| टेलीफोन कोड | +91(565) |
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| पिनकोड | 281 001 |
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| समय मण्डल | भारतीय मानक समय ( UTC+5:30 ) |
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| • उपभाषा | बृजभाषा |
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| • राजकीय | हिंदी |
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| • कुल | 4,41,894 |
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| वाहन पंजीकरण | यूपी-85 |
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| ज़िला | मथुरा ज़िला |
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| राज्य | उत्तर प्रदेश |
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| देश | भारत |
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| वेबसाइट | mathura .nic .in |
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मथुरा (Mathura) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा ज़िले में स्थित एक नगर है। मथुरा ऐतिहासिक रूप से कुषाण राजवंश द्वारा राजधानी के रूप में विकसित नगर है। लोगों की मान्यता है की उससे पूर्व भगवान कृष्ण के समय काल से भी पूर्व अर्थात लगभग 7500 वर्ष से यह नगर अस्तित्व में है। यह धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।
मथुरा भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता का केंद्र रहा है। भारतीय धर्म, दर्शन कला एवं साहित्य के निर्माण तथा विकास में मथुरा का महत्त्वपूर्ण योगदान सदा से रहा है। आज भी महाकवि सूरदास, संगीत के आचार्य स्वामी हरिदास, स्वामी दयानंद के गुरु स्वामी विरजानंद, चैतन्य महाप्रभु आदि से इस नगरी का नाम जुड़ा हुआ है। मथुरा को श्रीकृष्ण जन्म भूमि के नाम से भी जाना जाता है।
मथुरा, भगवान कृष्ण की जन्मस्थली और भारत की प्राचीन नगरी है। हालांकि उत्खनन द्वारा प्राप्त इस नगर का साक्ष्य कुषाण कालीन है। पुराण कथा अनुसार शूरसेन देश की यहाँ राजधानी थी। पौराणिक साहित्य में मथुरा को अनेक नामों से संबोधित किया गया है जैसे- शूरसेन नगरी[1], मधुपुरी, मधुनगरी, मधुरा आदि। भारतवर्ष का वह भाग जो हिमालय और विंध्याचल के बीच में पड़ता है, जो प्राचीनकाल में आर्यावर्त कहलाता था। यह यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। यह आगरा से दिल्ली की ओर और दिल्ली से आगरा की ओर क्रमश: 58 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम एवं 145 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में यमुना के किनारे राष्ट्रीय राजमार्ग 2 पर स्थित है।
वाल्मीकि रामायण में मथुरा को मधुपुर या मधुदानव का नगर कहा गया है तथा यहाँ लवणासुर की राजधानी बताई गई है। इस नगरी को इस प्रसंग में मधुदैत्य द्वारा बसाई, बताया गया है। लवणासुर, जिसको शत्रुघ्न ने युद्ध में हराकर मारा था इसी मधुदानव का पुत्र था। इससे मधुपुरी या मथुरा का रामायण-काल में बसाया जाना सूचित होता है। रामायण में इस नगरी की समृद्धि का वर्णन है। इस नगरी को लवणासुर ने भी सजाया संवारा था। दानव, दैत्य, राक्षस आदि जैसे संबोधन विभिन्न काल में अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुए हैं, कभी जाति या क़बीले के लिए, कभी आर्य अनार्य सन्दर्भ में तो कभी दुष्ट प्रकृति के व्यक्तियों के लिए। प्राचीनकाल से अब तक इस नगर का अस्तित्व अखण्डित रूप से चला आ रहा है।
