| दूरभाष कोड | 02992 |
|---|
| पिन कोड | 345 001 |
|---|
| समय मण्डल | आइएसटी ( UTC+5:30 ) |
|---|
| • क्षेत्रीय | मारवाड़ी भाषा , राजस्थानी |
|---|
| • अतिरिक्त आधिकारिक | अंग्रेजी |
|---|
| • आधिकारिक | हिंदी |
|---|
| • शहर | 65,471 |
|---|
| ऊँचाई | 225 मी॰ (738 फीट) |
|---|
| • नगरीय | 62.38 kमी 2 (24.09 वर्ग मील) |
|---|
| वाहन पंजीकरण | RJ-15 |
|---|
| • सभा | जैसलमेर नगर परिषद |
|---|
| नाम स्रोत | रावल जैसल |
|---|
| संस्थापक | रावल जैसल |
|---|
| स्थापना | 1156 ; 870 वर्ष पूर्व ( 1156 ) |
|---|
| ज़िला | जैसलमेर |
|---|
| राज्य | राजस्थान |
|---|
| देश | भारत |
|---|
| • प्रणाली | नगर परिषद |
|---|
| वेबसाइट | Jaisalmer Municipal Council Jaisalmer District |
|---|
जैसलमेर, उत्तर-पश्चिमी भारतीय राज्य राजस्थान का एक शहर है, जो राज्य की राजधानी जयपुर से 575 किलोमीटर (357 मील) पश्चिम में थार मरुस्थल के केंद्र में स्थित है। यह जैसलमेर जिले के प्रशासनिक मुख्यालय के रूप में कार्य करता है। यह एक पूर्व मध्ययुगीन व्यापारिक केंद्र और जैसलमेर राज्य की ऐतिहासिक राजधानी है, जिसकी स्थापना 1156 ई. में भाटी वंश के मेर शासक रावल जैसल द्वारा की गई थी।[5]
जैसलमेर रावल जैसल मेर के वंशजों ने यहाँ भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक बिना वंश क्रम को भंग किए हुए ७७० वर्ष सतत शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है। जैसलमेर राज्य ने भारत के इतिहास के कई कालों को देखा व सहा है। सल्तनत काल के लगभग वर्ष के इतिहास में गुजरता हुआ यह राज्य मुगल साम्राज्य में भी लगभग ३०० वर्षों तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सक्षम रहा। भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना से लेकर समाप्ति तक भी इस राज्य ने अपने वंश गौरव व महत्व को यथावत रखा। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात यह भारतीय गणतंत्र में विलीन हो गया। भारतीय गणतंत्र के विलीनकरण के समय इसका भौगोलिक क्षेत्रफल १६,०६२ वर्ग मील के विस्तृत भू-भाग पर फैला हुआ था। रेगिस्तान की विषम परिस्थितियों में स्थित होने के कारण यहाँ की जनसंख्या बींसवीं सदी के प्रारंभ में मात्र ७६,२५५ थी।[6]
जैसलमेर जिले का भू-भाग प्राचीन काल में ’माडधरा’ अथवा ’वल्लभमण्डल’ के नाम से प्रसिद्ध था। महाभारत के युद्ध के बाद बड़ी संख्या में चन्द्रवंशी मेर इस ओर अग्रसर हुए व यहाँ आ कर बस गये। यहाँ अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच बनाए गए थे।[7]
जैसलमेर राज्य भारत के पश्चिम भाग में स्थित थार के रेगिस्तान के दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र में फैला हुआ था। मानचित्र में जैसलमेर राज्य की स्थिति २०००१ से २०००२ उत्तरी अक्षांश व ६९०२९ से ७२०२० पूर्व देशांतर है। परंतु इतिहास के घटनाक्रम के अनुसार उसकी सीमाएँ सदैव घटती बढ़ती रहती थी। जिसके अनुसार राज्य का क्षेत्रफल भी कभी कम या ज्यादा होता रहता था। जैसलमेर का क्षेत्र थार के रेगिस्तान में स्थित है। यहाँ दूर-दूर तक स्थाई व अस्थाई रेत के ऊंचे-ऊंचे टीले हैं, जो कि हवा, आंधियों के साथ-साथ अपना स्थान भी बदलते रहते हैं। इन्हीं रेतीले टीलों के मध्य कहीं-कहीं पर पथरीले पठार व पहाड़ियाँ भी स्थित हैं। इस संपूर्ण इलाके का ढाल सिंध नदी व कच्छ के रण अर्थात् पश्चिम-दक्षिण की ओर है।
भूमि जैसलमेर राज्य का संपूर्ण भाग रेतीला व पथरीला होने के कारण यहाँ का तापमान मई-जून में अधिकतम 47 सेंटीग्रेड तथा दिसम्बर-जनवरी में न्यूनतम 5 सेंटीग्रेड रहता है। यहाँ संपूर्ण प्रदेश में जल का कोई स्थाई स्रोत नहीं है। वर्षा होने पर कई स्थानों पर वर्षा का मीठा जल एकत्र हो जाता है। यहाँ अधिकांश कुंओं का जल खारा है तथा वर्षा का एकत्र किया हुआ जल ही एकमात्र पानी का साधन है।
जनवरी-मार्च तक यहां ठंड पड़ती है और तापमान शून्य डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। अप्रैल-जून तक यह धूप रहती है और औसत तापमान 45 डिग्री सेल्सियस रहता है। इस मौसम में जब मध्याह्न में सूर्य सिर पर होता है और उसकी किरणों थार के रेगिस्तान पर पड़ती है तो सुनहरी रेत को देख ऐसा लगता है मानो चहुंओर सोने के कण बिखरे पड़े हों। ऐसे मनमोहक दृश्य का आनंद लेने के लिए पर्यटक भीषण गर्मी की भी परवाह नहीं करते और यहां घुमक्कड़ी करते फिरते हैं। अक्टूबर से दिसंबर तक मानसून और ठंड के बीच के मौसम में यहां आप ठंड और बारिश दोनों तरह के मौसम का आनंद उठा सकते हैं।[8]
भारत की जनगणना 2011 द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, जैसलमेर नगर पालिका की जनसंख्या 65,471 है, जिसमें 36,432 पुरुष हैं, जबकि 29,039 महिलाएं हैं। 2024 में जैसलमेर नगर पालिका की वर्तमान अनुमानित जनसंख्या लगभग 91,000 है। [9]
