म बॉलीवुड की पहली फ़िल्म बन चुकी है जिसने ने 400 और 500 करोड़ की नेट कमाई भारत में की। शाहरुख़ ख़ान के बारे में एक बात बता दें तो ये दुनिया के लगभग हर देश में जाने जाते हैं। फ्रांस में इनके नाम का सिक्का भी एक संघराल्य में है।
वेल्थ रिसर्च फ़ॉर्म वैल्थ एक्स के मुताबिक किंग ख़ान सबसे अमीर भारतीय अभिनेता बन गए हैं। फ़र्म ने अभिनेता की कुल संपत्ति 3660 करोड़ रूपए आंकी थी लेकिन अब 5000 करोड़ बताई जाती है।[6]
जीवनी
प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
शाहरुख़ ख़ान का जन्म नई दिल्ली में एक भारतीय मूल के परिवार में हुआ। उनके माता-पिता भारतीय मूल के थे।[7][8][9]
उनके पिता ताज मोहम्मद ख़ान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े रहे थे और एक स्वतंत्रता सेनानी थे, जबकि उनकी माता लतीफ़ा फ़ातिमा मेजर जनरल शाहनवाज़ ख़ान की पुत्री थीं।[10]
ख़ान के पिता भारत के विभाजन से पूर्व पेशावर के प्रसिद्ध क़िस्सा ख़्वानी बाज़ार क्षेत्र में रहते थे और बाद में दिल्ली आ गए थे,[11] जबकि उनकी माता रावलपिंडी से भारत आई थीं।[12]
शाहरुख़ ख़ान की एक बड़ी बहन हैं जिनका नाम शहनाज़ ख़ान है, जिन्हें परिवार में प्यार से लालारुख़ कहा जाता है।[13][14]
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट कोलम्बा स्कूल से प्राप्त की, जहाँ वे शिक्षा, खेलकूद और नाट्य कला—तीनों क्षेत्रों में सक्रिय रहे। विद्यालय की ओर से उन्हें “स्वॉर्ड ऑफ़ ऑनर” से सम्मानित किया गया, जो प्रत्येक वर्ष सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी को प्रदान किया जाता है।
विद्यालय के पश्चात उन्होंने हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।[15][16]
इसके बाद उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से जनसंचार (मास कम्युनिकेशन) में स्नातकोत्तर अध्ययन प्रारंभ किया, हालांकि अभिनय के क्षेत्र में बढ़ती रुचि के कारण वे इस पाठ्यक्रम को पूर्ण नहीं कर सके।[17]
अपने माता-पिता के निधन के पश्चात शाहरुख़ ख़ान 1991 में दिल्ली से मुंबई चले आए। इसी वर्ष उनका विवाह गौरी ख़ान से हिंदू रीति-रिवाज़ों के अनुसार संपन्न हुआ।[18]
उनके तीन संतान हैं—पुत्र आर्यन ख़ान (जन्म 1997), पुत्री सुहाना ख़ान (जन्म 2000) तथा पुत्र अब्राहम ख़ान।
अभिनय
"मैं एक हिंदू से विवाहित हूं, मेरे बच्चों को दोनों धर्मों के साथ लाया जा रहा है, जब मैं ऐसा महसूस करता हूं तो मैं नमाज़ पढ़ता हूं। लेकिन अगर मेरा धर्म चार विवाहों की अनुमति देता है, तो भी मैं इसमे विश्वास नहीं करना चाहूंगा। कई अन्य चीज़ें भी प्रासंगिकता खो चुकी हैं , लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं कुरान से पूछताछ कर रहा हूं। मैं नमाज़ [प्रार्थना] को पांच बार पढ़ने के संदर्भ में धार्मिक नहीं हूं लेकिन मैं इस्लामी हूं। मैं इस्लाम के सिद्धांतों पर विश्वास करता हूं और मेरा मानना है कि यह एक अच्छा धर्म है और एक अच्छा अनुशासन। मैं लोगों को यह जानना चाहता हूं कि इस्लाम न केवल एक कट्टरपंथी, या मूल रूप से अलग, नाराज व्यक्ति है, या जो केवल जिहाद करता है। मैं लोगों को यह जानना चाहता हूं कि जिहाद का वास्तविक अर्थ है अपनी ख़ुद की हिंसा और कमज़ोरी को दूर करने के लिए। यदि आवश्यकता हो, तो इसे अहिंसक तरीक़े से दूर करें। "[19][20][21]
—शाहरुख़ ख़ान, अपनी धार्मिक मान्यताओं पर
ख़ान ने अभिनय की शिक्षा प्रसिद्ध रंगमंच निर्देशक बैरी जॉन से दिल्ली के थियेटर एक्शन ग्रुप में ली । वर्ष २००७ में जॉन ने अपने पुराने शिष्य के बारे में कहा:
" The credit for the phenomenally successful development and management of Shah Rukh's career goes to the superstar himself."