मथुरा को भगवान कृष्ण की जन्मभूमि के रूप में जाना जाता है। यह शहर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ अनेक प्राचीन मंदिर, घाट और ऐतिहासिक स्थल स्थित हैं।
मथुरा के चारों ओर भगवान शिव के चार प्रमुख मंदिर बताए जाते हैं—पूर्व दिशा में पिपलेश्वर महादेव मंदिर, दक्षिण में रंगेश्वर महादेव मंदिर, उत्तर में गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर और पश्चिम में भूतेश्वर स्थित हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहा जाता है। मथुरा को आदि वाराह भूतेश्वर क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है। वाराह जी की गली में नीलवाराह और श्वेतवाराह के प्राचीन मंदिर स्थित हैं।
मान्यता है कि श्रीकृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने श्री केशवदेव मंदिर की स्थापना कराई थी। बाद में मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर उसके स्थान पर मस्जिद का निर्माण कराया गया। वर्तमान में उसी क्षेत्र के पीछे नया केशवदेव मंदिर स्थित है। प्राचीन स्थल को केशव कटरा कहा जाता है। यहाँ हुई खुदाई में कई ऐतिहासिक वस्तुएँ प्राप्त हुई थीं।
मथुरा के कंकाली टीला को भी महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल माना जाता है। यहाँ कंकाली देवी का मंदिर स्थित है। खुदाई में यहाँ से जैन धर्म से जुड़ी अनेक प्राचीन मूर्तियाँ और अवशेष मिले थे। कुछ मान्यताओं के अनुसार कंकाली देवी को वही देवी माना जाता है जिन्हें कंस ने देवकी की कन्या समझकर मारने का प्रयास किया था।
पोतराकुंड के पास श्रीकृष्ण जन्मभूमि क्षेत्र स्थित है, जहाँ वासुदेव और देवकी की मूर्तियाँ स्थापित हैं। इस क्षेत्र को मल्लपुरा भी कहा जाता है। मान्यता है कि यहाँ प्राचीन समय में कंस के प्रसिद्ध मल्ल चाणूर और मुष्टिक रहते थे।
मथुरा का द्वारकाधीश मंदिर शहर के प्रमुख मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर अपनी सुंदर वास्तुकला और धार्मिक आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है। इसके अलावा गोविंद देव मंदिर, मदनमोहन मंदिर, गोपीनाथ मंदिर, राधेश्याम मंदिर और दाऊजी मंदिर भी श्रद्धालुओं के प्रमुख आकर्षण हैं।
प्रत्येक एकादशी और अक्षय नवमी को मथुरा की परिक्रमा होती है। देवशयनी और देवोत्थापनी एकादशी को मथुरा-गरुड गोविन्द्-वृन्दावन् की एक साथ परिक्रमा की जाती है। यह परिक्र्मा २१ कोसी या तीन वन की भी कही जाती है। वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को रात्रि में परिक्रमा की जाती है, जिसे वनविहार की परिक्रमा कहते हैं। स्थान-स्थान में गाने-बजाने का तथा पदाकन्दा नाटक का भी प्रबंध रहता है। श्री दाऊजी ने द्वारका से आकर, वसन्त ऋतु के दो मास व्रज में बिताकर जो वनविहार किया था तथा उस समय यमुनाजी को खींचा था, यह परिक्रमा उसी की स्मृति है।