सँकरी गलियों वाले जैसलमेर के ऊँचे-ऊँचे भव्य आलीशान भवन और हवेलियाँ सैलानियों को मध्यकालीन राजशाही की याद दिलाती हैं। शहर इतने छोटे क्षेत्र में फैला है कि सैलानी यहाँ पैदल घूमते हुए मरुभूमि के इस सुनहरे मुकुट को निहार सकते हैं। माना जाता है कि जैसलमेर की स्थापना भाटी , राव जैसल ने 12 वीं शताब्दी में की थी। इतिहास की दृष्टि से देखें तो जैसलमेर शहर पर खिलजी, राठौर, मुगल, तुगलक आदि ने कई बार आक्रमण किया था। इसके बावजूद जैसलमेर के शाही भवन राजपूत शैली के सच्चे द्योतक हैं
जैसलमेर राज्य भारत के मानचित्र में ऐसे स्थल पर स्थित है जहाँ इसका इतिहास में एक विशिष्ट महत्व है। भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमा पर इस राज्य का विस्तृत क्षेत्रफल होने के कारण अरबों तथा तुर्की के प्रारंभिक हमलों को यहाँ के शासकों ने न केवल सहन किया वरन दृढ़ता के साथ उन्हें पीछे धकेलकर शेष राजस्थान, गुजरात तथा मध्य भारत को इन बाहरी आक्रमणों से सदियों तक सुरक्षित रखा। राजस्थान के दो राजपूत राज्य, मेवाइ और जैसलमेर अनय राज्यों से प्राचीन माने जाते हैं, जहाँ एक ही वंश का लम्बे समय तक शासन रहा है। हालाँकि मेवाड़ के इतिहास की तुलना में जैसलमेर राज्य की ख्याति बहुत कम हुई है, इसका मुख्य कारण यह है कि मुगल-काल में बी जहाँ मेवाड़ के महाराणाओं की स्वाधीनता बनी रही वहीं जैसलमेर के महारावलों द्वारा अन्य शासक की भाँती मुगलों से मेलजोल कर लिया जो अंत तक चलता रहा। आर्थिक क्षेत्र में भी यह राज्य एक साधारण आय वाला
पिछड़ा क्षेत्र रहा जिसके कारण यहाँ के शासक कभी शक्तिशाली सैन्य बल संगठित नहीं कर सके। फलस्वरुप इसके पड़ौसी राज्यों ने इसके विस्तृत भू-भाग को दबा कर नए राज्यों का संगठन कर लिया जिनमें बीकानेर, खैरपुर, मीरपुर, बहावलपुर एवं शिकारपुर आदि राज्य हैं। जैसलमेर के इतिहास के साथ प्राचीन यदुवंश तथा मथुरा के राजा यदु वंश के वंशजों का सिंध, पंजाब, राजस्थान के भू-भाग में पलायन और कई राज्यों की स्थापना आदि के अनेकानेक ऐतिहासिक व सांस्कृतिक प्रसंग जुड़े हुए हैं।
सदियों तक आवागमन के सुगम साधनों के आभाव में यह राज्य देश के अनय प्रांतों से लगभग कटा सा रहा। इस कारण बाहर के लोगों के जैसलमेर के बारे में बहुत कम जानकारी रही है। सामान्यत: लोगों की कल्पना में यह स्थान धूल व आँधियों से घिरा रेगिस्तान मात्र है। परंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है, इतिहास एवं काल के थपेड़े खाते हुए भी यहाँ प्राचीन, संस्कृति, कला, परंपरा व इतिहास अपने मूल रूप में विधमान रहा तथा यहाँ के रेत के कण-कण में पिछले आठ सौ वर्षों के इतिहास की गाथाएँ भरी हुई हैं। जैसलमेर राज्य ने मूल भारतीय संस्कृति, लोक शैली, सामाजिक मान्यताएँ, निर्माणकला, संगीतकला, साहित्य, स्थापत्य आदि के मूलरुपंण बनाए रखा।
जैसलमेर राज्य की स्थापना भारतीय इतिहास के मध्यकाल के आरंभ में ११७८ई. के लगभग यदुवंशी भाटी के वंशज रावल-जैसल के द्वारा किया गया। भाटी मूलत: इस प्रदेश के निवासी नहीं थे। यह अपनी जाति की उत्पत्ति मथुरा व द्वारिका के यदुवंशी इतिहास पुरुष कृष्ण से मानती है। कृष्ण के उपरांत द्वारिका के जलमग्न होने के कारण कुछ बचे हुए यदु लोग जाबुलिस्तान, गजनी, काबुल व लाहौर के आस-पास के क्षेत्रों में फैल गए थे। कहाँ इन लोगों ने बाहुबल से अच्छी ख्याति अर्जित की थी, परंतु मद्य एशिया से आने वाले तुर्क आक्रमणकारियों के सामने ये ज्यादा नहीं ठहर सके व लाहौर होते हुए पंजाब की ओर अग्रसर होते हुए भटनेर नामक स्थान पर अपना राज्य स्थापित किया। उस समय इस भू-भाग पर स्थानीय जातियों का प्रभाव था। अत: ये भटनेर से पुन: अग्रसर होकर सिंध मुल्तान की ओर बढ़े। अन्तोगत्वा मुमणवाह, मारोठ, तपोट, देरावर आदि स्थानों पर अपने मुकाम करते हुए थार के रेगिस्तान स्थित परमारों (लोधा) के क्षेत्र में लोद्रवा(लोधा) नामक शहर के शासक को पराजित यहाँ अपनी राजधानी स्थापित की थी। इस भू-भाग में स्थित स्थानीय जातियों जिनमें परमार, बराह, लंगा, भूटा, तथा सोलंकी आदि प्रमुख थे। इनसे सतत संघर्ष के उपरांत भाटी लोग इस भू-भाग को अपने आधीन कर सके थे। वस्तुत: भाटियों के इतिहास का यह संपूर्ण काल सत्ता के लिए संघर्ष का काल नहीं था वरन अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष था, जिसमें ये लोग सफल हो गए।
जैसलमेर के सांस्कृतिक इतिहास में यहाँ के स्थापत्य कला का अलग ही महत्व है। किसी भी स्थान विशेष पर पाए जाने वाले स्थापत्य से वहां रहने वालों के चिंतन, विचार, विश्वास एवं बौद्धिक कल्पनाशीलता का आभास होता है। जैसलमेर में स्थापत्य कला का क्रम राज्य की स्थापना के साथ दुर्ग निर्माण से आरंभ हुआ, जो निरंतर चलता रहा। यहां के स्थापत्य को राजकीय तथा व्यक्तिगत दोनो का सतत् प्रश्रय मिलता रहा। इस क्षेत्र के स्थापत्य की अभिव्यक्ति यहां के किलों, गढियों, राजभवनों, मंदिरों, हवेलियों, जलाशयों, छतरियों व जन-साधारण के प्रयोग में लाये जाने वाले मकानों आदि से होती है।