(अनुवाद: शाहरूख़ के करिअर की असाधारण सफलता का सारा श्रेय उस ही को जाता है|)[22]
ख़ान ने अपना करिअर १९८८ में दूरदर्शन के धारावाहिक "फ़ौजी" से प्रारम्भ किया जिसमे उन्होंने कमान्डो अभिमन्यु राय का किरदार अदा किया|[23] उसके उपरांत उन्होंने और कई धारावाहिकों में अभिनय किया जिनमे प्रमुख था १९८९ का "सर्कस"[24], जिसमे सर्कस में काम करने वाले व्यक्तियों के जीवन का वर्णन किया गया था और जो अज़ीज़ मिर्ज़ा द्वारा निर्देशित था| उस ही वर्ष उन्होंने अरुंधति राय द्वारा लिखित अंग्रेज़ी फ़िल्म "इन विच एनी गिव्स इट दोज़ वंस" में एक छोटा किरदार निभाया| यह फ़िल्म दिल्ली विश्वविद्यालय में विद्यार्थी जीवन पर आधारित थी|
अपने माता पिता की मृत्यु के उपरांत १९९१ में ख़ान नई दिल्ली से मुम्बई आ गये| बॉलीवुड में उनका प्रथम अभिनय "दीवाना" फ़िल्म में हुआ जो बॉक्स ऑफ़़िस पर सफल घोषित हुई|[25] इस फ़िल्म के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर की तरफ़ से सर्वश्रेष्ठ प्रथम अभिनय का अवार्ड मिला| उनकी अगली फ़िल्म थी "दिल आशना है" जो नही चली।
१९९३ की हिट फ़िल्म "बाज़ीगर" में एक हत्यारे का किरदार निभाने के लिए उन्हें अपना पहला फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला। उस ही वर्ष में फ़िल्म "डर" में इश्क़ के जूनून में पागल आशिक़ का किरदार अदा करने के लिए उन्हें सराहा गया। इस वर्ष में फ़िल्म "कभी हाँ कभी ना" के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर समीक्षक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया| १९९४ में ख़ान ने फ़िल्म "अंजाम" में एक बार फिर जुनूनी एवं मनोरोगी आशिक़ की भूमिका निभाई और इसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
१९९५ में उन्होंने आदित्य चोपड़ा की पहली फ़िल्म "दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे" में मुख्य भूमिका निभाई। यह फ़िल्म बॉलीवुड के इतिहास की सबसे सफल और बड़ी फ़िल्मों में से एक मानी जाती है। मुम्बई के कुछ सिनेमा घरों में यह १२ सालों से चल रही है।[26][27] इस फ़िल्म के लिए उन्हें एक बार फिर फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार हासिल हुआ।
१९९६ उनके लिए एक निराशाजनक साल रहा क्यूंकि उसमे उनकी सारी फ़िल्में असफल रहीं।[28] १९९७ में उन्होंने यश चोपड़ा की दिल तो पागल है, सुभाष घई की परदेस और अज़ीज़ मिर्ज़ा की येस बॉस जैसी फ़िल्मों के साथ सफलता के क्षेत्र में फिर क़दम रखा।[29]
वर्ष १९९८ में करण जोहर की बतौर निर्देशक पहली फ़िल्म कुछ कुछ होता है उस साल की सबसे बड़ी हिट घोषित हुई और ख़ान को चौथी बार फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार हासिल हुआ। इसी साल उन्हें मणि रत्नम की फ़िल्म दिल से में अपने अभिनय के लिए फ़िल्म समीक्षकों से काफ़ी तारीफ़ मिली और यह फ़िल्म भारत के बाहर काफ़ी सफल रही।[30]
अगला वर्ष उनके लिए कुछ ख़ास लाभकारी नही रहा क्यूंकि उनकी एक मात्र फ़िल्म, बादशाह, का प्रदर्शन स्मरणीय नही रहा और वह औसत व्यापार ही कर पायी|[31] सन २००० में आदित्य चोपड़ा की मोहब्बतें में उनके किरदार को समीक्षकों से बहुत प्रशंसा मिली और इस फ़िल्म के लिए उन्हें अपना दूसरा फ़िल्मफ़ेयर समीक्षक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला| उस ही साल आई उनकी फ़िल्म जोश भी हिट हुई। उस ही वर्ष में ख़ान ने जूही चावला और अज़ीज़ मिर्ज़ा के साथ मिल कर अपनी ख़ुद की फ़िल्म निर्माण कम्पनी, 'ड्रीम्ज़ अन्लिमिटिड', की स्थापना की। इस कम्पनी की पहली फ़िल्म फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी, जिसमे ख़ान और चावला दोनों ने अभिनय किया, बॉक्स ऑफ़़िस पे जादू बिखेरने में असमर्थ रही। कमल हसन की विवादग्रस्त फ़िल्म हे राम में भी ख़ान ने एक सहयोगी भूमिका निभाई जिसके लिए उन्हें समीक्षकों ने सराहा हालांकि यह फ़िल्म भी असफल श्रेणी में रही।[28]