भारतवर्ष के सांस्कृतिक और आधात्मिक गौरव की आधारशिलाऐं इसकी सात महापुरियां हैं। 'गरुडपुराण' में इनके नाम इस क्रम से वर्णित हैं - इनमें मथुरा का स्थान अयोध्या के पश्चात अन्य पुरियों के पहिले रखा गया है। पदम पुराण में मथुरा का महत्व सर्वोपरि मानते हुए कहा गया है कि यद्यपि काशी आदि सभी पुरियाँ मोक्ष दायिनी है तथापि मथुरापुरी धन्य है। यह पुरी देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। २ इसी का समर्थन 'गर्गसंहिता' में करते हुए बतलाया गया है कि पुरियों की रानी कृष्णापुरी मथुरा बृजेश्वरी है, तीर्थेश्वरी है, यज्ञ तपोनिधियों की ईश्वरी है यह मोक्ष प्रदायिनी धर्मपुरी मथुरा नमस्कार योग्य है।
ब्रज के प्राचीन संगीतज्ञों की प्रामाणिक जानकारी 16वीं शताब्दी के भक्तिकाल से मिलती है। इस काल में अनेकों संगीतज्ञ वैष्णव संत हुए। संगीत शिरोमणि स्वामी हरिदास जी, इनके गुरु आशुधीर जी तथा उनके शिष्य तानसेन आदि का नाम सर्वविदित है। बैजूबावरा के गुरु भी श्री हरिदास जी कहे जाते हैं, किन्तु बैजू बावरा ने अष्टछाप के कवि संगीतज्ञ गोविन्द स्वामी जी से ही संगीत का अभ्यास किया था। निम्बार्क सम्प्रदाय के श्रीभट्ट जी इसी काल में भक्त, कवि और संगीतज्ञ हुए। अष्टछाप के महासंगीतज्ञ कवि सूरदास, नन्ददास, परमानन्ददास जी आदि भी इसी काल में प्रसिद्ध कीर्तनकार, कवि और गायक हुए, जिनके कीर्तन बल्लभकुल के मन्दिरों में गाये जाते हैं। स्वामी हरिदास जी ने ही वस्तुत: ब्रज–संगीत के ध्रुपद–धमार की गायकी और रास–नृत्य की परम्परा चलाई।
मथुरा में संगीत का प्रचलन बहुत पुराना है, बांसुरी ब्रज का प्रमुख वाद्य यंत्र है। भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी को जन–जन जानता है और इसी को लेकर उन्हें 'मुरलीधर' और 'वंशीधर' आदि नामों से पुकारा जाता है। वर्तमान में भी ब्रज के लोक संगीत में ढोल मृदंग, झांझ, मंजीरा, ढप, नगाड़ा, पखावज, एकतारा आदि वाद्य यंत्रों का प्रचलन है। 16 वीं शती से मथुरा में रास के वर्तमान रूप का प्रारम्भ हुआ। यहाँ सबसे पहले बल्लभाचार्य जी ने स्वामी हरदेव के सहयोग से विश्रांत घाट पर रास किया। रास ब्रज की अनोखी देन है, जिसमें संगीत के गीत गद्य तथा नृत्य का समिश्रण है। ब्रज के साहित्य के सांस्कृतिक एवं कलात्मक जीवन को रास बड़ी सुन्दरता से अभिव्यक्त करता है। अष्टछाप के कवियों के समय ब्रज में संगीत की मधुरधारा प्रवाहित हुई। सूरदास, नन्ददास, कृष्णदास आदि स्वयं गायक थे। इन कवियों ने अपनी रचनाओं में विविध प्रकार के गीतों का अपार भण्डार भर दिया। स्वामी हरिदास संगीत शास्त्र के प्रकाण्ड आचार्य एवं गायक थे। तानसेन जैसे प्रसिद्ध संगीतज्ञ भी उनके शिष्य थे। सम्राट अकबर भी स्वामी जी के मधुर संगीत- गीतों को सुनने का लोभ संवरण न कर सका और इसके लिए भेष बदलकर उन्हें सुनने वृन्दावन आया करता था। मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, गोवर्धन लम्बे समय तक संगीत के केन्द्र बने रहे और यहाँ दूर से संगीत कला सीखने आते रहे।
ब्रज में अनेकानेक गायन शैलियां प्रचलित हैं और रसिया ब्रज की प्राचीनतम गायकी कला है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से सम्बन्धित पद, रसिया आदि गायकी के साथ रासलीला का आयोजन होता है। श्रावण मास में महिलाओं द्वारा झूला झूलते समय गायी जाने वाली मल्हार गायकी का प्रादुर्भाव ब्रज से ही है। लोकसंगीत में रसिया, ढोला, आल्हा, लावणी, चौबोला, बहल–तबील, भगत आदि संगीत भी समय –समय पर सुनने को मिलता है। इसके अतिरिक्त ऋतु गीत, घरेलू गीत, सांस्कृतिक गीत समय–समय पर विभिन्न वर्गों में गाये जाते हैं।