जैसलमेर राज्य में हर २०-३० किलोमीटर के फासले पर छोटे-छोटे दुर्ग दृष्टिगोचर होते हैं, ये दुर्ग विगत १००० वर्षो के इतिहास के मूक गवाह हैं। मध्ययुगीन इतिहास में इनका परम महत्व था। ये राजनैतिक आवश्यकतानुसार निर्मित कराए जाते थे। दुर्ग निर्माण में सुंदरता के स्थान पर मजबूती तथा सुरक्षा को ध्यान में रखा जाता था। परंतु यहां के दुर्ग मजबूती के साथ-साथ सुंदरता को भी ध्यान मं रखकर बनाया गया था। दुर्गो में एक ही मुख्य द्वारा रखने के परंपरा रही है। दुर्ग मुख्यतः पत्थरों द्वारा निर्मित हैं, परंतु किशनगढ़, शाहगढ़ आदि दुर्ग इसके अपवाद हैं। ये दुर्ग पक्की ईंटों के बने हैं। प्रत्येक दुर्ग में चार या इससे अधिक बुर्ज बनाए जाते थे। ये दुर्ग को मजबूती, सुंदरता व सामरिक महत्व प्रदान करते थे।
जैसलमेर दुर्ग, नगर व आस-पास के क्षेत्र मं स्थित ऊँचे शिखरों, भव्य गुंबदों वाले जैन मंदिरों का स्थापत्य कला की दृष्टि से बङा महत्व है। जैसलमेर स्थिर जैन मंदिर में जगती, गर्भगृह, मुख्यमंडप, गूढ़मंडप, रंगमंडन, स्तंभ व शिखर आदि में गुजरात के सोलंकी व बधेल कालीन मंदिरों का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
जैसलमेर जिले का भू-भाग प्राचीन काल में ’माडधरा’ अथवा ’वल्लभमण्डल’ के नाम से प्रसिद्ध था। इतिहास के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात् यादवों का मथुरा से काफी संख्या में बहिर्गमन हुआ। ये राजस्थान एवं गुजरात की ओर अग्रसर हुए। जैसलमेर के भूतपूर्व शासकों के पूर्वज जो अपने को भगवान कृष्ण के वंशज मानते हैं, संभवतः छठी शताब्दी में जैसलमेर के भूभाग पर आ बसे थे। इस जिले में यादवों के वंशज भाटी राजपूतों की प्रथम राजधानी तनोट, दूसरी लौद्रवा तथा तीसरी जैसलमेर में रही। राजस्थान के प्रसिद्ध मरू शहर जैसलमेर की स्थापना 1156 ई. में भाटी राजा जैसल ने की थी। जैसलमेर, जिले का प्रमुख नगर हैं जो नक्काशीदार हवेलियों, गलियों, प्राचीन जैन मंदिरों, मेलों और उत्सवों के लिये प्रसिद्ध हैं। निकट ही सम गाँव में रेत के टीलों का पर्यटन की दृष्टि से विशेष महत्व हैं। यहाँ का सोनार किला राजस्थान के श्रेष्ठ धान्वन दुर्गों में माना जाता हैं।[10]
जैसलमेर के किले का निर्माण 1156 में किया गया था और यह राजस्थान का दूसरा सबसे पुराना राज्य है। ढाई सौ फीट ऊंचा और सेंट स्टोन के विशाल खण्डों से निर्मित 30 फीट ऊंची दीवार वाले इस किले में 99 प्राचीर हैं, जिनमें से 92 का निर्माण 1633 और 1647 के बीच कराया गया था। इस किले के अंदर मौजूद कुंए पानी का निरंतर स्रोत प्रदान करते हैं। रावल जैसल द्वारा निर्मित यह किला जो 80 मीटर ऊंची त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है, इसमें महलों की बाहरी दीवारें, घर और मंदिर कोमल पीले सेंट स्टोन से बने हैं। इसकी संकरी गलियां और चार विशाल प्रवेश द्वार है जिनमें से अंतिम एक द्वार मुख्य चौक की ओर जाता है जिस पर महाराज का पुराना महल है। इस कस्बे की लगभग एक चौथाई आबादी इसी किले के अंदर रहती है। यहां गणेश पोल, सूरज पोल, भूत पोल और हवा पोल के जरिए पहुंचा जा सकता है। यहां अनेक सुंदर हवेलियां और जैन मंदिरों के समूह हैं जो 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच बनाए गए थे।[7]
चित्रकला की दृष्टि से जैसलमेर का विशिष्ट स्थान रहा है। भारत के पश्चिम थार मरुस्थल क्षेत्र में विस्तृत यह राज्य यहाँ दूर तक मरु के टीलों का विस्तार है, वहीं कला संसार का खजाना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। प्राचीन काल से ही व्यापारिक स्वर्णिम मार्ग के केन्द्र में होने के कारण जैसलमेर ऐश्वर्य, धर्म एवं सांस्कृतिक अवदान के लिए प्रसिद्ध रहा है। जैसलमेर में स्थित सोनार किला, चिन्तामणि पार्श्वनाथ जैन मंदिर (१४०२-१४१६ ई.), सम्भवनाथ जैन मंदिर (१४३६-१४४० ई.), शांतिनाथ कुन्थनाथ जैन मंदिर (१४८० ई.), चन्द्रप्रभु जैन मंदिर तथा अनेक वैषण्व मंदिर धर्म के साथ-साथ कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। १८वीं-१९वीं शताब्दी में बनी जैसलमेर की प्रसिद्ध हवेलियाँ तो स्थापत्य कला की बेजोड़ मिसाल है। इन हवेलियों में बने भित्ति चित्र काफी सुंदर हैं। सालिम सिंह मेहता की हवेली, पटवों की हवेली, नथमल की हवेली तथा किले के प्रासाद और बादल महल आदि ने जैसलमेर की कलात्मदाय को आज संसार भर में प्रसिद्ध कर दिया है।