सन २००१ में ख़ान ने करण जोहर के साथ अपनी दूसरी फ़िल्म कभी ख़ुशी कभी ग़म की, जो एक पारिवारिक कहानी थी और जिसमें अन्य भी कई सितारे थे। यह फ़िल्म उस वर्ष की सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों की सूची में शामिल थी। उन्हें अपनी फ़िल्म अशोका, जो की ऐतिहासिक सम्राट अशोक के जीवन पर आधारित थी, के लिए भी प्रशंसा मिली लेकिन यह फ़िल्म भी नाकामयाब रही। सन् २००२ में ख़ान ने संजय लीला भंसाली की दुखांत प्रेम कथा देवदास में मुख्य भूमिका अदा की जिसके लिए उन्हें एक बार फिर फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार दिया गया। यह शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास देवदास पर आधारित तीसरी हिन्दी फ़िल्म थी।
अगले साल ख़ान की दो फ़िल्में रिलीज़ हुईं, चलते चलते और कल हो ना हो। चलते चलते एक औसत हिट साबित हुई[32] लेकिन कल हो ना हो, जो की करण जोहर की तीसरी फ़िल्म थी, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों ही बाज़ारों में काफ़ी कामयाब रही। इस फ़िल्म में ख़ान ने एक दिल के मरीज़ का किरदार निभाया जो मरने से पहले अपने चारों ओर ख़ुशियाँ फैलाना चाहता है और इस अदाकारी के लिये उन्हें सराहा भी गया।[32]
२००४ ख़ान के लिये एक और महत्वपूर्ण वर्ष रहा। इस साल की उनकी पहली फ़िल्म थी फ़राह ख़ान निर्देशित मैं हूँ ना, जो ख़ान द्वारा सह-निर्मित भी थी। यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़़िस पर एक बड़ी हिट सिद्ध हुई। उनकी अगली फ़िल्म थी यश चोपड़ा कृत वीर-ज़ारा, जो उस साल की सबसे कामयाब फ़िल्म थी और जिसमे ख़ान को अपने अभिनय के लिये कई अवार्ड और बहुत प्रशंसा मिली।[उद्धरण चाहिए] उनकी तीसरी फ़िल्म थी आशुतोष गोवारिकर निर्देशित स्वदेश, जो दर्शकों को सिनेमा-घरों में लाने में तोह सफल ना हो सकी लेकिन उसमें ख़ान के भारत लौटे एक अप्रवासी भारतीय की भूमिका को सराहा गया और ख़ान ने अपना छठवाँ फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार जीता।[33]
सन २००५ में उनकी एकमात्र फ़िल्म पहेली (जो की अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित थी) बॉक्स ऑफ़़िस पर असफल रही हालांकि उसमें ख़ान के अभिनय को सराहा गया|[34] २००६ में ख़ान एक बार फिर करण जोहर की फ़िल्म कभी अलविदा ना कहना में देखे गये जो एक अतिनाटकीय फ़िल्म थी। इस फ़िल्म ने भारत में तो सफलता प्राप्त की ही, साथ ही साथ यह विदेश में सबसे सफल हिन्दी फ़िल्म भी बन गई।[35] उसी वर्ष ख़ान ने १९७८ की हिट फ़िल्म डॉन की रीमेक डॉन में भी अभिनय किया जो एक बड़ी हिट सिद्ध हुई।[36]
२००७ में ख़ान की दो फ़िल्में आई है - चक दे! इंडिया और ओम शांति ओम। चक दे! इंडिया में ख़ान भारतीय महिला हॉकी टीम के कोच के किरदार में नज़र आते हैं जिनका लक्ष्य है भारत को विश्व कप दिलवाना। इस किरदार की लिये ख़ान को समीक्षकों से तो ख़ासी प्रशंसा मिली ही है साथ ही साथ यह फ़िल्म एक विशाल हिट भी सिद्ध हुई है।[37] २००७ की दूसरी फ़िल्म ओम शांति ओम में भी नज़र आए ये फराह ख़ान की शाहरुख़ ख़ान के साथ दूसरी फ़िल्म है। इसमें ख़ान ने दोहरी भूमिका निभाई। पहला किरदार ओम एक जूनियर कलाकार है और एक हादसे में मारा जाता है और दूसरा एक नामी अभिनेता ओम कपूर है। ये फ़िल्म भी २००७ की एक सफल फ़िल्म थी।