यहाँ स्थापत्य तथा मूर्ति कला के विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण युग कुषाण काल के प्रारम्भ से गुप्त काल के अन्त तक रहा। यद्यपि इसके बाद भी ये कलायें 12वीं शती के अन्त तक जारी रहीं। इसके बाद लगभग 350 वर्षों तक मथुरा कला का प्रवाह अवरूद्ध रहा, पर 16वीं शती से कला का पुनरूत्थान साहित्य, संगीत तथा चित्रकला के रूप में दिखाई पड़ने लगता है।
ब्रज में बारह वन ब्रज के वन हैं जो कि द्वादश वन के नाम से प्रसिद्ध हैं।
- मथुरा संग्रहालय
- कृष्ण जन्म भूमि
- द्वारकाधीश मंदिर
दर्शनीय स्थल (मथुरा से वृन्दावन की ओर)[संपादित करें]
- बाँकेबिहारी मंदिर
- श्री गरुड् गोविन्द मन्दिर, शाडान्ग वन (छटीकरा)
- शांतिकुंज
- बिडला मंदिर
- राधावल्लभ मंदिर राधावल्लभ मंदिर
दर्शनीय स्थल (मथुरा से गोकुल की ओर)[संपादित करें]
- ठकुरानी घाट
- नवनीतप्रिया जी का मंदिर
- रमण रेती
- ८४ खम्बे
- बल्देव
- बह्मांड घाट महावन
- चिंताहरण महादेव महावन
दर्शनीय स्थल (मथुरा से गोवर्धन की ओर)[संपादित करें]
- गोवर्धन
- जतीपुरा
- बरसाना
- नंदगाँव
- कामवन
- लोहवन
- कोकिलावन
मथुरा रेलवे स्टेशन काफ़ी व्यस्त जंक्शन है और दिल्ली से दक्षिण भारत या मुम्बई जाने वाली सभी ट्रेने मथुरा होकर गुजरती हैं। सडक द्वारा भी पहुंचा जा सकता है। आगरा से मात्र 55 किलोमीटर तथा खैर से मात्र 50 किलोमीटर है। वृन्दावन पहुचने के लिये यह वृन्दावन की वेबसाईट काफी सूचना देती हे| स्टेशन के आसपास कई होटल हैं और विश्राम घाट के आसपास कई कमखर्च वाली धर्मशालाएं रूकने के लिए उपलब्ध हैं। घूमने के लिए टेक्सी कर सकते हैं, जिससे मथुरा, वृन्दावन एक दिन में घूमा जा सकता है। अधिकतर मंदिरों में दर्शन सुबह १२ बजे तक और सांय ४ से ६-७ बजे तक खुलते हैं, दर्शनार्थियों को इसी हिसाब से अपना कार्यक्रम बनाना चाहिए। आटो और तांगे भी उपलब्ध है। यमुना में नौका विहार और प्रातःकाल और सांयकाल में विश्राम घाट पर होने वाली यमुना जी की आरती दर्शनीय है। गोकुल की ओर जाने के लिये आधा दिन और लगेगा, उसके बाद गोवर्धन के लिये निकल सकते हैं। गोवर्धन के लिये बस से उपलब्ध है। राधाष्टमी का उत्सव वृन्दावन में धूम से मनाया जाता हे |
श्रीकृष्ण राधा और गोपियों–ग्वालों के बीच की होली के रूप में गुलाल, रंग केसर की पिचकारी से ख़ूब खेलते हैं। होली का आरम्भ फाल्गुन शुक्ल 9 बरसाना से होता है। वहां की लट्ठमार होली होली जग प्रसिद्ध है। दसवीं को ऐसी ही होली नन्दगांव में होती है। इसी के साथ पूरे ब्रज में होली की धूम मचती है। धूलेंड़ी को प्राय: होली पूर्ण हो जाती है, इसके बाद हुरंगे चलते हैं, जिनमें महिलायें रंगों के साथ लाठियों, कोड़ों आदि से पुरुषों को घेरती हैं। बरसाना और नंदगाँव की लठमार होली तो जगप्रसिद्ध है। 