जैसलमेर में बोली मुख्यतः राजस्थान के मारवा क्षेत्र में बोली जाने वाली मारवाड़ी का एक भाग ही है। परन्तु जैसलमेर क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा थली या थार के रेगिस्तान की भाषा है। इसका स्वरुप राज्य के विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न है। उदाहरण स्वरुप लखा,म्याजलार के इलाके में मालानी घाट व भाषाओं का मिश्रण बोला जाता है। परगना सम, सहागढ़ व घोटाडू की भाषा में थाट, व सिंधी भाषा का मिश्रण बोल-चाल की भाषा है। विसनगढ़,खुहड़ी, नाचणा आदि परगनों में जो बहावलपुर, सिंध से संलग्न है, माङ, बीकानेरी व सिंधी भाषा का मिश्रण है। इसी प्रकार धायसर, लाठी, पोकरण, फलौदी के क्षेत्र में घाट व मांड भाषा का मिश्रण है। राजस्थान राजधानी में बोली जाने वाली इन सभी बोलियों का मिश्रण है, जो घाट, माङ, सिंधी, मालाणी, पंजाबी, गुजराती भाषा का सुंदर मिश्रण है।
मरु संस्कृति का प्रतीक जैसलमेर कला व साहित्य का केन्द्र रहा है। उसने हमारी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में एक प्रहरी का कार्य किया है। जैन श्र१ति की विक्रम संवत् १५०० खतर गच्छाचार्य जिन भद्रसूरि का निर्देशानुसार व जैसलमेर के महारावल चाचगदेव के समय गुजरात स्थल पारण से जैन ग्रंथों का बहुत बङा भण्डारा जैसलमेर दुर्ग में स्थानान्तरित किया गया था। अन्य जन श्रुति के अनुसार यह संग्रह चंद्रावलि नामक नगर का मुस्लिम आक्रमण में पूर्णत- ध्वस्त होने पर सुरक्षित स्थान की तलाश में यहाँ लाया गया था। इस विशाल संग्रह को अनेक जैन मुनि, धर्माचार्यों, श्रावकों एवं विदुषी साध्वियों द्वारा समय-समय पर अपनी उत्कृष्ट रचनाओं द्वारा बढ़ाया गया। यहाँ रचे गए अधिकांश ग्रंथों पर तत्कालीन शासकों के नाम, वंश, समय आदि का वर्णन किया गया है। यहां रखे हुए ग्रंथों की कुल संख्या २६८३ है, जिसमें ४२६ ता पत्र लिखें हैं। यहां तांपत्र पर उपलब्ध प्राचीनतम ग्रंथ विक्रम संवत् १११७ का है। तथा हाथ से बने कागज पर हस्तलिखित ग्रंथ विक्रम संवत् १२७० का है। इन ग्रंथों की भाषा प्राकृत, मागधी, संस्कृत, अपभ्रंश तथा ब्रज है। यहाँ पर जैन ग्रंथों के अलावा कुछ जैनत्तर साहित्य की भी रचना हुई, जिनमें काव्य, व्याकरण, नाटक, श्रृंगार, सांख्य, मीमांशा, न्याय, विषशास्र, आर्युवेद, योग इत्यादि कई विषयों पर उत्कृष्ट रचनाओं का प्रमुख स्थान है।
लोक संगीत की दृष्टि से जैसलमेर क्षेत्र का एक विशिष्ट स्थान रहा है। यहाँ पर प्राचीन समय से मा राग गाया जाता रहा है, जो इस क्षेत्र का पर्यायवाची भी कहा जा सकता है। यहाँ के जनमानस ने इस शुष्क भू-ध्रा पर मन को बहलाने हेतु अत्यंत ही सरस व भावप्रद गीतों की रचना की। इन गीतों में लोक गाथाओं, कथाओं, पहेली, सुभाषित काव्य के साथ-साथ वर्षा, सावन तथा अन्य मौसम, पशु-पक्षी व सामाजिक संबंधों की भावनाओं से ओतप्रोत हैं। लोकगीत के जानकारों व विशेषज्ञों के मतों के अनुसार जैसलमेर के लोकगीत बहुत प्राचीन, परंपरागत और विशुद्ध है, जो बंधे-बंधाये रूप में अद्यपर्यन्त गाए जाते हैं।
भारतवर्ष की भूमि सदैव से धर्म प्रधान रही है, यहाँ पर धर्म के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जैसलमेर राज्य का विस्तार भू-भाग भी इस भावना से मुक्त नहीं रहा। इस क्षेत्र के सर्वप्रथम राव तणू द्वारा तणोट नामक स्थान बसाने तथा वहाँ देवी का मंदिर का मंदिर बनाने का उल्लेख प्राप्त होता है। यह देवी का मंदिर आज भी विद्यमान है, जैसलमेर में विभिन्न संप्रदायों के प्रति बहुत आस्था रही है, इनमें राम स्नेही, नाथपंथ तथा वल्लभ संप्रदाय प्रमुख हैं। महारावल अमरसिंह के समय रामानंदी पंथ के महंत हरिवंशगिरि ने अमरसिंह को अपने चमत्कारों प्रसन्न किया व रावल देवराज के समय से राज्स में किसी अन्य पंथ के प्रवेश पर लगी रोक को हटवाया तथा स्थान-स्थान पर रामद्वारों की स्थापना कराई।
यहाँ जैन धर्म की श्वेताम्बर शाखा ने इतनी अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की थी कि कालांतर में श्वेताम्बर पंथी जैन समाज के लिये जैसलंमेर एक तीर्थ स्थल बन गया।
जैसलमेर राज्य में प्रारंभ से ही इस्लाम धर्म मानने वाले लोगों का अस्तित्व रहा है, इस क्षेत्र में पाये जाने वाले इस्लाम धर्म के अनुयायी अधिकांशतः स्थानीय जातियों द्वारा बलात् इस्लाम धर्म स्वीकृत करने वालों में से है।
- Bhati, Hari Singh. 2002. ANNALS OF JAISALMER: A Pre-Mediaeval History. Kavi Prakashan, Bikaner.
- Gahlot, Sukhvirsingh. 1992. RAJASTHAN: Historical & Cultural. J. S. Gahlot Research Institute, Jodhpur.
- Somani, Ram Vallabh. 1993. History of Rajasthan. Jain Pustak Mandir, Jaipur.
- Tod, James & Crooke, William. 1829. Annals & Antiquities of Rajasthan or the Central and Western Rajput States of India. 3 Vols. Reprint: Low Price Publications, Delhi. 1990. ISBN 81-85395-68-3 (set of 3 vols.)
- Bhati, Hari Singh. 2002. ANNALS OF JAISALMER: A Pre-Mediaeval History. Kavi Prakashan, Bikaner.
- Gahlot, Sukhvirsingh. 1992. RAJASTHAN: Historical & Cultural. J. S. Gahlot Research Institute, Jodhpur.