फ़िल्मी जीवन
शाहरुख़ ख़ान ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत टेलीविज़न से की। उनका पहला अभिनय लेख टंडन द्वारा निर्देशित दूरदर्शन धारावाहिक दिल दरिया (1988) में हुआ था, हालाँकि निर्माण में विलंब के कारण इसका प्रसारण बाद में हुआ। परिणामस्वरूप, 1989 में प्रसारित राजकुमार कपूर द्वारा निर्देशित धारावाहिक फौजी को उनका पहला प्रसारित टेलीविज़न कार्यक्रम माना जाता है।[38] इसके बाद उन्होंने सर्कस (1989) जैसे अन्य टेलीविज़न धारावाहिकों में भी अभिनय किया।
1992 में शाहरुख़ ख़ान ने हिंदी सिनेमा में पदार्पण किया। इसी वर्ष उनकी चार फ़िल्में प्रदर्शित हुईं—
- दीवाना
- दिल आशना है
- चमत्कार
- राजू बन गया जेंटलमैन
इनमें से दीवाना व्यावसायिक रूप से सफल रही और इसके लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेता पुरस्कार से सम्मानित किया गया।[39]
1990 के दशक के मध्य में शाहरुख़ ख़ान ने बाज़ीगर (1993), डर (1993) और अंजाम जैसी फ़िल्मों में नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं, जिससे उन्हें आलोचकों और दर्शकों दोनों का ध्यान मिला। इसके पश्चात् दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे (1995), कुछ कुछ होता है (1998) और कभी ख़ुशी कभी ग़म (2001) जैसी फ़िल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं में स्थापित किया।[40]
प्रारंभिक पारिश्रमिक
शाहरुख़ ख़ान की शुरुआती फ़िल्मों में से एक दिल आशना है के लिए उन्हें लगभग ₹50,000 पारिश्रमिक मिला था। इस तथ्य का उल्लेख विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और साक्षात्कारों में किया गया है।[41]
मीडिया में
ख़ान को भारत में काफी मात्रा में मीडिया कवरेज मिलता है, और अक्सर उन्हें "किंग ख़ान", "बॉलीवुड का बादशाह", या "बॉलीवुड का किंग" कहा जाता है। अनुपमा चोपड़ा उन्हें "सदैव उपस्थित सेलिब्रिटी" के रूप में उद्धृत करती हैं, जिनके पास साल में दो या तीन फ़िल्में होती हैं, लगातार चल रहे टीवी विज्ञापन, प्रिंट विज्ञापन, और भारतीय शहरों की सड़कों पर विशाल होर्डिंग्स होते हैं।[42] वह कभी-कभी कट्टर फॉलोइंग के विषय होते हैं, जिनकी फैन बेस की संख्या एक अरब से अधिक होने का अनुमान है।[43] न्यूज़वीक ने 2008 में ख़ान को उनके ग्लोबली 50 सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक नामित किया और उन्हें "दुनिया के सबसे बड़े मूवी स्टार" के रूप में संदर्भित किया।[44][45] 2011 में, स्टीवन ज़ेइटचिक ने उन्हें "दुनिया का सबसे बड़ा मूवी स्टार, अवधि" के रूप में वर्णित किया और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स ने भी उन्हें दुनिया के सबसे बड़े मूवी स्टार के रूप में बुलाया। एक लोकप्रियता सर्वेक्षण के अनुसार, दुनिया भर में 3.2 अरब लोग ख़ान को जानते हैं, जो कि टॉम क्रूज़ को जानने वालों की संख्या से अधिक है। 2022 में एंपायर पत्रिका द्वारा किए गए पाठकों के पोल में, ख़ान को सभी समय के 50 सबसे महान अभिनेताओं में सूचीबद्ध किया गया। पत्रिका ने उनके सफलता का श्रेय "उनकी अपार करिश्मा और उनकी कला पर पूर्ण नियंत्रण" को दिया। 2023 में, टाइम पत्रिका ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में से एक नामित किया, और पाठकों के पोल के अनुसार वह सूची में शीर्ष पर रहे।