'नंदगाँव के कुँवर कन्हैया, बरसाने की गोरी रे रसिया' और ‘बरसाने में आई जइयो बुलाए गई राधा प्यारी’ गीतों के साथ ही ब्रज की होली की मस्ती शुरू होती है। वैसे तो होली पूरे भारत में मनाई जाती है लेकिन ब्रज की होली ख़ास मस्ती भरी होती है। वजह ये कि इसे कृष्ण और राधा के प्रेम से जोड़ कर देखा जाता है। उत्तर भारत के ब्रज क्षेत्र में बसंत पंचमी से ही होली का चालीस दिवसीय उत्सव आरंभ हो जाता है। नंदगाँव एवं बरसाने से ही होली की विशेष उमंग जाग्रत होती है। जब नंदगाँव के गोप गोपियों पर रंग डालते, तो नंदगांव की गोपियां उन्हें ऐसा करनेसे रोकती थीं और न माननेपर लाठी मारना शुरू करती थीं। होली की टोलियों में नंदगाँव के पुरुष होते हैं, क्योंकि कृष्ण यहीं के थे और बरसाने की महिलाएं, क्योंकि राधा बरसाने की थीं। दिलचस्प बात ये होती है कि ये होली बाकी भारत में खेली जाने वाली होली से पहले खेली जाती है। दिन शुरू होते ही नंदगाँव के हुरियारों की टोलियाँ बरसाने पहुँचने लगती हैं। साथ ही पहुँचने लगती हैं कीर्तन मंडलियाँ। इस दौरान भाँग-ठंढई का ख़ूब इंतज़ाम होता है। ब्रजवासी लोगों की चिरौंटा जैसी आखों को देखकर भाँग ठंढई की व्यवस्था का अंदाज़ लगा लेते हैं। बरसाने में टेसू के फूलों के भगोने तैयार रहते हैं। दोपहर तक घमासान लठमार होली का समाँ बंध चुका होता है। नंदगाँव के लोगों के हाथ में पिचकारियाँ होती हैं और बरसाने की महिलाओं के हाथ में लाठियाँ और शुरू हो जाती है होली।
मथुरा संग्रहालय में मथुरा शैली की कलाकृतियाँ[संपादित करें]
मथुरा का विशाल मूर्तिकला संग्रह देश के और विदेश के अनेक संग्रहालयों में वितरित हो चुका है। यहाँ की सामग्री लखनऊ के राज्य संग्रहालय में, कलकत्ता के भारतीय संग्रहालय में, मुम्बई और वाराणसी के संग्रहालयों में तथा विदेशों में मुख्यत: अमेरिका के 'बोस्टन' संग्रहालय में, 'पेरिस' व 'ज़्यूरिच' के संग्रहालयों व लन्दन के ब्रिटिश संग्रहालय में प्रदर्शित है। परन्तु इसका सबसे बड़ा भाग मथुरा संग्रहालय में प्रदर्शित है। इसके अतिरिक्त कतिपय व्यक्तिगत संग्रहों में भी मथुरा की कलाकृतियाँ हैं।
मथुरा का संग्रहालय यहाँ के तत्कालीन जिलाधीश एफ. एस. ग्राउज द्वारा सन १८७४ में स्थापित किया गया था। प्रारम्भ में यह संग्रहालय स्थानीय तहसील के पास एक छोटे भवन में रखा गया था। प्रारम्भ में यह संग्रहालय स्थानीय तहसील के पास एक छोटे भवन में रखा गया था। कुछ परिवर्तनों के बाद सन १९०० में संग्रहालय का प्रबन्ध नगरपालिका के हाथ में दिया गया। इसके पाँच वर्ष पश्चात तत्कालीन पुरातत्व अधिकारी डॉ॰ जे. पी. एच. फोगल के द्वारा इस संग्रहालय की मूर्तियों का वर्गीकरण किया गया और सन १९१० में एक विस्तृत सूची प्रकाशित की गई। इस कार्य से संग्रहालय का महत्व शासन की दृष्टि में बढ़ गया और सन १९१२ में इसका सारा प्रबन्ध राज्य सरकार ने अपने हाथ में ले लिया।
सन १९०८ से रायबहादुर पं॰ राधाकृष्ण यहाँ के प्रथम सहायक संग्रहाध्यक्ष के रूप में नियुक्त हुए, बाद में वे अवैतनिक संग्रहाध्यक्ष हो गए। अब संग्रहालय की उन्नति होने लगी, जिसमें तत्कालीन पुरातत्व निदेशक सर जॉन मार्शल और रायबहादुर दयाराम साहनी का बहुत बड़ा हाथ था। सन १९२९ में प्रदेशीय शासन ने एक लाख छत्तीस हजार रुपये लगाकर स्थानीय डेंम्पीयर पार्क में संग्रहालय का सम्मुख भाग निर्मित कराया और सन् १९३० में यह जनता के लिए खोला गया। इसके पश्चात ब्रिटिश शासनान्तर्गत यहाँ कोई नवीन परिवर्तन नहीं हुआ।