- Somani, Ram Vallabh. 1993. History of Rajasthan. Jain Pustak Mandir, Jaipur.
- Tod, James & Crooke, William. 1829. Annals & Antiquities of Rajasthan or the Central and Western Rajput States of India. 3 Vols. Reprint: Low Price Publications, Delhi. 1990. ISBN 81-85395-68-3 (set of 3 vols.)
जैसलमेर नगर का विकास १५ वीं शताब्दी से प्रारंभ होता है। जब जैसलमेर दुर्ग में आवासीय कठिनाईयाँ प्रतीत हुई, तो कुछ लोगों ने किले की तलहटी में स्थायी आवास बनाकर रहना प्रारंभ कर दिया। बहुत कम ही ऐसे नगर होते हैं, जिनका अपना स्थापत्य होता है। जैसलमेर भी उनमें से एक है।
इस काल में जैसलमेर शासकों का मुगलों से संपर्क हुआ व उनके संबंध सदैव सौहार्दपूर्ण बने रहने से राज्य में शांति बनी रही। इसी कारण यहाँ पर व्यापार-वाणिज्य की गतिविधियाँ धीरे-धीरे बढ़ने लगी। महेश्वरी, ओसवाल, पालीवाल व अन्य लोग आसपास की रियासतों से यहां आकर बसने लगे व कालांतर में यहीं बस गए। इन लोगों के बसने के लिए अपनी-अपनी गोत्र के हिसाब से मौहल्ले बना लिए। आमने-सामने के मकानों से निर्मित २० से १०० मकानों के मुहल्ले, सीधी सड़क या गलियों का निमार्ण हुआ और ये गलियाँ एक दूसरे से जुड़ती चली गयीं। इस प्रकार वर्तमान नगर का निर्माण हुआ।
ये सगोत्रीय, सधर्म या व्यवसायी मौहल्ले पाड़ा या मौहल्ले कहलाते थे व इन्हें व्यावसाय के नाम से पुकारते हैं। जैसे बीसाना पाड़ा, पतुरियों का मुहल्ला तथा चूड़ीगर अलग-अलग व्यावसायियों के अलग-अलग मौहल्लों में रहने से यहाँ प्रत्येक मोहल्ले में पृथक-पृथक बाजारों का प्रादुर्भाव हुआ।
नगर के पूर्णरुपेण विकसित होने पर उसकी सुरक्षा हेतु आय भी आवश्यक प्रतीत होने लगे। फलस्वरुप महारावल अखैसिंह ने १७४० ई. के लगभग नगर के परकोटे का निर्माण करवाया, जो महारावल मूलराज द्वितीय के काल में संपन्न हुआ। इस शहर दीवार में प्रवेश हेतु चार दरवाजे हैं, जो पोल कहलाती है। इन्हें गड़ीसर पोल, अमरसागर पोल, मल्कापोल व भैरोपोल के नाम से पुकारा जाता है। ये दरवाजे मुगल स्थापत्य कला से काफी प्रभावित है। इनमें बड़ी-बड़ी नुकीली कीलों से युक्त लकड़ी के दरवाजे लगे हैं, जिनमें आपातकालीन खिड़कियाँ बनी हैं। अठारहवीं सदी के आते-आते नगर में बढ़ती हुई व्यापारिक समृद्धि के कारण व्यापारी, सामंत व प्रशासनिक वर्ग बहुत धन संपन्न हो गया। फलस्वरुप १९ वीं सदी के आरंभ तक यहां इन लोगों ने आवास हेतु बड़ी-बड़ी हवेलियों, बाड़ी मंदिर आदि का निर्माण करवाना शुरु कर दिया।
जैसलमेर दुर्ग स्थापत्य कला की दृष्टि से उच्चकोटि की विशुद्ध स्थानीय दुर्ग रचना है। ये दुर्ग २५० फीट तिकोनाकार पहांी पर स्थित है। इस पहांी की लंबाई १५० फीट व चौङाई ७५० फीट है।
रावल जैसल ने अपनी स्वतंत्र राजधानी स्थापित की थी। स्थानीय स्रोतों के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण ११५६ ई. में प्रारंभ हुआ था। परंतु समकालीन साक्ष्यों के अध्ययन से पता चलता है कि इसका निर्माण कार्य ११७८ ई. के लगभग प्रारंभ हुआ था। ५ वर्ष के अल्प निर्माण कार्य के उपरांत रावल जैसल की मृत्यु हो गयी, इसके द्वारा प्रारंभ कराए गए निमार्ण कार्य को उसके उत्तराधिकारी शालीवाहन द्वारा जारी रखकर दुर्ग को मूर्त रूप दिया गया। रावल जैसल व शालीवाहन द्वारा कराए गए कार्यो का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं मिलता है। मात्र ख्यातों व तवारीखों से वर्णन मिलता है।
हवेलियों में मुख्यतः तीन हवेलियां प्रमुख हैं। पटुओं की हवेली, दीवान सालिमसिंह की हवेली व दीवान नाथमल की हवेली। कला की दृष्टि से पटुओं की हवेली व नाथमल की हवेली। कला की दृष्टि से पटुओं की हवेली व नाथमल हवेली स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है। वहीं दीवान सालिम सिंह की हवेली अपनी विशालता व भव्यता के लिए प्रसिद्ध है। ये सभी हवेलियाँ स्थानीय पीले रेतीले पत्थर से बनी है। यह पत्थर खुदाई के काम के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। इसे घिसने पर यह अत्यधिक चिकना व चमकीला हो जाता है। किसी भी हवेली के भीतर-बाहर से गुजरते हुए और विगत की परतें बिखेरते हुए लगता है, जैसे आत्म साक्ष्य हो रहा हो, किसी ने सुहाकगया पीले ओढ़ने की वेहराई आँखों की खिड़की से कहीं झांक-झांक लिया हो या स्वर्धिम धूप की आँगने की परिक्रमा लगाते हुए दपंण ने पलका-सा मार दिया हो अथवा आंखों में अमलतास उग आए हों और सूखी-पपड़ाई सी सोनल रेत में पीले पहाड़ बन गए हों।
यहाँ के लगभग सभी भवन पीले, कलात्मक झरोखों से युक्त, पीली चादर में लिपटे मनोहारी और दृष्टि बांधने वाले। भवनों की बेजोड़ शिल्पकला को देखकर दर्शक की दृष्टियाँ चकित रह जाती हैं।