ख़ान भारत के सबसे अमीर सेलिब्रिटीज में से एक हैं, और 2012, 2013 और 2015 में फोर्ब्स इंडिया की "सेलिब्रिटी 100 लिस्ट" में शीर्ष स्थान पर रहे। उनकी संपत्ति का अनुमान 400–600 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच लगाया गया है। ख़ान के पास भारत और विदेशों में कई संपत्तियां हैं, जिसमें लंदन में 20 मिलियन पाउंड का अपार्टमेंट और दुबई में पाम जुमेरा पर एक विला शामिल है।[46]
ख़ान अक्सर भारत में सबसे लोकप्रिय, स्टाइलिश और प्रभावशाली लोगों की सूचियों में दिखाई देते हैं। वह द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की भारत के 50 सबसे वांछनीय पुरुषों की सूची में नियमित रूप से शीर्ष दस में रहे हैं, और 2007 के पोल में, पत्रिका ईस्टर्न आई ने उन्हें एशिया का सबसे सेक्सी आदमी नामित किया। ख़ान को अक्सर मीडिया संगठनों द्वारा "ब्रांड SRK" कहा जाता है क्योंकि वह कई ब्रांड एंडोर्समेंट और उद्यमिता में संलग्न हैं। वह बॉलीवुड के सबसे अधिक भुगतान पाने वाले एंडोर्सर्स में से एक हैं और टेलीविजन विज्ञापन में सबसे प्रमुख सेलिब्रिटीज में से एक हैं, जिनका टेलीविजन विज्ञापन बाजार में छह प्रतिशत तक का हिस्सा है। ख़ान ने पेप्सी, नोकिया, हुंडई, डिश टीवी, डी'डेकोर, लक्स और टैग हेयूर जैसे ब्रांड्स का एंडोर्समेंट किया है। उनके बारे में किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, और उनकी लोकप्रियता को कई गैर-काल्पनिक फ़िल्मों में दस्तावेजित किया गया है, जिसमें दो-भागों वाली डॉक्यूमेंट्री "द इनर और आउटर वर्ल्ड ऑफ़ शाह रुख़ ख़ान" (2005) और डिस्कवरी ट्रैवल & लिविंग चैनल की दस-भागों वाली मिनी-सीरीज़ "लिविंग विद अ सुपरस्टार—शाह रुख़ ख़ान" (2010) शामिल हैं। 2007 में, ख़ान लंदन के मैडम तुसाद म्यूजियम में अपनी मोम की प्रतिमा स्थापित करने वाले तीसरे भारतीय अभिनेता बने, पहले ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन के बाद। प्रतिमा के अतिरिक्त संस्करण मैडम तुसाद के लॉस एंजेल्स, हांगकांग, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन के म्यूजियम में स्थापित किए गए।[47]
ख़ान विभिन्न सरकारी अभियानों के ब्रांड एंबेसडर रहे हैं, जिसमें पल्स पोलियो और नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन शामिल हैं। वह भारत में मेक-ए-विश फाउंडेशन के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स के सदस्य हैं, और 2011 में उन्हें यूएनओपीएस द्वारा वाटर सप्लाई और सैनिटेशन कोलैबोरेटिव काउंसिल का पहला ग्लोबल एंबेसडर नियुक्त किया गया। उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य और उचित पोषण को बढ़ावा देने वाले कई सार्वजनिक सेवा घोषणाएं रिकॉर्ड की हैं, और भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय और यूनिसेफ के साथ मिलकर एक राष्ट्रीय बाल इम्यूनाइजेशन अभियान में शामिल हुए। 2011 में, उन्हें बच्चों के लिए शिक्षा प्रदान करने की उनकी चैरिटेबल प्रतिबद्धता के लिए यूनेस्को का पिरामिड कॉन मार्नी पुरस्कार मिला, और वह यह सम्मान प्राप्त करने वाले पहले भारतीय बने। 2014 में, ख़ान इंटरपोल के अभियान "टर्न बैक क्राइम" के एंबेसडर बने। 2015 में, ख़ान को एडिनबर्ग विश्वविद्यालय, स्कॉटलैंड से एक विशिष्ट डिग्री प्राप्त हुई। 2018 में, विश्व आर्थिक मंच ने उन्हें भारत में बच्चों और महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने में उनके नेतृत्व के लिए उनके वार्षिक क्रिस्टल पुरस्कार से सम्मानित किया।[48][49]
