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Spirituality and social reform

शिरडी साईं बाबा

शिरडी साईं बाबा

शिरडी के साईं बाबा (28 सितम्बर 1838 - 15 अक्टूबर 1918), [2] जिन्हें शिरडी साईं बाबा के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु और फकीर थे, जिन्हें एक संत माना जाता था, [3] उनके जीवनकाल के दौरान और उसके बाद हिंदू और मुस्लिम दोनों भक्त उनका सम्मान करते थे।

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दयानन्द सरस्वती

दयानन्द सरस्वती

महर्षि दयानन्द सरस्वती (1824-1883) आधुनिक भारत के चिन्तक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम 'मूलशंकर' था। 'वेदों की ओर लौटो' यह उनका ही दिया हुआ प्रमुख नारा था । उन्होंने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म तथा सन्यास को अपने दर्शन के स्तम्भ बनाये। उन्होंने ही सबसे पहले १८७६ में 'स्वराज्य' का नारा दिया। [1] बाद में लोकमान्य तिलक ने इसे आगे बढ़ाया। प्रथम जनगणना के समय स्वामी जी ने आगरा से देश के सभी आर्यसमाजों को यह निर्देश भिजवाया कि सब सदस्य अपना धर्म 'सनातन धर्म' लिखवाएं।

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चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु (१८ फरवरी, १४८६-१५३४) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है। यह भी कहा जाता है, कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक…

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मध्वाचार्य

मध्वाचार्य

कृपया ध्यान दें कि मध्वाचार्य , माधवाचार्य विद्यारण्य तथा माधवाचार्य दोनों से भिन्न हैं।

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ज्ञानेश्वर

ज्ञानेश्वर

संत ज्ञानेश्वर महाराष्ट्र तेरहवीं सदी के एक महान सन्त थे। इन्होंने ज्ञानेश्वरी की रचना की। संत ज्ञानेश्वर की गणना भारत के महान संतों एवं मराठी कवियों में होती है। ये संत नामदेव के समकालीन थे और उनके साथ इन्होंने पूरे महाराष्ट्र का भ्रमण कर लोगों को ज्ञान-भक्ति से परिचित कराया और समता, समभाव का उपदेश दिया। वे महाराष्ट्र-संस्कृति के 'आद्य-प्रवर्तकों' में भी माने जाते हैं। शिष्य - साचीदानंद महाराज

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संत तुकाराम

संत तुकाराम

तुकाराम (1598/1608 – 1649/1650) 17वीं शताब्दी के एक महान संत कवि थे जो भारत में लंबे समय तक चले भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ थे।

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रविदास

रविदास

रविदास भारत के मध्यकाल के एक संत कवि थे। 'रविदसिया पंथ' गुरु रविदास की शिक्षाओं पर आधारित पन्थ है। इन्होंने जात-पात का घोर खंडन किया और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया। वे जूता बनाने का कार्य करते थे। गुरु ग्रन्थ साहिब मे इनके 41 पद हैं जो इनके ही 16 रागों मे संकलित हैं।

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मीरा बाई

मीरा बाई

"मीराबाई का जन्म का नाम जसोदा था और उनके बचपन का नाम प्रेमल था, क्योंकि बचपन में उनकी सहेलियाँ उन्हें प्रेमल कहकर पुकारती थीं।"

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तुलसीदास

तुलसीदास

रामबोला दुबे ( हिन्दुस्तानी उच्चारण: [rɑːmboːlɑː d̪ʊbeː]; 11 अगस्त 1497 — 30 अगस्त 1623), गोस्वामी तुलसीदास ( संस्कृत उच्चारण : [goːsʋɑːmiː t̪ulɐsiːd̪ɑːsɐ]) के नाम से प्रसिद्ध; मध्यकालीन हिन्दी साहित्य के महान रामभक्त इव कवि थे। उन्होने रामचरितमानस और हनुमान चालीसा जैसे विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की है। इन्हें आदिकाव्य रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है।

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कबीर

कबीर

कबीरदास या कबीर, कबीर साहेब 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे। [2] उनका जन्म 1398 में काशी में माना जाता है। [3]

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गुरु गोबिन्द सिंह

गुरु गोबिन्द सिंह

गुरु गोबिन्द सिंह जी (जन्म: पौषशुक्ल सप्तमी संवत् 1723 विक्रमी तदनुसार 22 दिसम्बर 1666- 7 अक्टूबर 1708 ) सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। श्री गुरू तेग बहादुर जी के बलिदान के उपरान्त 11 नवम्बर सन् 1675 को 10 वें गुरू बने। आप एक महान योद्धा, चिन्तक, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन् 1699 में बैसाखी के दिन उन्होंने खालसा पंथ (पन्थ) की स्थापना की जो सिखों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।

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गुरु नानक

गुरु नानक

नानक (पंजाबी: ਨਾਨਕ) (15अप्रैल 1469 राय भोई की तलवंडी – 22 सितंबर 1539) सिखों के प्रथम (आदि ) गुरु हैं। [2] इनके अनुयायी इन्हें नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से सम्बोधित करते हैं। नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबन्धु - सभी के गुण समेटे हुए थे। इनका जन्म स्थान गुरुद्वारा ननकाना साहिब पाकिस्तान में और समाधि स्थल करतारपुर साहिब भी अब पाकिस्तान में स्थित है। [3]

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महावीर

महावीर

भगवान महावीर (Mahāvīra) जैन धर्म के चौंबीसवें (24वें) तीर्थंकर थे। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार वर्ष पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली गणराज्य के क्षत्रियकुंड में क्षत्रिय परिवार हुआ था। तीस वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्मकल्याण के पथ पर निकल गये। 12 वर्षो की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ जिसके पश्चात् उन्होंने समवशरण में ज्ञान प्रसारित किया। 72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी के कई अनुयायी बने जिसमें उस समय के प्रमुख राजा बिम्बिसार, कुणिक और चेटक भी शामिल थ…

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गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध

गौतम बुद्ध (जन्म ५६३ ईसा पूर्व – निर्वाण ४८३ ईसा पूर्व) एक श्रमण थे जिनकी शिक्षाओं पर बौद्ध धर्म का प्रचलन हुआ। [2]

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आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य

आचार्य शंकर भारतीय महान् दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक और योगी थे। उन्होंने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। भगवद्गीता, उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इन की टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने सांख्यदर्शन का प्रधानकारणवाद और मीमांसा दर्शन के ज्ञान कर्म समुच्चयवाद का खण्डन किया।

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रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत, आध्यात्मिक गुरु एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।

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स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द

स्वामी विवेकानन्द (बंगाली: স্বামী বিবেকানন্দ; 12 जनवरी 1863 – 4 जुलाई 1902), जन्म नाम नरेन्द्रनाथ दत्त , वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें दो मिनट का समय दिया गया था किन्तु उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण का आरम्भ "मेरे अमेरिकी बहनों एवं भाइयों" के साथ करने के लिये जाना जाता है। [5] उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

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