मुगल सत्ता के पराभव के उपरांत सिंध, गुजरात व मालवा की ओर से कई हिंदु व मुस्लिम कलाकार यहाँ आकर बसने लगे तथा उन्होंने इन हवेलियों का निर्माण किया। किंतु यदि ये कारीगर गुजरात व मालवा की ओर से आए होते तो अपनी कला के कुछ मौलिक उदाहरण अवश्य मिलते, जो कि नहीं मिलते हैं। परंतु जैसलमेर राज्य से लगे सिंध प्रांत में स्थानीय कला के ढेरों उदाहरण प्राप्त होते हैं, जो कि सिंध नदी को पार करते हुए बलूचिस्तान की सीमा तक प्राप्त होते हैं। अतः संभव है कि यहाँ पर की गई नक्काशी के लिए कारीगर सिंध प्रांत से जैसलमेर की ओर आए होंगे। संभवतः लकड़ी के काम के लिए कलाकार मालवा व गुजरात से आए होंगे, क्योंकि ये दोनों ही प्रांत इस कार्य हेतु प्रसिद्ध हैं।
छियासठ झरोखों से युक्त ये हवेलियाँ निसंदेह कला का सर्वेतम उदाहरण है। ये कुल मिलाकर पाँच हैं, जो कि एक-दूसरे से सटी हुई हैं। ये हवेलियाँ भूमि से ८-१० फीट ऊँचे चबूतरे पर बनी हुई है व जमीन से ऊपर छः मंजिल है व भूमि के अंदर एक मंजिल होने से कुल ७ मंजिली हैं। पाँचों हवेलियों के अग्रभाग बारीक नक्काशी व विविध प्रकार की कलाकृतियाँ युक्त खिंकियों, छज्जों व रेलिंग से अलंकृत है। जिसके कारण ये हवेलियाँ अत्यंत भव्य व कलात्मक दृष्टि से अत्यंत सुंदर व सुरम्य लगती है। हवेलियों में प्रवेश करने हुतु सीढियाँ चढ़कर चबूतरे तक पहुँचकर दीवान खाने (मेहराबदार बरामदा) में प्रवेश करना पड़ता है। दीवान खाने से लकंी की चौखट युक्त दरवाजे से अंदर प्रवेश करने पर प्रथम करमे को मौ प्रथम कहा जाता है। इसके बाद चौकोर चौक है, जिसके चारों ओर बरामदा व छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं। ये कमरे ६'x ६' से ८' के आकार के हैं, ये कमरे प्रथम तल की भांति ही ६ मंजिल तक बने हैं। सभी कमरें पत्थरों की सुंदर खानों वाली अलमारियों व आलों ये युक्त हैं, जिसमें विशिष्ट प्रकार के चूल युक्त लकंी के दरवाजे व ताला लगाने हेतु लोहे के कुंदे लगे हैं। प्रथम तल के कमरे रसोइ, भण्डारण, पानी भरने आदि के कार्य में लाए जाते थे, जबकि अन्य मंजिलें आवासीय होती थ। दीवान खानें के ऊपर मुख्य मार्ग की ओर का कमरा अपेक्षाकृत बङा है, जो सुंदर सोने की कलम की नक्काशी युक्त लकंी की सुंदर छतों से सुसज्जित है। यह कमरा मोल कहलाता है, जो विशिष्ट बैठक के रूप में प्रयुक्त होता है।
प्रवेश द्वारो, कमरों और मेडियों के दरवाजे पर सुंदर खुदाई का काम किया गया है। इन हवेलियों में सोने की कलम की वित्रकारी, हाथी दांत की सजावट आदि देखने को मिलती है। शयन कक्ष रंग बिरंगे विविध वित्रों, बेल-बूटों, पशु-पक्षियों की आकृतियों से युक्त है। हवेलियों में चूने का प्रयोग बहुत कम किया गया है। अधिकांशतः खाँचा बनाकर एक दूसरे को पिघले हुए शीशे से लोहे की पत्तियों द्वारा जोङा गया है। भवन की बाहरी व भीतरी दीवारें भी प्रस्तर खंडों की न होकर पत्थर के बंे-बंे आयताकार लगभग ३-४ इंच मोटे पाटों (स्लैब) को एक दूसरे पर खांचा देकर बनाई गई है, जो उस काल की उच्च कोटि के स्थापत्य कला का प्रदर्शन करती हैं।
पटवों की हवेलियाँ अट्ठारवीं शताब्दी से सेठ पटवों द्वारा बनवाई गई थीं। वे पटवे नहीं, पटवा की उपाधि से अलंकृत रहे। उनका सिंध-बलोचिस्तान, कोचीन एवं पश्चिम एशिया के देशों में व्यापार था और धन कमाकर वे जैसलमेर आए थे। कलाविद् एवं कलाप्रिय होने के कारण उन्होने अपनी मनोभावना को भवनों और मंदिरों के निर्माण में अभिव्यक्त किया। पटुवों की हवेलियाँ भवन निर्माण के क्षेत्र में अनूठा एवं अग्रगामी प्रयास है।
सालिम सिंह की हवेली छह मंजिली इमारत है, जो नीचे से संकरी और ऊपर से निकलती-सी स्थात्य कला का प्रतीक है। जहाजनुमा इस विशाल भवन आकर्षक खिंकियाँ, झरोखे तथा द्वार हैं। नक्काशी यहाँ के शिल्पियों की कलाप्रियता का खुला प्रदर्शन है। इस हवेली का निर्माण दीवान सालिम सिंह द्वारा करवाया गया, जो एक प्रभावशाली व्यक्ति था और उसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था।
दीवान मेहता सालिम सिंह की हवेली उनके पुस्तैनी निवास के ऊपर निर्मित कराई गई थ। हवेली की सर्वोच्च मंजिल जो भूमि से लगभग ८० फीट की उँचाई पर है, मोती महल कहलाता है। कहा जाता है कि मोतीमहिल के ऊपर लकंी की दो मंजिल और भी थी, जिनमें कांच व चित्रकला का काम किया गया था। जिस कारण वे कांचमहल व रंगमहल कहलाते थे, उन्हें सालिम सिंह की मृत्यु के बाद राजकोप के कारण उतरवा दिया गया। इस हवेली की कुल क्षेत्रफल २५० x ८० फीट है। इसके चारों ओर अंतालीस झरोखे व खिंकियाँ है। इन झरोखों तथा खिंकियों पर अलग-अलग कलाकृति उत्कीर्ण हैं। इनपर बनी हुई जालियाँ पारदर्शी हैं। इन जालियों में फूल-पत्तियाँ, बेलबूटे तथा नाचते हुए मोर की आकृति उत्कीर्ण है। हवेली की भीतरी भाग में मोती-महल में जो ४-५ वीं मंजिल पर है, स्थित फव्वारा आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। सोने की कलम से किए गए छतों व दीवारों पर चित्रकला के अवशेष आज भी उत्कृष्ट कला को प्रदर्शित करते हैं। इन प शिला पर कई जैन धर्म से संबंधित कथाएँ चिहृन, तंत्र व तीर्थकर व मंदिर आदि उत्कीर्ण है। प शिला पर उत्कीर्ण लेख के अनुसार इसका निर्माण काल १५१८ विक्रम संवत् है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर भी विभित्र प्रकार की मूर्तियों का रुपांकन हुआ है। इस मंदिर के जाम क्षेत्र में काम मुद्राओं से युक्त मिथुन प्रतिमाओं का अंकन भी मिलता है। ये मूर्ति कला की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस मंदिर के ऊँचे शिखर के साथ-साथ अनेक लघु शिखर जिन्हें अंग शिखर कहा जाता है, भी चारों ओर क्रम से फैले हुए हैं। ये लघु शिखर देखने में मनोहारी प्रतीत होते हैं।