अक्टूबर 2019 में, ख़ान ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा महात्मा गांधी को उनकी 150वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए लॉन्च किए गए वीडियो में फीचर किया। इस वीडियो की पूर्वावलोकन 20 अक्टूबर 2019 को पीएमओ में हुई, जिसमें ख़ान, आमिर ख़ान, कंगना रनौत, राजकुमार हिरानी, जैकलीन फर्नांडीज, सोनम कपूर, एकता कपूर, वरुण शर्मा, जैकी श्रॉफ, इम्तियाज अली, सोनू निगम, कपिल शर्मा, और कई अन्य प्रमुख हस्तियों ने भाग लिया। ख़ान की विशिष्ट आवाज़ और आदतों ने कई अनुकरणकर्ताओं और आवाज़ अभिनेताओं को प्रेरित किया है। हिंदी-डब्ड कार्टून श्रृंखला "ऑगी एंड द कॉक्रोचेस" के संस्करण में, सौरव चक्रवर्ती ने चरित्र ऑगी के लिए ख़ान की आवाज़ का अनुकरण किया।[50]
अप्रैल 2020 में, ख़ान ने भारत सरकार और महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और दिल्ली की राज्य सरकारों को COVID-19 महामारी से निपटने और लॉकडाउन से प्रभावित हज़ारों ग़रीब लोगों और दैनिक वेतन श्रमिकों के लिए राहत उपायों की मदद करने के लिए कई पहलों की घोषणा की। उन्होंने अपने 4-मंजिला व्यक्तिगत कार्यालय की जगह को Brihanmumbai Municipal Corporation को कोरोनावायरस रोगियों के लिए एक क्वारंटाइन केंद्र के रूप में उपयोग करने के लिए पेश किया।[51]
शाहरुख़ ख़ान के विचार
- “जब तक मेरे पास सपने हैं, तब तक मैं जीवित हूं।”
- “सपने सच होते हैं, पर उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।”
- “जब लोग आपको कहते हैं कि आप नहीं कर सकते, तब आप कर सकते हैं।”
- “हमेशा अपने दिल की सुनो, क्योंकि दिल कभी झूठ नहीं बोलता।”
- “सफलता और असफलता दोनों जीवन के हिस्से हैं, दोनों ही स्थायी नहीं होते।”
और पढ़ें
नामांकन और पुरस्कार
- 2011 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - माइ नेम इज़ ख़ान
- 2007 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - चक दे! इंडिया
- 2005 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - स्वदेश
- 2003 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - देवदास
- 1999 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - कुछ कुछ होता है
- 1998 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - दिल तो पागल है
- 1996 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे
- 1994 - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार - बाज़ीगर
ग्रंथसूची
- Bharat, Meenakshi; Kumar, Nirmal (27 April 2012). Filming the Line of Control: The Indo-Pak Relationship Through the Cinematic Lens. Routledge. ISBN 978-1-136-51605-4. 26 जून 2019 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 6 नवंबर 2018.
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- Bose, Derek (1 January 2006). Everybody Wants a Hit: 10 Mantras of Success in Bollywood Cinema. Jaico Publishing House. ISBN 978-81-7992-558-4. 30 दिसंबर 2016 को मूल से पुरालेखित. अभिगमन तिथि: 6 नवंबर 2018.
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