सन १९४७ में जब भारत का शासन सूत्र उसके अपने हाथों में आया तब से अधिकारियों का ध्यान इस सांस्कृतिक तीर्थ की उन्नति की ओर भी गया। द्वितीय पंचवर्षीय योजना में इसकी उन्नति में अलग के धन राशि की व्यवस्था की गई और कार्य भी प्रारम्भ हुआ। सन १९५८ से कार्य की गति तीव्र हुई। पुराने भवन की छत का नवीनीकरण हुआ और साथ ही साथ सन १९३० का अधूरा बना हुआ भवन भी पूरा किया गया।
मथुरा की मूर्ति कला का प्रादुर्भाव यहाँ की लोक कला के माध्यम से सम्पन्न हुआ। लोक कला की दृष्टि से देखा जाय तो मथुरा और उसके आसपास के भाग में इसके मौर्य कालीन नमूने विधमान हैं। लोक कला से सम्बन्धित ये मूर्तियाँ 'यक्षों' की हैं। 'यक्ष' पूजा तत्कालीन लोक धर्म का एक अभिन्न अंग थी। संस्कृत, पालि और प्राकृत साहित्य में 'यक्ष' पूजा का वर्णन विषद् रूप में वर्णित है। पुराणों के अनुसार यक्षों का कार्य पापियों को विघ्न करना, उन्हें दुर्गति देना और साथ ही साथ अपने क्षेत्र का संरक्षण करना था। १ मथुरा से इस प्रकार के यक्ष्म और यक्षणियों की ६ प्रतिमाएँ प्राप्त हो चुकी हैं। २ जिनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण 'परखम' नामक ग्राम से मिली हुई अभिलिखित यक्ष मूर्ति है। धोती और दुपट्टा धारण किए स्थूलकाय 'मणिभद्र यक्ष' स्थानक अवस्था में है। इस यक्ष का पूजन उस समय बड़ा ही लोकप्रिय था। इसकी एक विशालकाय प्रतिमा मध्यप्रदेश के 'पवाया' ग्राम से भी प्राप्त हुई है, जो वर्तमान समय में ग्वालियर के संग्रहालय
में प्रदर्शित है। मथुरा की यक्ष प्रतिमा भारतीय कला जगत में 'परखम यक्ष' के नाम से प्रसिद्ध है। शारीरिक बाल और सामर्थ्य की अभिव्यंजक प्राचीन काल की ये यक्ष प्रतिमाएँ केवल लोक कला के उदाहरण ही नहीं अपितु उत्तर काल में निर्मित बोधिसत्व, विष्णु, कुबेर, नाग आदि देव प्रतिमाओं के निर्माण की प्रेरिकाएँ भी हैं।
शुंग और शक क्षत्रप काल में पहुँचते-पहुँचते मथुरा को सं.सं.-कला केन्द्र का रूप प्राप्त हो गया। जैनों का देव निर्मित स्तूप, जो आज संग्रहालय संख्या के 'कंकाली' टीले पर विराजमान था, उस काल में विधमान था। ३ इस समय के तीन लेख, जिनका सम्बन्ध जैन धर्म से है, अब तक मथुरा से मिल चुके हैं। ४ यहाँ से इस काल की कई कलाकृतियाँ भी प्राप्त हो चुकी हैं जिनमें बोधिसत्व की विशाल प्रतिमा (लखनऊ संग्रहालय बी.१ बी) अमोहिनी का शिलाप (लखनऊ संग्रहालय, जे.-१), कई वेदिका स्तम्भ जिनमें से कुछ पर जातक कथाएँ तथा यक्षिणयों की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं, प्रमुख हैं।
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हिन्द-स्किथी मथुरा सिंह स्तंभ, पहली शताब्दी।
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यक्ष, पहली-दूसरी शताब्दी।
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बोधिसत्व मैत्रेय, मथुरा कला, दूसरी शताब्दी।
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बोधिसत्व पार्श्व दूसरी शताब्दी।
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मथुरा सिंह स्तंभ, ब्रिटिश म्यूज़ियम।
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बोधिसत्व सिद्धार्थ गौतम, दूसरी शताब्दी।
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गुप्त कालीन बुद्ध, पाँचवीं शताब्दी।
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बुद्ध मुख, दूसरी शताब्दी।
संदर्भ / स्रोत
- "SAINI CASTE HISTORY" . sites.google.com . अभिगमन तिथि: 2024-05-30 . ↗