जैसलमेर में दीवन मेहता नाथमल की हवेली का कोई जबाव नहीं है। यह हवेली दीवान नाथमल द्वारा बनवाई गई है तथा यह कुल पाँच मंजिली पीले पत्थर से निर्मित है। इस हवेली का निर्माण काल १८८४-८५ ई. है। हवेली में सुक्ष्म खुदाई मेहराबों से युक्त खिंकियों, घुमावदार खिंकियाँ तथा हवेली के अग्रभाग में की गई पत्थर की नक्काशी पत्थर के काम की दृष्टि से अनुपम है। इस अनुपम काया कृति के निर्माणकर्त्ता हाथी व लालू उपनाम के दो मुस्लिम कारीगर थे। ये दोनों उस समय के प्रसिद्व शिल्पकार थे। हवेली का निर्माण आधा-आधा भाग दोनों शिल्पकारों को इस शर्त के साथ बराबर सौंपा गया था कि दोनों आपस में किसी की कलाकृति की नकल नहीं करेंगे, साथ ही किसी कलाकृति की पुनरावृत्ति नहीं करेंगे। इस बात का दोनों ने पालन करते हुए इसका निर्माण पूर्ण किया। आज जब इस हवेली को दूर से देखते हैं, तो यह पूरी कलाकृति एक सी नजर आती है, परंतु यदि ध्यान से देखा जाए तो हवेली के अग्रभाग के मध्य केंद्र से दोनों ओर की कलाकृतियाँ सूक्ष्म भित्रता लिए हुए हैं, जो दो शिल्पकारों की अमर कृति दर्शाती हैं। हवेली का कार्य ऐसा संतुलित व सुक्ष्मता लिए हुए है कि लगता ही नहीं दो शिल्पकार रहें हों।
हवेली ७-८ फुट उँचे चबूतरे पर बनी है। एक चट्टान को काट कर इस भवन का निचला भाग बनाया गया है। इस चबूतरे तक पहुँचने हेतु चौडी सीढियाँ हैं व दोनों ओर दीवान खाने बने हैं। चबूतरे के छो पर एक पत्थर से निर्मित दो अलंकृत हाथियों की प्रतिमाएँ है। हवेली के विशाल द्वार से अंदर प्रवेश करने पर चौङा दालान आता है। दालान के चारों ओर विशाल बरामदे बने हैं। जिनके पीछे आवासीय कमरे बने हैं। द्वितीय तल पर संक की ओर मुख्य द्वार के ऊपर विशाल मोल बना हुआ है, जो कई प्रकार के चित्रों व त्रिकला से सुसज्जित है। इसकी छत लकंी के परंपरागत छत के स्थान पर पत्थर के छोटे-छोटे समतल टुकङों को सुंदर काआर देकर केन्द्र में सुंदर फूल बनाकर चारों ओर पंखुंयों का आभास देते हैं, को जमाकर बनाया गया है। इस विशाल कक्ष में किसी प्रकार की कमानी या बीम आदि का संबंध नहीं किया गया है। यह तत्कालीन स्थापत्य कला का उत्रत उदाहरण है। हवेली में पत्थर की खुदाई के छज्जे, छावणे, स्तंभों, मौकियों, चापों, झरोखों, कंवलों, तिबरियों पर फूल, पत्तियां, पशु-पक्षियों का बङा ही मनमोहक आकृतियां बनी हैं। कुछ नई आकृतियां जैसे स्टीम इंजन, सैनिक, साईकल, उत्कृष्ट नक्काशी युक्त घोंे, हाथी आदि उत्कीर्ण है। यहाँ तक की पानी की निकासी हेतु नालियों भी शिल्पकारों की छेनियों से अछूती नहीं रही है।
पार्श्वनाथ मंदिर के नजदीक में स्थित इस मंदिर का स्थापत्य पार्श्वनाथ मंदिर के अनुरुप ही है। यह मंदिर अपने उत्कृष्ट नक्काशी तथा स्थापत्य की अन्य कलाओं के कारण प्रसिद्ध है।
संभवनाथ मंदिर में मंदिर का रंग मंडप की गुंबदनुमा छत स्थापत्य में दिलवाङा के जैन मंदिर के अनुरुप है। इसके मध्य भाम में झूलता हुआ कमल है, जिसके चारों ओर गोलाकार आकार में बाहर अप्सराओं की कलाकृतियाँ हैं। अप्सराओं के नीचे के हिस्से में गंद्धर्व की मूर्तियँ उत्कीर्ण है। अप्सराओं के मध्य में पदमासन् मुद्राओं में जो प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं, जिनके नीचे हंस बने हैं, गुंबद का अन्य भाग पच्चीकारी से युक्त है। इस मंदिर में कुल मिलाकर ६०४ प्रतिमाएँ हैं, जिनमें से एक जौ के आकार का मंदिर है, जिसमें तिल के बराबर जैन प्रतिमा है, जो कि उस समय की उत्रत स्थापत्य कला को दर्शाता है। इस मंदिर का निर्माण सन् १३२० ई. में शिवराज महिराज एवं लखन नाम का ओसवाल जाति के व्यक्तियों ने कराया था तथा मंदिर के वास्तुकार का नाम शिवदेव था।
इस मंदिर के भू-गर्भ में दुर्लभ पुस्तकों का भंडार है, जो ता पत्र भोज पत्र, रेशम तथा हाथ के बने हुए कागज पर लिखा गया है। इस भंडार में प्रमुख रुपेण जैन धर्म साहित्य है, परंतु अन्य विषय कला, संगीत, ज्योतिष, औषधि, काम, अर्थ आदि विषयों पर भी प्रचुर मात्रा में है। इस भंडार में प्राचीनतम ग्रंथ १०६० ई. का है।
चंद्रप्रभू मंदिर तीन मंजिला है तथा रणकपुर जैन मंदिर की तरह है। स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर १३ वीं १४ वीं शताब्दी का बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह पहले हिंदु मंदिर था जिसे बाद में १५ वीं शताब्दी में जैन मंदिर में तब्दील कर दिया गया। यह तथ्य मंदिर के निचले भाग की उत्कृष्ट कला को प्रदर्शित करते हैं।
भवन निर्माण में स्थापत्य की विशिष्टता जैसलमेर में हवेली तक ही सीमित नहीं है, पूरा जैसलमेर ही जालियों व झरोखों का नगर है। यहाँ ऐसा कोई मोहल्ला या गली नहीं है, जिसमें ऐसा घर हो कि किसी ने किसी प्रकार की शिल्पकला का प्रदर्शन न किया हो। मकानों के बाहरी भाग व भीतरी भाग थोंी-थोंी भित्रता लिए हुए है, किन्तु उन्हें बनाने की कला में एकरुपता है। मरुस्थल में कला के चरण कहाँ तक पहुँच गए हैं, इसका पता तब लगता है, जब कोई जैसलमेर के छोटे बाजार को पार करके पत्थर के खडंजे की गलियों में पहुँचते हैं। जहाँ दोनो ओर सुंदर विशाल हवेलियाँ झरोखों से झांक कर या खिंकियों की कनखियों से देखकर आगंतुकों का अभिवाद करती हैं।
स्थापत्य का प्रदर्शन राज्य की राजधानी तक ही सीमित नहीं रहा। राज्य के अन्य भागों में भी स्थापत्य कला का सुनियोजित रूप से विकास हुआ था। पालीवाल नामक वाणिज्य करने वाली जाति ने खाभा, काठोंी, कुलधर, बासनीपीर, जैसू राणा, हडडा आदि ग्राम बसाए थे, इनकी रचना बंे कलात्मक ढंग से की गई थी। यहाँ की इमारतें जिनमें मकान, कुँए, छतरियाँ, मंदिर, तालाब, बांध आदि स्थापत्य व कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यद्यपि लगभग २०० वर्ष हुए, यहाँ के निवासी पालीवाल यहाँ से पलायन कर देश के अन्य भागों में बस गए व ये गाँव उज गए, किन्तु खंडहरों में बिखरा स्थापत्य कला के सौंदर्य को आज भी जीवंत रखे हुए है।
संदर्भ / स्रोत
- "स्वर्ण नगरी जैसलमेर में हुआ मरु महोत्सव का आगाज" . Zee News . 7 February 2020 . अभिगमन तिथि: 8 August 2023 . ↗
- "Jaisalmer Municipal Council" . Government of Rajasthan . 10 June 2024. ↗
- "District Census Handbook – Jaisalmer" (PDF) . censusindia.gov.in . अभिगमन तिथि: 11 February 2021 . See page 24 'Jaisalmer (M) – 62.38', the '38,401' figure is for the 'Jaisalmer – District Total' ↗
- "52nd Report of the Commissioner for Linguistic Minorities in India" (PDF) . nclm.nic.in . Ministry of Minority Affairs . pp. 34– 35. मूल से (PDF) से 25 May 2017 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: 22 May 2022 . ↗
- "Jaisalmer Foundation Day: 869 साल का हुआ जैसलमेर, मुगल हो या अंग्रेज कभी नहीं कर सके फतह, पाकिस्तान को दो बार चटाई धूल" . rajasthan.ndtv.in . मूल से से 27 अप्रैल 2025 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: 2025-02-24 . ↗
- "जैसलमेर का परिचय" . प्रेसनोट. pp. ०१. मूल से (पीएचपी) से 25 जून 2009 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: २७ जुलाई २००९ . ↗
- अ आ राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल. "जैसलमेर का किला" (पीएचपीएचटीएमएल) . भारत सरकार. pp. ०१. 26 जुलाई 2009 को मूल से पुरालेखित . अभिगमन तिथि: २७ जुलाई २००९ . ↗
- "सोनार किला का सौंदर्यस्थल (स्वर्ण नगरी जैसलमेर)" . गिट्स्फ़ॉर यू. pp. ०१. मूल से से 17 सितंबर 2010 को पुरालेखित।. ↗
- "Jaisalmer Town Population Census 2011 - 2024" . ↗
- उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; रतन नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
- "स्वर्ण नगरी जैसलमेर में हुआ मरु महोत्सव का आगाज" . Zee News . 7 February 2020 . अभिगमन तिथि: 8 August 2023 . ↗
- "Jaisalmer Municipal Council" . Government of Rajasthan . 10 June 2024. ↗
- "District Census Handbook – Jaisalmer" (PDF) . censusindia.gov.in . अभिगमन तिथि: 11 February 2021 . See page 24 'Jaisalmer (M) – 62.38', the '38,401' figure is for the 'Jaisalmer – District Total' ↗
- "52nd Report of the Commissioner for Linguistic Minorities in India" (PDF) . nclm.nic.in . Ministry of Minority Affairs . pp. 34– 35. मूल से (PDF) से 25 May 2017 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: 22 May 2022 . ↗
- "Jaisalmer Foundation Day: 869 साल का हुआ जैसलमेर, मुगल हो या अंग्रेज कभी नहीं कर सके फतह, पाकिस्तान को दो बार चटाई धूल" . rajasthan.ndtv.in . मूल से से 27 अप्रैल 2025 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: 2025-02-24 . ↗
- "जैसलमेर का परिचय" . प्रेसनोट. pp. ०१. मूल से (पीएचपी) से 25 जून 2009 को पुरालेखित। . अभिगमन तिथि: २७ जुलाई २००९ . ↗
- अ आ राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल. "जैसलमेर का किला" (पीएचपीएचटीएमएल) . भारत सरकार. pp. ०१. 26 जुलाई 2009 को मूल से पुरालेखित . अभिगमन तिथि: २७ जुलाई २००९ . ↗
- "सोनार किला का सौंदर्यस्थल (स्वर्ण नगरी जैसलमेर)" . गिट्स्फ़ॉर यू. pp. ०१. मूल से से 17 सितंबर 2010 को पुरालेखित।. ↗
- "Jaisalmer Town Population Census 2011 - 2024" . ↗
- उद्धरण त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; रतन नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।